वो इंदौर की गर्मी और पांच दीवाने दिलों की बेचैन, मदहोश रातों की कहानी

मेरा नाम सुयश जोशी है और यह कहानी उस रात की है जिसने मेरी ज़िंदगी का नक्शा ही बदल दिया। इंदौर की गर्मियों की एक तपती हुई शाम थी। एमजी रोड पर ट्रैफिक का शोर और हवा में तैरती भुजिया की खुशबू – ये चीज़ें मेरे लिए हमेशा से घर जैसी थीं। मैं अपने दो-कमरे के अपार्टमेंट में अकेला बैठा था, एसी की ठंडी हवा के बावजूद एक अजीब सी बेचैनी थी। फोन बजा। पलक थी।

“यश, क्या कर रहा है? बोर हो रहा हूं। अंजलि और निधि भी मेरे साथ हैं। तुम्हारे पास कोई प्लान है?” उसकी आवाज़ में वो मस्त भरी लापरवाही थी जो हमेशा मुझे दीवाना बना देती थी।

पलक पाटीदार। हमारी कॉलोनी में ही रहती थी। लंबी, गेहुंए रंग की, उसकी आंखें हमेशा किसी शरारत की कहानी कहती रहती थीं। उस दिन वह टाइट, काले रंग की जींस और एक साधारण सी सफेद टॉप पहने हुई थी, लेकिन उसके स्तनों का आकार उस टॉप में साफ उभर रहा था। उसके बाल गंदे ब्लॉंड के शेड्स में थे, जो उसकी गर्दन पर लहराते रहते थे। उसकी हंसी संक्रामक थी – ऊंची, साफ, बिल्कुल बेफिक्र।

मैंने कहा, “प्लान तो नहीं है, लेकिन तुम लोग आ जाओ यहां। कोल्ड कॉफी बनाता हूं।”

आधे घंटे में वे तीनों आ गईं। पलक के साथ अंजलि रघुवंशी और निधि सोलंकी थीं। अंजलि पलक से उलट थी – छोटी, गोरी, बेहद शांत। उसके चेहरे पर एक सदाबहार मुस्कान रहती थी। वह हल्के गुलाबी रंग का एक ढीला-ढाला कुर्ता पहने हुई थी, लेकिन उसकी नज़रों में एक गहरी कशिश थी जो शायद ही किसी को दिखती थी। निधि… निधि अलग ही थी। एथलेटिक बॉडी, शॉर्ट हेयर कट, और एक ऐसी आत्मविश्वास भरी मुस्कान जो सीधे दिल में उतर जाती थी। वह डेनिम शॉर्ट्स और एक क्रॉप टॉप पहने हुई थी, उसकी टोन्ड बाजुओं और पेट पर मेरी नज़र बार-बार जा रही थी।

शुरुआत सामान्य सी थी। गपशप, कॉलेज की यादें, आने वाली फिल्मों पर बहस। कोल्ड कॉफी के गिलास हमारे हाथों में थे। पलक मेरे पास सोफे पर बैठी थी। बातचीत के दौरान, जब वह हंसती, तो उसका हाथ कभी मेरे हाथ को स्पर्श कर जाता, कभी उसकी जांघ मेरी जांघ से टकरा जाती। हर बार एक सिहरन सी दौड़ जाती। वह जानबूझकर ऐसा कर रही थी? शायद। उसकी आंखें मेरी आंखों में घूरतीं, फिर एकदम से हट जातीं, मानो कुछ हुआ ही न हो।

निधि ने मेरे रूम की एक पेंटिंग की तारीफ की। मैं उसे दिखाने के लिए उठा और वह भी। करीब आकर उसने पेंटिंग देखी। उसके शरीर से आ रही हल्की सी खुशबू – नींबू और कुछ मसालेदार – मेरे दिमाग को चकरा दे रही थी। वह मुड़ी और हम आमने-सामने थे। बहुत करीब। उसकी सांसें मेरे चेहरे को छू रही थीं। उसने मुस्कुराते हुए कहा, “तुम्हारा टेस्ट अच्छा है।” फिर बिना कुछ और कहे वापस अपनी जगह पर जा बैठी। मेरा दिल ज़ोरों से धड़क रहा था।

अंजलि शांत बैठी थी, लेकिन उसकी नज़रें हम सब पर चल रही थीं। एक बार जब पलक ने मेरे बालों में हाथ फेरते हुए कहा, “तुम्हारे बाल तो बहुत सॉफ्ट हैं,” तो मैंने देखा अंजलि की आंखों में एक ललक सी दौड़ गई। वह भी कुछ कहना चाहती थी, लेकिन चुप रही। उसकी यही शर्म, यही संकोच उसे और भी आकर्षक बना रहा था।

धीरे-धीरे हवा बदलने लगी। बातचीत ने थोड़ा गरम रुख लेना शुरू किया। निधि ने किसी डेटिंग ऐप पर अपने एक मज़ेदार अनुभव के बारे में बताया। पलक ने उस पर टिप्पणी करते हुए कहा, “अरे, तू तो बहुत प्यासी लग रही है आजकल!” सब हंसे। निधि ने बदले में पलक को टोका, “तू क्यों बोल रही है? कल रात तूने जो वॉइस नोट भेजा था वो तो…” और वह रुक गई, शरारत भरी मुस्कान के साथ। पलक का चेहरा लाल हो गया, लेकिन उसने कोई इनकार नहीं किया। उसकी नज़रें मुझसे मिलीं। उस लम्बे, तनाव भरे आलिंगन जैसे नज़रों के मिलन में एक पूरा वार्तालाप हो गया।

मैंने महसूस किया कि कमरे में उत्तेजना का वातावरण बन रहा था। यह सिर्फ शारीरिक नहीं था। यह एक भावनात्मक, मानसिक रोमांच था। चार सुंदर लोग, एक बंद कमरा, और वो अनकहा तनाव जो हवा में तैर रहा था। अंजलि ने अचानक पूछा, “सुयश, तुम्हें कभी ऐसा लगता है… कि सब कुछ प्लान के मुताबिक होने के बजाय, बस… फ्लो में रहना चाहिए?” उसकी आवाज़ धीमी, विचारमग्न थी।

मैंने कहा, “हमेशा। लेकिन फ्लो में रहने के लिए हिम्मत चाहिए।”

उसने मुस्कुराते हुए सिर हिलाया। पलक ने मेरा हाथ थाम लिया। उसकी उंगलियां मेरी उंगलियों में फंस गईं। यह कोई आकस्मिक स्पर्श नहीं था। यह जानबूझकर था। निधि ने देखा और अपनी आंखें घुमा लीं, लेकिन उसके चेहरे पर मुस्कान थी।

तभी पलक बोली, “चलो, कुछ मज़ा करते हैं। म्यूजिक चलाओ। लाइट्स थोड़ी कम करो।”

मैंने ऐसा ही किया। धीमा, इंस्ट्रुमेंटल म्यूजिक बजने लगा। टेबल लैंप की मंद रोशनी ने कमरे को एक अलग ही रूप दे दिया। शुरुआत में एक अजीब सा ठहराव था। फिर पलक उठी और मेरे सामने खड़ी हो गई। उसने मेरा हाथ पकड़ा और मुझे खींचकर फर्श पर बिछे उस बड़े, मुलायम फर के कालीन पर ले आई। वह बोली, “चलो, सब यहां बैठो। कोई रुल्स नहीं। बस… जो मन करे।”

एक पल की खामोशी के बाद, अंजलि और निधि भी आकर हमारे पास बैठ गईं। हम पांचों एक अजीब से घेरे में थे। हवा में तनाव चरम पर था। पलक ने मेरी तरफ देखा, फिर अचानक झुककर मेरे होंठों पर एक कोमल चुम्बन दिया। यह बिजली के एक झटके जैसा था। मेरे शरीर में एक विद्युत-सी दौड़ गई। उसने पीछे हटकर निधि की तरफ देखा। निधि मुस्कुराई, और पलक की तरफ बढ़ी, उसके होंठों को चूमा। यह देखकर मेरी कामेच्छा और भी भड़क उठी।

फिर सब कुछ तेज़ी से बदलने लगा। यह एक स्वतःस्फूर्त, अराजक, लेकिन सुंदर उलझन थी। अंजलि, जो अब तक शांत थी, वह मेरे पास आई और मेरे कान के पास फुसफुसाई, “मैं… मैं हमेशा से तुम्हें देखती रही हूं।” और उसने मेरे गाल को सहलाया। उसका स्पर्श बेहद कोमल था।

मैं पीछे की तरफ लेट गया। पलक और निधि मेरे दोनों ओर थीं। पलक ने मेरे होंठों पर चुम्बन जारी रखा, जबकि निधि ने मेरे कपड़ों के बटन खोलने शुरू कर दिए। वह मेरे सीने पर, पेट पर चुम्बन करती हुई नीचे की ओर बढ़ी। उसकी जीभ के हर स्पर्श से मैं सिहर उठता। तभी मैंने महसूस किया – अंजलि मेरे दूसरी ओर थी। उसने भी निधि का अनुसरण किया, और दोनों एक साथ मेरे शरीर पर नीचे की ओर बढ़ रही थीं।

जब वे मेरे कमर तक पहुंचीं, तो पलक ने मेरी पैंट उतार दी। मैं पूरी तरह से उत्तेजित था। निधि ने मेरी ओर एक दीवानी सी नज़र से देखा, और फिर अपना मुंह आगे बढ़ाया। उसने मेरे लिंग को अपने मुंह में ले लिया। यह एक गर्म, नम, अवर्णनीय स्पर्श था। उसकी जीभ ने नाजुकता से खेलना शुरू किया। उसी समय, अंजलि, जो अब तक इतनी शर्मीली लग रही थी, वह और नीचे झुकी और मेरे अंडकोष को अपनी जीभ से सहलाने लगी। दो अलग-अलग उत्तेजनाओं का यह समन्वय मुझे पागल कर रहा था। मैं एक कर्राहट भरी आह निकालने से खुद को नहीं रोक सका।

मैंने अपनी आंखें घुमाईं। दूसरी ओर, पलक अपने घुटनों के बल बैठी थी, और निधि (मैंने देखा कि यह निधि नहीं, बल्कि पलक थी, मेरी भ्रम की स्थिति) उस पर सवार होकर उसका चेहरा अपनी योनी पर रखे हुई थी। लेकिन उस पलक के पीछे एक तीसरी औरत खड़ी थी – अंजलि? नहीं, वह तो मेरे साथ थी… फिर मैंने देखा, वह निधि थी! मेरी समझ से परे, निधि पलक के पीछे खड़ी थी, और वह पलक के हाथों का मार्गदर्शन कर रही थी ताकि वह उसके योनी में प्रवेश कर सके। यह दृश्य अत्यधिक कामुक और मदहोश कर देने वाला था।

तभी तीसरी औरत – हां, वह अंजलि थी, जो अब मेरे पास से उठकर उधर गई – वह घुटनों के बल बैठी और सवार हो रही पलक के नितंबों पर एक हल्का सा तमाचा लगाया। पलक ने एक उत्तेजित सिसकी भरी। फिर अंजलि ने मुड़कर मेरी ओर देखा, और आकर मेरे होंठों पर एक जोशीला चुम्बन दिया, जबकि निधि और पलक मुझे और उस सवार पलक को अपनी-अपनी काम-क्रीड़ा में व्यस्त रखे हुए थीं।

फिर समूह पुनर्व्यवस्थित हुआ। पलक अब फर के कालीन पर पीठ के बल लेट गई। उसकी आंखों में एक चुनौती भरी चमक थी। निधि ने मेरी ओर इशारा किया और फिर अंजलि की ओर। हम समझ गए। मैं और अंजलि, दोनों ने पलक के दोनों ओर अपनी स्थिति बनाई। मैंने उसके पीछे, एक ‘स्पूनिंग’ स्थिति में, उसकी योनी में प्रवेश किया। उसी समय, अंजलि ने, थोड़ी हिचकिचाहट के बाद, उसकी गुदा में प्रवेश किया। पलक ने एक तीखी आह भरी, उसकी आंखें चौंधिया गईं। यह एक तीव्र, गहन अनुभव था। हमारी गतियां धीरे-धीरे तालमेल बिठाने लगीं।

इस सबके बीच, निधि और वह दूसरी लड़की (मुझे अब एहसास हुआ कि हम पांच थे, लेकिन उस पल यह विवरण धुंधला सा था) एक दूसरे के करीब आकर चुम्बन और आलिंगन में लिपट गईं। वे एक-दूसरे के स्तनों को सहला रही थीं, मसल रही थीं। उनकी फुसफुसाहट और हल्की सिसकियां कमरे की हवा में घुल रही थीं।

तभी निधि, जो अब तक दूसरी लड़की के साथ व्यस्त थी, वह हमारी ओर मुड़ी। वह पलक के करीब आई, जो अभी भी दोहरे प्रवेश में थी। निधि ने पलक के चेहरे पर गौर से देखा, फिर अपना मुंह खोला और एक बार नहीं, बल्कि दो बार, पलक के खुले मुंह में थूक दिया। यह अप्रत्याशित, अश्लील, और अविश्वसनीय रूप से उत्तेजक था। पलक ने उसे निगल लिया, उसकी आंखों में वासना की एक नई आग जल उठी।

यह देखकर मेरे और अंजलि के झटके तेज़ हो गए। हमारी गतियां अब अनियमित और बेकाबू हो रही थीं। पलक चिल्लाई, “हां! हां! मत रुको!” उसका शरीर एक अजीब सी कंपकंपी से भर गया। वह जोर से चीखी – एक लंबी, कराहट भरी चीख जो उसके शरीर के हर संकुचन के साथ निकल रही थी। वह स्खलन की चरम सीमा पर पहुंच गई थी।

उसकी इस तीव्र प्रतिक्रिया ने मेरे और अंजलि पर तुरंत असर दिखाया। मैंने अपने आपको रोकने की कोशिश की, लेकिन नहीं कर पाया। एक गहरी गरज के साथ, मैंने भी स्खलन कर दिया, उसी क्षण महसूस किया कि अंजलि का शरीर भी ऐंठ रहा है, और वह भी अपने चरम पर पहुंच गई है। हम तीनों एक साथ, एक उलझी हुई, पसीने से तर गठरी की तरह, वहीं फर पर गिरे, हांफते हुए।

थोड़ी दूर, निधि और उसकी साथी भी एक-दूसरे को उत्तेजित करते-करते अपने चरम पर पहुंच गई थीं। उनकी कराहने की आवाज़ें धीरे-धीरे फुसफुसाहट में बदल गईं।

फिर एक गहरी शांति छा गई। सिर्फ हमारी भारी सांसों की आवाज़ थी। हम सब, पांचों, फर के उस बड़े कालीन पर इधर-उधर बिखरे पड़े थे। शरीर एक-दूसरे से टकराए हुए थे, पसीना और शरीर के तरल पदार्थ सब मिल-जुल गए थे। कोई कुछ बोल नहीं रहा था।

मैं पलक के बगल में लेटा था। उसने अपनी आंखें खोलीं और मेरी ओर देखा। उसकी आंखों में थकान थी, लेकिन संतुष्टि भी। उसने मुस्कुराते हुए मेरा हाथ दबाया। अंजलि मेरे दूसरी ओर थी। वह अपना सिर मेरे कंधे पर रखे हुए थी, उसकी सांसें अब शांत हो रही थीं। निधि और उसकी साथी दूर एक कोने में गुंथी हुई सोई पड़ी थीं।

करीब आधे घंटे तक हम वैसे ही पड़े रहे। फिर धीरे-धीरे हिलने-डुलने लगे। शर्म नहीं थी, कोई पछतावा नहीं था। बस एक अजीब सी शांति और जुड़ाव था। पलक उठी और बिना कुछ कहे बाथरूम की ओर चली गई। बाकी लोग भी धीरे-धीरे उठने लगे।

हमने एक-दूसरे की मदद से कपड़े ढूंढे। बातचीत फिर से शुरू हुई, लेकिन अब वह और अधिक कोमल, अधिक वास्तविक थी। हमने पानी पिया। बाहर की दुनिया से फिर से जुड़ने लगे।

जब वे जाने लगीं तो रात के दो बज चुके थे। दरवाज़े पर, पलक ने मुड़कर मेरी ओर देखा। उसने कुछ नहीं कहा, बस एक चुंबन दिया – वैसा ही कोमल चुंबन जिससे सबकी शुरुआत हुई थी। अंजलि ने शर्माते हुए मुस्कुराया। निधि ने मेरी पीठ थपथपाई और कहा, “कल मिलते हैं।”

दरवाज़ा बंद हुआ। मैं अकेला खड़ा रहा। कमरे में अभी भी उस रात की गर्मी और खुशबू थी। फर के कालीन पर दाग थे। मेरे मन में कोई उथल-पुथल नहीं थी, कोई संदेह नहीं था। बस एक गहरा आभार और एक अटूट याद थी। यह कोई सपना नहीं था। यह वास्तविक था। इंदौर की उस गर्म रात में, पांच लोगों ने अपनी वासना, अपनी ललक, और अपने आकर्षण को पूरी तरह से, बिना किसी रोक-टोक के, जी लिया था। और मैं, सुयश जोशी, उसका एक हिस्सा था।