तैल से सिक्त, वासना से लिपटी: एक ऐसी शाम जब इंशा और अर्सलान की देह ने बोली एक नई भाषा

आज सुबह जब मैंने अपने ऑफिस की खिड़की से डल झील की ओर देखा तो पानी पर पड़ती सूरज की किरणें चांदी की तरह चमक रही थीं। लेकिन मेरा दिमाग झील में नहीं, आज रात में था। पूरे हफ़्ते की थकान मेरे कंधों और कमर पर जमा हो गई थी, और अर्सलान ने कल ही कहा था, “तुम्हारी चेहरे की रौनक गायब है, इंशा। कल मैं तुम्हारा इलाज करता हूँ।” उसकी आवाज़ में वही मस्ती और चिंता का मिश्रण था जो मुझे हमेशा पिघला देता है।

शाम को जब मैं अपने मुन्सियरी के अपार्टमेंट में लौटी, तो अर्सलान पहले से ही वहाँ था। उसने लिविंग रूम की लाइट्स मद्धम कर दी थीं और कॉफ़ी टेबल पर एक बोतल नारियल का तेल और कुछ मोमबत्तियाँ रख दी थीं। वह ख़ुद ग्रे कार्गो पैंट और एक साधारण सफ़ेद टी-शर्ट में था, लेकिन उसकी मौजूदगी कमरे को भर देती थी। उसकी काली घनी दाढ़ी, गहरी आँखें जो मेरी ओर देखते ही मुस्कुरा उठतीं, और वह आत्मविश्वास जो उसकी हर हरकत से झलकता था – वह सब मुझे अभी भी रोमांचित कर देता था।

“तो, डॉक्टर साहब, इलाज कब शुरू होगा?” मैंने मज़ाकिया लहजे में पूछा, अपना बैग सोफे पर रखते हुए।

“जब मरीज तैयार हो जाए,” उसने कहा, अपनी बाँहें चौड़ी करके। “लेकिन पहले एक शर्त है। सारा तनाव, सारी ऑफिस वाली बातें इस दरवाज़े के बाहर छोड़कर आओ।”

मैं मुस्कुराई। यही तो वह बात थी जो मुझे उसके पास खींच लाती थी। उसकी देखभाल। “ठीक है। मैं जाकर नहा लेती हूँ।”

गर्म पानी ने मेरे तनाव भरे मांसपेशियों को ढीला करना शुरू किया। मैंने सोचा, आख़िरकार हम दोनों की यह जोड़ी कैसे बनी। दो साल पहले, एक कॉमन फ्रेंड के जन्मदिन की पार्टी में हमारी मुलाकात हुई थी। वह शिमला से आया एक सॉफ्टवेयर इंजीनियर था, जिसे सिर्फ़ छह महीने के प्रोजेक्ट के लिए श्रीनगर भेजा गया था। मैं, एक लोकल टूरिस्ट गाइड। उस रात हमने घंटों बात की – कश्मीर की सर्दियों के बारे में, हिमाचल की वादियों के बारे में, और फिर धीरे-धीरे अपने सपनों के बारे में। उसकी विनम्रता और मेरी जिद्दीपन एक-दूसरे के पूरक लगे। प्रोजेक्ट खत्म हुआ, लेकिन वह लौटकर शिमला नहीं गया। उसने यहीं रहने का फैसला किया। पहला चुंबन हज़रतबल के पास एक शिकारा नाव में हुआ था, जब चारों तरफ बर्फ़ीली हवाएँ चल रही थीं लेकिन हमारे चेहरे गर्म थे।

नहाकर, मैंने एक सूती, हल्के गुलाबी रंग का टॉवल लपेटा और लिविंग रूम में आई। अर्सलान ने मोमबत्तियाँ जला दी थीं और फ़्लोर पर एक बड़ा सा नरम कंबल बिछा दिया था। हवा में नारियल की हल्की खुशबू तैर रही थी।

“तैयार?” उसने पूछा, उसकी आवाज़ अब एक सपाट स्टेटमेंट नहीं, बल्कि एक कोमल सवाल थी।

मैंने सिर हिलाया। कुछ पल का सन्नाटा छाया रहा। फिर, धीरे से, मैंने टॉवल को खोला और उसे फ़्लोर पर गिरा दिया। हवा का स्पर्श मेरी त्वचा पर एकदम नया, एकदम जागरूक करने वाला लगा। मैंने अपने आप को उसकी नज़रों के सामने पेश किया, चेहरे के बल कंबल पर लेट गई। मेरे लंबे, काले बाल मेरी पीठ पर फैल गए। मैंने अपना चेहरा अपनी बाँहों में छुपा लिया, लेकिन मेरे कान उसकी हर हरकत के प्रति सजग थे।

उसके हाथों का पहला स्पर्श जैसे किसी जादू की शुरुआत थी। गुनगुने तेल की कुछ बूंदें पहले मेरी रीढ़ की हड्डी पर गिरीं, और फिर उसके दोनों हथेलियों ने उन्हें फैलाया। उसकी हथेलियाँ ठोस, गर्म और निश्चित थीं। वह मेरे कंधों से शुरू हुआ, उन गाँठों को तलाशता हुआ जो हफ़्तों से जमा थीं। हर दबाव सटीक था – न ज़्यादा कोमल, न ज़्यादा कठोर। मैं कराह उठी, एक लंबी, थकान भरी आह निकल गई मेरे होठों से। “हम्म्म…”

“यहीं सारी तकलीफ़ जमा थी न?” उसकी आवाज़ एक फुसफुसाहट थी।

उसके अंगूठे मेरी रीढ़ की हड्डी के दोनों ओर नीचे की ओर बढ़े, दबाव बनाते हुए। हर मांसपेशी, हर तंतु उसकी उंगलियों के आगे ढीला पड़ता जा रहा था। फिर वह मेरी कमर पर आया, अपनी हथेलियों के हेलिकॉप्टर जैसे मूवमेंट से मेरे निचले हिस्से को दबाता हुआ। एक नई तरह की उत्तेजना ने जन्म लिया, जो केवल दर्द से राहत नहीं थी। यह उसके विश्वासपूर्ण स्पर्श का आश्वासन था। उसकी उंगलियाँ मेरे कूल्हों के गोलाई वाले हिस्सों पर गईं, उन्हें धीरे से मसलते हुए, कभी दबाते हुए, कभी सहलाते हुए। मेरी साँसें थोड़ी तेज़ होने लगीं।

और फिर, एक ऐसा पल आया जब उसके हाथों का रास्ता बदला। उसकी हथेलियाँ मेरे कूल्हों से नीचे सरकीं, मेरे जाँघों के पिछले हिस्से को मसलती हुई। एक क्षण के लिए रुककर, फिर धीरे-धीरे, वह मेरे जाँघों के बीच की ओर बढ़ा। हवा जैसे जम गई। मेरे शरीर में एक सिहरन दौड़ गई। उसने मेरे जाँघों के भीतरी हिस्सों को कोमलता से दबाया, उन्हें अलग करते हुए एक मुलायम, खिंचाव दिया। मेरे होठों से एक अधूरी सी आह निकल गई। उसकी उंगलियों ने वहाँ मालिश जारी रखी, गोलाकार गतियों में, केवल बाहरी हिस्सों को छूते हुए, लेकिन उस स्पर्श में एक ऐसा इरादा था जो स्पष्ट था। मेरी देह ने जवाब दिया, एक गहरी, आंतरिक गर्मी फैलते हुए। मैंने अपनी जांघों को थोड़ा और खोला, एक साइलेंट इजाज़त। उसने एक गहरी सांस ली, उसकी सांसों की गर्मी मेरी त्वचा पर महसूस हुई। उसकी एक उंगली ने सबसे कोमल, सबसे संवेदनशील बाहरी त्वचा को छुआ – एक झटके जैसा, मीठा आघात। मैं सिसकी। “अर्सलान…”

“श्श्श… बस रिलैक्स करो,” उसने फुसफुसाया, लेकिन उसकी आवाज़ में भी एक कंपकंपी थी। उसने कुछ पल और वहीं रुककर, उस नाजुक सीमा पर नृत्य किया, फिर धीरे से मुझे पलटने के लिए कहा। “चलो, अब सामने।”

जब मैं पलटी, तो हमारी निगाहें मिलीं। उसकी आँखों में वही आग थी जो मेरे भीतर जल रही थी। मैंने अपने आप को उसकी निगाहों के सामने उधेड़ते हुए महसूस किया – मेरे स्तन, मेरा समतल पेट, वह सब जो अब उसकी थी। उसने फिर से तेल लिया, इस बार मेरे पेट पर डाला। तेल की गर्म बूंदें मेरी त्वचा पर फिसलीं। उसकी हथेलियाँ मेरे पेट पर घूमीं, नाभि के चारों ओर गोलाकार गतियाँ बनाते हुए। फिर वह ऊपर की ओर बढ़ा। उसके हाथों ने धीरे से मेरे स्तनों को घेर लिया, उनकी भरी हुई कोमलता को महसूस किया। एक लंबी, धीमी स्ट्रोक से उसने उन्हें सहलाया, उसके अंगूठे ने धीरे-धीरे मेरे उभरे हुए निपल्स का चक्कर लगाया। मैंने अपना सिर पीछे की ओर झटका, एक तीखी साँस भरते हुए। उत्तेजना अब दर्द नहीं, एक ज्वाला बन चुकी थी। उसने दोनों निपल्स को अपनी उंगलियों के बीच में ले लिया, कोमलता से दबाया, मरोड़ा। एक ज़ोरदार झटका मेरी योनी तक जा पहुँचा। मेरी आँखें बंद हो गईं। मेरे होठों से एक लंबी, कर्कश कराह निकल गई। “हाँ… ऐसे ही।”

तेल से सनी उसकी एक हथेली मेरे पेट से होती हुई नीचे की ओर सरकी। उसकी निगाहें मेरे चेहरे पर केंद्रित थीं, हर भाव को पढ़ती हुईं। जब उसकी उंगलियों ने मेरे जाँघों के बीच के कोमल बालों को छुआ, तो मेरा पूरा शरीर ऐंठ गया। उसने मेरी योनी के बाहरी होंठों को सहलाया, जो पहले से ही गर्म और सूजे हुए थे। फिर, एक सहज, निर्णायक गति से, उसकी दो उंगलियाँ अंदर की ओर सरक गईं।

“ओह!” मेरा मुँह खुला रह गया। गर्मी, चिकनाई, और एक गहरा भरावन। उसकी उंगलियाँ अंदर घूमीं, मुड़ीं, एक विशेष स्थान को ढूंढ़ने लगीं। और फिर उन्होंने पाया। जी-स्पॉट। एक कोमल, दबाव भरा घुमाव। मेरे भीतर बिजली कौंध गई। मेरे हाथ बेतरतीब ढंग से कंबल को पकड़ने लगे। “अर्सलान… वहाँ… बिल्कुल वहाँ,” मैंने हांफते हुए कहा। वह उसी जगह पर दबाव बनाता रहा, एक लयबद्ध गति में, जबकि उसका अंगूठा मेरे क्लिटोरिस पर नाचता रहा। संवेदनाओं का तूफ़ान मुझे बहा ले जा रहा था। मैं उसके हाथों की मर्जी पर थी, और मुझे इसकी कोई परवाह नहीं थी।

लेकिन यह पर्याप्त नहीं था। मैं उसे महसूस करना चाहती थी, सिर्फ़ उसके हाथ नहीं। अपनी आँखें खोलकर, मैंने अपना हाथ बढ़ाया और उसके कार्गो पैंट के बटन खोल दिए। उसने एक तेज़ सांस ली जब मेरे हाथ अंदर घुसे और उसके बॉक्सर्स के अंदर से उसकी गर्म, कड़ी उत्तेजना को बाहर निकाला। तेल से सनी मेरी हथेली उसके लंड के ऊपर फिरी, उसे चिकना किया, एक मज़बूत, मरोड़ भरी गति से उसे थाम लिया। उसकी आँखें पलक झपकाते हुए बंद हो गईं और उसके होठों से एक गहरी गुर्राहट निकली। “इंशा…”

मैंने उसे अपने ऊपर खींचा, मेरी आँखों में एक साफ़ इशारा था। “मुझे चखने दो।”

वह समझ गया। वह घुटनों के बल मेरे सिर के पास आया, अपनी जांघों से मेरे कंधों को घेरते हुए। मेरे सामने उसकी उत्तेजना लहरा रही थी। मैंने पहले उसके अंडकोश को चूमा, फिर अपनी जीभ से उन्हें सहलाया, एक-एक कर उन्हें अपने मुँह में लेती हुई, चूसती हुई। मेरा दूसरा हाथ उसके लंड को थामे हुए था, लयबद्ध तरीके से स्ट्रोक दे रहा था। उसकी कराहें, उसके सिर का पीछे की ओर झुकना – सब मेरे लिए ईंधन थे।

“मैं भी… मैं भी चाहता हूँ,” उसने हांफते हुए कहा। उसने अपनी पोजीशन बदली, खुद को नीचे किया, और हम एक-दूसरे के ऊपर आ गए, ६९ की पोजीशन में। उसके मुँह की गर्मी ने तुरंत ही मेरी योनी को ढक लिया, और उसकी जीभ ने मेरे क्लिटोरिस पर बिना रुके हमला कर दिया। मैं ठंडी हवा को भरते हुए एक ऊँची चीख निकालने से बस बची। मेरे मुँह में उसका लंड फिर से आ गया था, और मैंने उसे गहराई से लेना शुरू किया, मेरी जीभ उसके सिर के नीचे के संवेदनशील हिस्से पर नाचती रही। यह एक अराजक, गहन आदान-प्रदान था – मेरी कराहें, उसकी गुर्राहटें, चूसने और चाटने की आवाज़ें, और हवा में तैरती वासना। उसकी जीभ तेज और फोकस्ड थी, और मुझे लगा कि मैं किसी चरम पर पहुँचने वाली हूँ, लेकिन मैं रुक गई। नहीं, अभी नहीं।

मैंने धीरे से उसे पीछे किया, हम दोनों हांफ रहे थे। “मैं… मैं तुम्हें अपने अंदर चाहती हूँ,” मैंने कहा, मेरी आवाज़ लड़खड़ा रही थी।

उसने मुझे पलटने में मदद की। मैं घुटनों के बल ऊपर आई, और वह पीछे से मेरे पास आया। लेकिन मैंने उसे रोका। “नहीं… इस तरह।” मैंने उसे पीठ के बल लेटने के लिए इशारा किया, और फिर खुद उसके ऊपर चढ़ गई, रिवर्स काउगर्ल की पोजीशन में। मैं उसे देख सकती थी, उसके चेहरे के भाव, उसकी आँखों में छटपटाहट। मेरी पीठ उसके सामने थी। मैंने अपने हाथों से उसके घुटनों को पकड़ा, धीरे-धीरे नीचे की ओर बढ़ी, जब तक कि मैं उसकी उत्तेजना के सिरे को अपने गीले, तैयार प्रवेश द्वार पर महसूस नहीं कर पाई। और फिर, एक लंबी सांस भरकर, मैंने नीचे किया।

“ओह भगवान… इंशा,” उसकी आवाज़ एक कसक भरी सिसकी थी।

वह गर्मी, वह भराव, वह पूर्णता। मैंने एक पल के लिए रुककर उसे अपने भीतर समाने दिया। फिर, मैंने चलना शुरू किया। ऊपर-नीचे। धीरे-धीरे पहले, फिर तेज। मेरे कूल्हे उसकी जांघों से टकरा रहे थे। मैंने अपने कंधे के ऊपर से पीछे मुड़कर देखा, उसकी आँखों में अपनी छवि देखी – एक उन्मुक्त, वासनामय स्त्री। उसकी हथेलियाँ मेरे कूल्हों पर आईं, मुझे गति दी। संवेदनाएँ बढ़ रही थीं। मैंने आगे की ओर झुककर, अपने हाथों को फ़्लोर पर टेक दिया। इससे कोण बदल गया। और फिर वह हुआ। एक विस्फोट। एक ऐसा झटका जिसने मेरी रीढ़ की हड्डी से होता हुआ मेरे मस्तिष्क तक धावा बोल दिया। मेरा शरीर ऐंठ गया, एक लंबी, लहरदार कराह मेरे गले से निकलकर कमरे में गूंज उठी। मेरे भीतर की मांसपेशियाँ उसके लंड को जकड़ने लगीं, अनैच्छिक रूप से सिकुड़ रही थीं।

मेरे ऑर्गैज़्म के ठीक बाद, उसने बैठकर मेरे कूल्हों को पकड़ लिया। उसकी आँखों में एक पशुवत तीव्रता थी। उसने मुझे ऊपर-नीचे करना जारी रखा, लेकिन अब वह खुद भी ऊपर की ओर जोर से धकेलने लगा। उसकी सांसें तेज, छोटी हो गईं। उसकी उंगलियाँ मेरी त्वचा में घुसने लगीं। मैं जानती थी कि वह कहाँ है। मैंने पीछे की ओर हाथ बढ़ाया, उसके बालों में उंगलियाँ फंसाई, उसे और तेज करने के लिए प्रोत्साहित किया। और फिर उसने एक गहरी गुर्राहट के साथ, मेरे भीतर एक तेज झटका लगाया। उसकी गर्मी मेरी पीठ के निचले हिस्से पर फैल गई, चिपचिपी और अचानक। उसका शरीर कांपा, और वह मेरे ऊपर झुक गया, अपना सिर मेरी पीठ पर टिकाते हुए।

कुछ मिनट तक हम वैसे ही रहे, सिर्फ़ सांसें लेते हुए। हवा में सेक्स और नारियल तेल की मिली-जुली गंध थी। आख़िरकार, वह धीरे से बाहर निकला और मेरे पास लेट गया, मुझे अपनी बाँहों में भर लिया। हमारी त्वचा चिपचिपी और गर्म थी। उसने मेरे बालों से चेहरा साफ किया और मेरे कान के पास एक कोमल चुंबन दिया।

“कैसा महसूस हो रहा है?” उसने पूछा, उसकी आवाज़ खुरदरी और संतुष्ट थी।

मैं जवाब देने के लिए शब्द नहीं ढूंढ पा रही थी। मेरा शरीर भारी और विश्रांत था, लेकिन मेरा दिमाग एक शांत चमक से भरा हुआ था। मैंने उसकी ओर मुड़कर, उसकी आँखों में देखा। “पूरा। लग रहा है जैसे मैं पूरी हूँ।”

वह मुस्कुराया, वही सुकून भरी मुस्कान जो मुझे हमेशा पसंद थी। उसने मुझे अपने पास और करीर खींच लिया। बाहर, श्रीनगर की रात ठंडी हो रही थी। लेकिन यहाँ, तेल और पसीने से सनी इस चादर पर, हम गर्म और सुरक्षित थे। कोई शब्द नहीं चाहिए थे। बस दो शरीरों की याददाश्त, और एक ऐसी इच्छा जो अभी शुरू ही हुई थी।