सालों बाद एक होटल के कमरे में, बिखरे हुए बटन और खोई हुई साँसों के बीच एक पुराना प्यार फिर से जाग उठा

मेरा नाम राहुल मलवीया है और यह कहानी उस रात की है जिसने मेरी ज़िन्दगी की दिशा ही बदल दी। उज्जैन की गर्मी अपने चरम पर थी, और मैं शिप्रा नदी के किनारे बने एक छोटे से होटल ‘रिवेरा व्यू’ के लॉबी में खड़ा था। ए.सी. की ठंडी हवा भी मेरे पसीने को सुखा नहीं पा रही थी। शायद पसीना गर्मी का नहीं, बेचैनी का थी। दस साल बाद आज फिर से आशी जोशी से मिलना था।

कॉलेज के दिनों में हम एक-दूसरे के सब कुछ थे। फिर ज़िन्दगी ने अलग रास्तों पर धकेल दिया। उसका विवाह हो गया, मैं मुंबई चला गया। संपर्क टूट गया। फिर पिछले हफ्ते, फेसबुक पर एक मैसेज। सादा सा: “राहुल, उज्जैन आ रही हूँ। मिलोगे?” और अब मैं यहाँ था, दिल धड़कता हुआ, दिमाग में अनगिनत सवालों के साथ।

लॉबी का शीशे का दरवाज़ा खुला और वो अंदर आई। साँस रुक सी गयी। समय ने उसे निखारा था। सादी सी नीली कुर्ती और सफेद चूड़ीदार पाजामा पहने हुई थी, बाल थोड़े गीले थे, शायद नहाकर आ रही थी। उसके स्तन, जो कभी लड़कपन में छोटे से थे, अब उसके कुर्ते के अंदर पूरी तरह भर चुके थे। चेहरे पर एक हल्की सी नर्म मुस्कान थी, लेकिन आँखों में एक तड़प थी, एक बेचैनी जो मेरी अपनी बेचैनी से मेल खा रही थी।

“तुम… तुम सही सही वैसे ही हो,” मेरे मुँह से निकला। वो हँसी, “तुम्हारी आदत नहीं गयी, बेवजह की तारीफ करने की।” उसकी आवाज़ में वही पुरानी मिठास थी, पर अब थोड़ा और गरम, परिपक्व स्वर था। हमने हाथ मिलाया। उसका स्पर्श बिजली की तरह लगा। उसकी उँगलियाँ मेरी हथेली पर कुछ पल ऐसे ही रहीं, जैसे एक पुरानी याद को टटोल रही हों।

मैंने उसे अपने कमरे तक चलने को कहा। कॉरिडोर में चलते हुए हमारे कंधे कभी-कभी आपस में टकरा जाते। हर बार उस घर्षण से मेरे शरीर में एक सिहरन दौड़ जाती। मैंने उसे देखा, वो सीधे आगे देख रही थी, पर उसके गालों पर हल्का सा लाली का आभास था। कमरा नंबर २१२ था। एक शांत, साफ-सुथरा कमरा, बड़ी सी खिड़की से शिप्रा नदी का नज़ारा दिख रहा था। दरवाज़ा बंद होते ही दुनिया की सारी आवाज़ें बाहर हो गयीं। सिर्फ ए.सी. की सरसराहट और हमारी अनियमित साँसों की आवाज़ बाकी थी।

“कॉफी लूँ?” मैंने पूछा, औपचारिकता निभाते हुए। वो खिड़की के पास खड़ी नज़ारा देख रही थी। “हाँ… ठीक है,” उसने कहा, मुँह मोड़े बिना। मैंने केतली चढ़ाई। कमरे में एक गहरी चुप्पी छा गयी, जिसमें सालों के अंतराल का सारा वजन महसूस हो रहा था। मैंने दो कप में कॉफी उड़ेली और उसके पास लेकर गया। जब मैंने कप उसकी तरफ बढ़ाया, तो उसने कप पकड़ा और उसी क्षण उसकी उँगलियाँ मेरी उँगलियों को छू गयीं। एक झटका सा लगा। उसने ऊपर देखा। उसकी आँखें, जो कभी शरारत से भरी रहती थीं, अब एक मदहोश सी गहराई लिए हुए थीं। ललक थी उनमें। कशिश थी।

“बैठो ना,” मेरे मुँह से निकला, आवाज़ थोड़ी कर्कश हो गयी थी। हम पलंग के किनारे बैठ गए, बीच में एक फ़ीट का फ़ासला रखते हुए। शुरुआत हुई सामान्य बातों से। नौकरी, शहर, परिवार। उसने बताया उसका तलाक हो चुका है। दो साल हो गए। बिना कोई बच्चा। उसकी आवाज़ सपाट थी, लेकिन आँखों में एक दर्द था जो शब्दों से ज़्यादा बोल रहा था। मैंने अपना हाथ पलंग पर उसके हाथ के पास रखा। उसने मेरी तरफ देखा, फिर नीचे देखा जहाँ हमारे हाथ लगभग छू रहे थे। उसने अपना हाथ हिलाया नहीं।

“तुम्हें याद है,” वो बोली, अचानक, “वो रात जब हम महाकालेश्वर के पीछे वाले बगीचे में भाग गए थे?” मैं मुस्कुराया। “हाँ, तू मेरे साथ छुपी थी, और तेरे पापा तेरी तलाश में निकले थे।” “तुमने मेरा हाथ पकड़ रखा था,” उसने कहा, आवाज़ में एक फुसफुसाहट सी, “इतना कस के… मुझे लगा मेरी उँगलियाँ टूट जाएँगी। मगर मैं चीखी नहीं। मुझे अच्छा लग रहा था।” उसकी यह बात सुनकर मेरे शरीर में एक उत्तेजना की लहर दौड़ गयी। यह कोई सामान्य याद नहीं थी। यह एक इशारा था।

मैंने जोखिम उठाया। अपना हाथ उठाकर उसके हाथ के ऊपर रख दिया। उसकी त्वचा मुलायम और गर्म थी। उसने एक गहरी सांस ली, अपनी आँखें बंद कर लीं। “राहुल…” उसने कहा, बस इतना ही। फिर उसने अपना हाथ पलटा और मेरी हथेली में अपनी उँगलियाँ भींच दीं। यह आलिंगन नहीं था, लेकिन इस स्पर्श में उतना ही विश्वास और आकर्षण था।

“मैंने तुझे हर दिन याद किया है, आशी,” मेरे मुँह से शब्द निकले। “यहाँ तक कि जब मैं किसी और के साथ था, तब भी। तेरी याद… एक प्यास की तरह थी जो कभी नहीं बुझी।” यह सच था। एक तड़प जो सालों से मेरे अंदर सुलग रही थी।

उसने अपनी आँखें खोलीं। उनमें आँसूओं की एक पतली सी चमक थी, पर वो रोई नहीं। “मुझे लगा था मैं भूल जाऊँगी। शादी करके, नई ज़िन्दगी शुरू करके। लेकिन… तुम्हारी यादें… वो एक वासना की तरह बन गयीं। हर रात सताती थीं। हर छुआछूत, हर कर्राहट जो हमने शेयर की थी, वो मेरे दिमाग में बजती रहती थी।” उसके शब्द गरम और भारी थे, हवा में लटके हुए।

मैंने और करीब जाने की कोशिश की। हमारे बीच का फ़ासला अब इंचों में था। मैं उसकी सांसों की गर्माहट महसूस कर सकता था। उसके होंठ, गुलाबी और नम, थोड़े से खुले हुए थे। उसकी नज़र मेरे होंठों पर टिकी हुई थी। यह पूर्व-क्रीड़ा नहीं थी, बल्कि उससे भी ज़्यादा तीव्र था – एक दशक के दमित इच्छाओं का विस्फोटक निर्माण।

फिर, अचानक, वो बोली, “मैं डर रही हूँ, राहुल।” “किससे?” मैंने पूछा, मेरी आवाज़ एक फुसफुसाहट में बदल गयी। “इस बात से कि अगर मैं एक बार तुझे छू दूँ… तो फिर कभी रुक नहीं पाऊँगी।” उसकी यह बात मेरे अंदर की सारी कामेच्छा को ज्वाला में बदल दी। यह एक चुनौती थी। एक इजाज़त।

मैंने और करीब जाकर उसके कान के पास फुसफुसाया, “तो मत रुक।” और फिर, जैसे कोई बाँध टूट गया हो, उसने अपना हाथ मेरे गाल पर रखा और मुझे अपनी तरफ खींच लिया।

हमारे होंठ एक दूसरे से जुड़े। पहला चुम्बन कोमल था, एक पुनः परिचय की तरह। लेकिन फिर, जैसे ही उसने एक आह भरी और अपना मुँह थोड़ा और खोला, वह कोमलता एक उग्र ललक में बदल गयी। उसने अपने होंठों से मेरे होंठों को दबाया, चूसा। मेरा हाथ उसकी पीठ पर गया, उसे मेरी तरफ भीच लिया। वो मेरे शरीर से चिपक गयी, उसके मम्मे मेरी छाती से दब गए। हमारा यह सम्बन्ध सालों की भूख का एक ज्वालामुखी था।

फिर उसने अपना सिर पीछे किया, सांस लेते हुए। उसकी आँखें जल रही थीं। “इतना इंतज़ार… इतना बेचैनी…” उसने कहा, और फिर उसने मेरी शर्ट के बटन खोलने शुरू कर दिए। उसके हाथ कांप रहे थे। मैंने उसका चेहरा पकड़ा और फिर से चूमा, इस बार और ज़्यादा तीखेपन से। मेरा हाथ उसकी पीठ से होता हुआ उसके नीचे तक गया, उसकी गांड को पकड़ते हुए, उसे मेरी तरफ दबाया। वो एक सिसकी भरी, और मेरी जीभ उसके मुँह में घुस गयी।

अब हम पूर्व-क्रीड़ा के उस दौर में थे जहाँ हर स्पर्श आग लगा रहा था। मैंने उसके कान का लोभी चाटा, निबौरी कुतरते हुए। वो सिर हिलाती, उसके बाल मेरे चेहरे से रगड़ खा रहे थे। “तुम्हारे स्तन,” मैंने फुसफुसाया, “हमेशा से मुझे पागल करते थे।” उसने मेरी कमीज़ उठा कर उतार दी, उसके नाखून मेरी पीठ पर हल्के से खिंच गए, एक रोमांच सा पैदा करते हुए। उसकी उंगलियाँ मेरे सीने पर फिरीं, मेरे निप्पलों के आसपास गुदगुदाते हुए, जिन्होंने तुरंत सख्त होकर जवाब दिया। “दिखाओ मुझे,” उसने कहा, आवाज़ में एक ऐसा दीवानापन था जो मुझे पिघला दे रहा था। “दिखाओ कि तुम कितने बेताब हो।”

यह वह क्षण था जब सारी उत्तेजना चरम पर पहुँच गयी, और काम-क्रीड़ा का वह दौर शुरू हुआ जिसकी कल्पना मैंने सालों से की थी।

उसने मुझे धक्का देकर पलंग पर लिटा दिया और खुद मेरे ऊपर आ गयी। उसने मेरे पैंट का बटन खोला, ज़िप नीची की। उसका हाथ अंदर घुसा और उसने मेरे लंड को बाहर निकाला, जो पहले से ही कड़ा और नम था। उसने उसे देखा, एक कामुक मुस्कान के साथ। “वैसा ही है,” उसने कहा, और फिर अपना सिर झुकाया।

उसने पहले सिरे को चूसा, फिर धीरे-धीरे अपना मुँह नीचे किया जब तक कि मैं उसके गले के पीछे तक नहीं पहुँच गया। उसकी जीभ नीचे से घूमती हुई, उसके हाथ नीचे के हिस्से को मसलते हुए। यह मुख मैथुन सिर्फ एक क्रिया नहीं थी; यह एक आराधना थी। उसके बाल मेरी जांघों से टकरा रहे थे, और उसकी हर चूसने की क्रिया से मेरे पैरों की उँगलियाँ मुड़ जाती थीं। “आशी… रुक…” मैंने कराहा, डरा हुआ कि कहीं मैं बहुत जल्दी खत्म न हो जाऊँ।

उसने ऊपर देखा, उसकी ठुड्डी मेरे लंड से नम थी। “नहीं,” उसने कहा, एक शरारती चमक के साथ। “आज तू मेरा है। पूरा का पूरा।” लेकिन फिर उसने खुद ही रोका। उठकर खड़ी हुई। उसने अपनी नीली कुर्ती उतार फेंकी। उसके सामने एक सफेद सूती की चोली थी, जो उसके भरे हुए स्तनों को बाँधे हुए थी। उसने पीछे का फीता खोला, और चोली भी गिर गयी। और वो वहाँ खड़ी थी, एकदम नंगी, शर्माती हुई नहीं, बल्कि गर्व से। मेरी साँसें उखड़ गयीं। वो मेरे सपनों से भी ज़्यादा खूबसूरत थी।

उसने मुझे खींचा। “अब मेरी बारी,” उसने कहा। मैं उठा और उसे पलंग के पैर की तरफ मोड़ दिया। वो आगे की तरफ झुकी, अपने हाथ पलंग के किनारे पर टिकाए। उसकी पीठ की रेखा, उसकी गांड का घुमाव… मैंने एक हाथ से उसकी कमर पकड़ी और दूसरे हाथ से अपने लंड को उसकी योनी के द्वार पर रखा। वो गर्म और पहले से ही नम थी। उसने एक आह भरी, और अपने कूल्हे पीछे की तरफ धकेले।

मैंने एक बार घुसाया। एक ही गहरी, मुलायम ठोकर में, मैं पूरी तरह अंदर समा गया। वो चिल्लायी – एक ऐसी चीख जो दर्द और आनंद का मिला-जुला स्वर था। मैंने रुका, उसे अभ्यस्त होने दिया। फिर मैंने ठोकना शुरू किया। पहले धीरे, फिर तेज़। हर ठुकाई के साथ पलंग की लकड़ी चरमराती। मेरे हाथ उसकी गांड को पकड़े हुए थे, उसे मेरी तरफ खींचते हुए हर थ्रस्ट के साथ।

फिर मैंने अपना एक हाथ आगे बढ़ाया, उसके पेट के नीचे से होते हुए, उसके जघन के बालों को पार करते हुए, और उसकी योनी के ऊपरी हिस्से पर, उसके भग के मांसल हिस्से को ढूँढ़ निकाला। मेरी उँगली उसके चूची को ढूँढ़ने लगी – वह छोटा सा बटन जो अब सख्त हो चुका था। मैंने उसे घेर लिया और उसकी योनी के अंदरूनी हिस्से की लय के साथ-साथ उसे सहलाना शुरू किया।

“हाँ! वहीं! ठीक वहीं!” वो चिल्लाई। उसकी आवाज़ भर्रा गयी थी। उसका शरीर मेरे सामने तन गया। उसकी पीठ की माँसपेशियाँ उभर आईं। मेरी उँगली गति तेज़ करती रही, जबकि मेरे कूल्हे उसे और गहराई से भेदते रहे। मैं उसकी गर्मी में डूबा हुआ था, उसकी तंगी में लिपटा हुआ। वो अब लगातार कराह रही थी, “ओह राहुल… हाँ… हाँ… मत रुको…” उसके शब्द टूट-टूट कर निकल रहे थे।

फिर वो आयी। एक तीखी, लम्बी चीख के साथ। उसका शरीर ऐंठ गया, काँपने लगा। उसकी योनी मेरे लंड के इर्द-गिर्द फड़फड़ाते हुए ज़ोर से सिकुड़ी। यह अनुभव इतना तीव्र था कि मेरी अपनी सहनशीलता टूट गयी। उसके संकुचनों ने मुझे उकसाया, मेरी अपनी गति अनियंत्रित और ऐंठ-भरी हो गयी। मैंने और गहरे ठोके, अपने आप को उसके अंदर और धकेलते हुए।

एक आखिरी, गहरी ठोकर के साथ, मैं रुका। मेरे अंदर एक विस्फोट हुआ। वासना और प्रेम और दस वर्षों के अलगाव का एक गर्म, तरल विस्फोट। मैं कराहा, मेरा सिर उसकी पीठ पर गिरा। मैं काँप रहा था, हर झटके के साथ अपना सारा तनाव उसके अंदर खाली करते हुए। हम वैसे ही खड़े रहे, सांसों से लबरेज, पसीने से तरबतर, एक-दूसरे से जुड़े हुए, जब तक कि मेरा लंड नर्म नहीं हो गया और मैं बाहर नहीं निकल आया।

वो पलंग के ऊपर गिर गयी। मैं उसके बगल में लेट गया, बिना कुछ कहे उसे अपनी बाँहों में भर लिया। उसका शरीर अभी भी हल्का सा काँप रहा था। उसकी पीठ पर पसीना चमक रहा था। मैंने उसे करीब खींचा, उसके बालों को सहलाया। कमरे में सिर्फ हमारी भारी साँसों की आवाज़ थी और बाहर से आती शिप्रा नदी की धीमी धारा की आवाज़।

लगभग पाँच मिनट तक हम चुप रहे। फिर वो बोली, उसकी आवाज़ चीखने से भर्राई हुई थी, “वो साल… वो बर्बाद नहीं गए।” उसने कहा। “वो सिर्फ… इंतज़ार कर रहे थे। इस पल के लिए।” मैंने उसकी ठुड्डी पकड़ कर उसका चेहरा मेरी तरफ किया। उसकी आँखों में वही मदहोशी थी, लेकिन अब उसमें एक शांति भी थी, एक संतुष्टि। “मैं तुझसे प्यार करता हूँ, आशी,” मैंने कहा। ये शब्द आसानी से निकले, जैसे वो हमेशा से मेरे गले में रुके हों। “मैंने हमेशा किया है।”

उसने मुस्कुराया, एक असली, खुली हुई मुस्कान। “पता है। और मैं भी तुमसे।” वो मेरी छाती पर सिर रख कर लेट गयी। हमारे बीच का तनाव जो एक रोमांच में बदल गया था, अब एक गहरी थकान और संतुष्टि में बदल चुका था। बाहर, उज्जैन की रात अपनी गर्मी में लिपटी हुई थी, लेकिन इस कमरे के अंदर, हम ठंडे थे, शांत थे, और आखिरकार, पूरे थे। यह कहानी का अंत नहीं था। यह एक नई शुरुआत थी। और इस बार, मैं जानता था, हम इसे जाने नहीं देंगे।