पुराने प्रेमी के साथ संबंध बनाना और आनंद लेते हुए समय बिताना।

उस पुरानी अलमारी को साफ करने का विचार मेरे मन में कब आया, यह तो मुझे भी याद नहीं। शायद एक उदास रविवार की निष्क्रियता ने मुझे ऐसा करने के लिए प्रेरित किया। अलमारी का ऊपरी हिस्सा, जहाँ मेरे पिता के पुराने कागज़ात और माँ की सिलाई का सामान रखा था, वहाँ धूल की एक मोटी परत जम चुकी थी। एक पुराने कार्टन को खींचते हुए, मेरी उंगलियाँ एक मोटे, चमड़े से बंधे हुए डायरी के किनारे से टकराईं। उस पर सुनहरे अक्षरों में ‘मेरे विचार’ लिखा था। मैंने उसे बाहर निकाला। यह मेरी दादी की डायरी नहीं थी, बल्कि एक पुरानी, फीकी पड़ चुकी नीली डायरी थी, जिसके पन्नों के किनारे पीले हो चुके थे।

मैंने उसे खोला। पहले पन्ने पर एक नाम लिखा था – ‘अनमोल’। और नीचे एक तारीख – 15 मार्च, 2005। मैं तब सिर्फ दस साल का था। यह डायरी मेरी नहीं थी। उत्सुकता से मैंने पन्ने पलटने शुरू किए। लिखावट सुंदर, झुकाव वाली थी, शायद किसी लड़की की। और फिर मैंने पढ़ना शुरू किया।

“आज फिर वह लाइब्रेरी में था। उसने नीली शर्ट पहनी थी, और उसके बाल हल्के से अस्त-व्यस्त थे, जैसे वह सीधे क्लास से आया हो। वह ‘द ग्रेट गैट्सबी’ की एक प्रति लेकर बैठा। मैंने उसे देखा, लेकिन वह मुझे नहीं देख पाया। या शायद देखा भी, पर अनदेखा कर दिया। काश मैं उससे बात कर पाती। सिर्फ एक बार। उसका नाम प्रियांशु है। इंजीनियरिंग सेकंड ईयर। मैं उसके बारे में सब जानती हूँ, लेकिन वह मेरे अस्तित्व से अनजान है। यह एकतरफा प्यार कब तक चलेगा, अनमोल?”

मेरी साँस रुक सी गई। प्रियांशु। मेरा नाम। 2005। मैं इंजीनियरिंग सेकंड ईयर में था। सेंट जेवियर्स कॉलेज, दिल्ली। और लाइब्रेरी… मुझे याद आया, मैं अक्सर ‘द ग्रेट गैट्सबी’ पढ़ने लाइब्रेरी जाता था। लेकिन अनमोल? मुझे कोई अनमोल याद नहीं थी। मैंने और पन्ने पलटे। डायरी भरी पड़ी थी ऐसे ही एंट्रीज़ से। मेरे बारे में। मेरी आदतों, मेरी पसंद-नापसंद, मेरे दोस्तों के बारे में। यह डरावना और मोहक दोनों था। एक लड़की, जिसे मैं नहीं जानता था, ने मुझे इतनी गहराई से देखा था, जबकि मैं पूरी तरह अनभिज्ञ था।

एक एंट्री ने मेरा दिल दहला दिया। “आज उसने मेरी तरफ देखा। वास्तव में देखा। मैं कैफेटेरिया में अपनी चाय ले रही थी, और वह दरवाज़े पर खड़ा था। हमारी नज़रें मिलीं। सिर्फ एक सेकंड के लिए। लेकिन उस एक सेकंड में, मुझे लगा जैसे दुनिया रुक सी गई। उसने मुस्कुराया। एक हल्की सी, शर्मीली सी मुस्कान। और फिर चला गया। मेरा दिन बन गया। मैं उस मुस्कान को कभी नहीं भूल पाऊँगी।”

मैंने डायरी बंद कर दी। मेरे हाथ काँप रहे थे। यह कौन थी? कहाँ थी वह? क्या उसने कभी मुझसे बात करने की हिम्मत की? डायरी अचानक बीच में ही खत्म हो गई थी। आखिरी एंट्री 30 अगस्त, 2007 की थी। “कल वह शहर छोड़ रहा है। कैंपस प्लेसमेंट। मुंबई। मैंने फैसला कर लिया है। मैं उसे बताऊँगी। कल। लाइब्रेरी में। चाहे कुछ भी हो जाए। मैं अपना दिल उसके सामने रख दूँगी। अगर वह मुझे ठुकरा भी दे, तो कम से कम मैं जान जाऊँगी कि मैंने कोशिश की। प्रियांशु, तुम्हारे लिए मेरे दिल की हर धड़कन तुम्हारे नाम है। तुम्हें पता होना चाहिए।”

और फिर कुछ नहीं। अगला पन्ना खाली था। क्या हुआ था कल? क्या उसने मुझसे बात की? मुझे कुछ याद नहीं था। 2007… हाँ, मैं मुंबई के एक कंपनी में प्लेसमेंट के बाद चला गया था। लेकिन उससे पहले का आखिरी दिन… धुंधला सा था। पार्टी, गुडबाय… लेकिन कोई लड़की नहीं जो मुझसे अपने प्यार का इज़हार करती।

एक जुनून सवार हो गया। मुझे उसे ढूँढना था। अनमोल को। सोशल मीडिया मेरा पहला पड़ाव था। घंटों खोजबीन के बाद, एक प्रोफाइल मिली। अनमोल शर्मा। प्रोफाइल पिक्चर में एक सुंदर, गंभीर चेहरा था। उम्र लगभग मेरी ही होगी। लोकेशन: नोएडा। मैंने एक फ्रेंड रिक्वेस्ट भेजी, और एक मैसेज के साथ: “क्या आप सेंट जेवियर्स, 2005-07 बैच की हैं? मैं प्रियांशु हूँ।”

जवाब तीन दिन बाद आया। एक सिंपल “हाँ।”

हमारी बातचीत शुरू हुई। शुरुआत औपचारिक थी। पुराने दोस्तों की तरह। लेकिन डायरी का ज़िक्र मैंने नहीं किया। न ही उसने। हमने जीवन के बारे में बात की। मैंने बताया कि मैं एक सफल IT कंसल्टेंट हूँ, शादीशुदा हूँ, मेरी पत्नी ऋचा एक डेंटिस्ट है, हमारा एक बेटा है। जीवन सही चल रहा था। उसने बताया कि वह एक पब्लिशिंग हाउस में एडिटर है, अविवाहित है, और अपने माता-पिता के साथ रहती है। उसकी ज़िंदगी शांत, सादगी भरी लग रही थी।

एक महीने तक चैट करने के बाद, हमने मिलने का फैसला किया। एक सुरक्षित, पब्लिक जगह। दिल्ली के साकेत में एक छोटा सा, शांत कैफे, ‘ब्लू टोकरी’।

वह दिन आया। मेरा दिल जोर-जोर से धड़क रहा था, जैसे कोई टीनएजर पहली डेट पर जा रहा हो। कैफे के अंदर, एक कोने की मेज पर, एक औरत बैठी थी। उसने हल्के गुलाबी रंग की कुर्ती पहनी थी, और उसके लंबे बाल खुले हुए थे। जैसे ही मैं पास गया, उसने सिर उठाया। और वही चेहरा, प्रोफाइल पिक्चर से कहीं ज़्यादा खूबसूरत, कहीं ज़्यादा गहराई लिए हुए। उसकी आँखों में एक झिलमिलाहट थी, एक दर्द भरी चमक, जो सालों से वहाँ दबी हुई थी।

“प्रियांशु,” उसने मुस्कुराते हुए कहा, आवाज़ एकदम मधुर।
“अनमोल,” मैंने जवाब दिया, बैठते हुए।

शुरुआती कुछ मिनट अजीब थे। फिर बातचीत का सिलसिला शुरू हुआ। कॉलेज के दिन, प्रोफेसर, कैंपस की घटनाएँ। हम दोनों ही अपने वर्तमान के बारे में सच्चाई छिपा रहे थे। मैंने नहीं बताया कि ऋचा और मेरे रिश्ते में पिछले कुछ सालों से एक गहरी खाई है, कि हम सिर्फ दिखावे के लिए साथ हैं, हमारे बीच कोई आत्मीयता नहीं बची। उसने नहीं बताया कि उसकी नौकरी अस्थिर है, कि वह गहरी अकेलापन और अवसाद से जूझ रही है। हम दोनों ने एक परफेक्ट लाइफ का ढोंग रचा हुआ था।

लेकिन उस दिन के बाद, कुछ टूटा। हम मिलने लगे। पहले महीने में एक बार, फिर हफ्ते में एक बार। ये मुलाकातें गुप्त थीं। कोलंबिया मार्केट में चहलकदमी, लोधी गार्डन में शाम की सैर, प्रगति मैदान के पास छिपे हुए छोटे रेस्तराँ में डिनर। हर मुलाकात में, पुरानी भावनाएँ, जो कभी अभिव्यक्त नहीं हुई थीं, सतह पर आने लगीं। एक तनाव, एक खिंचाव पैदा हो गया था।

एक शाम, लोधी गार्डन में, हम एक सुनसान बेंच पर बैठे थे। हवा में सर्दी की शुरुआत थी।
“तुम्हें याद है,” उसने अचानक कहा, “कैंपस की वह लाइब्रेरी? वह कोने वाली सीट, जहाँ तुम हमेशा ‘गैट्सबी’ लेकर बैठते थे?”
मैं चौंका। “हाँ… याद है। तुम वहाँ आती थीं?”
उसने देर तक मेरी आँखों में देखा, जैसे कोई फैसला कर रही हो। फिर धीरे से कहा, “हर दिन। तीन साल तक।”
मेरा गला सूख गया। “क्यों?”
“क्योंकि तुम वहाँ होते थे,” उसने सीधे-सीधे कहा। उसकी आवाज़ में कोई पछतावा नहीं, बस एक सच्चाई थी।

उस रात, कैफे से बाहर निकलते हुए, बारिश होने लगी। हम दोनों के पास छाता नहीं था। पास ही मेरी कार खड़ी थी। “चलो, मैं तुम्हें छोड़ देता हूँ,” मैंने कहा। वह सहमत हो गई।

कार के अंदर का वातावरण अलग था। बारिश की बूंदों की आवाज़, और दो लोगों की साँसों की आवाज़। गाड़ी चलाने से पहले, मैंने उसकी तरफ देखा। उसके बाल थोड़े गीले हो गए थे, और उसकी गर्दन पर पानी की बूंदें चमक रही थीं। उसकी गुलाबी कुर्ती गीली होकर उसके शरीर से चिपक गई थी, उसके स्तनों के आकार को उभार रही थी। मैं अपनी नज़रें हटा नहीं पाया।

“तुम देख रहे हो,” उसने कहा, आवाज़ में एक चुनौती थी, शर्म नहीं।
“माफ़ करना,” मैंने कहा, गला साफ़ करते हुए।
“मत माँफ़ करो,” उसने कहा, और अपना हाथ बढ़ाकर मेरे गाल को छू लिया। उसका स्पर्श बिजली की तरह था। “इतने सालों बाद भी, तुम्हारा चेहरा वैसा ही है।”

और फिर वह हुआ, जिसका इंतज़ार शायद दोनों कर रहे थे। मैंने झुककर उसके होंठों को चूम लिया। यह कोमल शुरुआत थी, लेकिन जल्दी ही यह चूमना एक तूफान में बदल गया। सालों के दबे हुए प्यार, इच्छा और अधूरेपन ने इस एक चुंबन में सब कुछ उड़ेल दिया। उसने जवाब दिया, उसके हाथ मेरे बालों में फँस गए। कार का अंदरूनी हिस्सा भाप से भर गया। हमारी साँसें तेज़ हो गईं।

अचानक उसने मुझे धक्का देकर अलग किया। “रुको,” उसने कहा, हाँफते हुए। “यह गलत है। तुम शादीशुदा हो।”
“और तुम?” मैंने पूछा, उसकी आँखों में झाँकते हुए।
“मैं… मैं कभी तुम्हारी थी ही नहीं,” उसने कहा, आवाज़ में दर्द था। “लेकिन आज रात… मैं बस इतना चाहती हूँ कि तुम मेरे हों। बस आज रात।”

उसने मेरे कान के पास अपने होंठ लाकर फुसफुसाया, “मुझे अपने घर ले चलो। वहाँ जहाँ कोई नहीं है।”

मेरा दिमाग चेतावनी दे रहा था, लेकिन मेरा शरीर, मेरी इच्छाएँ सब कुछ दबा चुकी थीं। मैंने गाड़ी स्टार्ट की। रास्ते भर हम चुप थे, लेकिन हवा में यौन तनाव इतना गाढ़ा था कि उसे महसूस किया जा सकता था। मेरे अपार्टमेंट में (ऋचा बच्चे को लेकर अपने मायके गई हुई थी), दरवाज़ा बंद होते ही, हम फिर से एक-दूसरे से चिपक गए।

वह कोमलता गायब हो चुकी थी। अब एक जानवरी ज़रूरत थी। मैंने उसे दीवार से लगा दिया, और उसके होंठों पर जोरदार चुंबन देते हुए, मेरे हाथ उसकी कमर पर फिर उसके स्तनों पर गए। उसने एक गहरी आह भरी, और अपनी जांघों से मेरी जांघों को दबाया। “इतने साल…” वह बुदबुदाई, “…मैंने सिर्फ इसकी कल्पना की थी।”

मैंने उसकी कुर्ती के बटन खोलने शुरू किए। एक-एक करके। उसने मेरी शर्ट उतार फेंकी। उसकी उंगलियाँ मेरे सीने पर, फिर मेरे पेट पर नाचने लगीं। जब उसकी कुर्ती खुल गई, तो उसने ब्रा नहीं पहनी थी। उसके स्तन सुडौल, भरे हुए थे, उनके अग्रभाग गहरे गुलाबी और सख्त थे। मैंने देखते ही अपना मुँह उन पर रख दिया। उसने चीख़ मारी, और मेरे बालों को जोर से पकड़ लिया। मैंने एक को अपने मुँह में ले लिया, चूसा, दाँतों से हल्का सा काटा। उसकी कराहनें और तेज़ हो गईं। “हाँ… ऐसे ही… और जोर से,” वह बोली।

मेरा एक हाथ उसकी सलवार के नीचे सरक गया, उसकी जांघ के मुलायम अंदरूनी हिस्से को महसूस करता हुआ, फिर उसके अंडरवियर के कपड़े को। वह पहले से ही गीली थी। मैंने कपड़े को एक तरफ़ करके अपनी एक उंगली उसकी योनि में डाल दी। वह गर्म और तंग थी। उसने अपना सिर पीछे की ओर झटका दिया, दीवार से टकराते हुए। “और… दो… दो उंगलियाँ,” उसने माँगा।

मैंने वैसा ही किया, अपनी उंगलियाँ उसके अंदर डालते हुए, एक गति शुरू की। उसकी साँसें फूलने लगीं, और वह मेरे कान में फुसफुसाने लगी, “तुम्हारा लंड… मुझे चाहिए… अभी।”

मैंने उसे बिस्तर की तरफ़ धकेला। वह गिरी, और तुरंत अपनी सलवार और अंडरवियर उतार फेंकी। वह पूरी तरह नग्न थी, और मैंने कुछ पल के लिए बस उसे निहारा। वह शर्मा नहीं रही थी। उसने अपने घुटने मोड़े, और अपने आप को मेरे सामने पेश किया। “आजा, प्रियांशु। वो सब भूल जा जो हुआ। बस यहाँ और अभी हो।”

मैंने अपनी पैंट उतारी। मेरा लंड पहले से ही कड़ा और तनाव में था। मैं उसके ऊपर चढ़ गया, लेकिन उसने मुझे रोक दिया। “रुको,” उसने कहा, और मुझे पलटकर नीचे लिटा दिया। “पहले मैं।”

वह मेरे ऊपर सवार हो गई, और बिना किसी और देरी के, मेरे लंड को अपने हाथ में लेकर, सीधे अपनी योनि पर बैठ गई। वह धीरे-धीरे नीचे आई, हर इंच को महसूस करते हुए, उसकी आँखें मेरी आँखों में जकड़ी हुई थीं। जब वह पूरी तरह नीचे आ गई, तो दोनों ने एक साथ कराहा। वह गर्म, तंग और आर्द्र थी। उसने झटका दिया, अपने कूल्हों को घुमाया। “यह मेरा है,” उसने दावे से कहा, गति बढ़ाते हुए। “आज रात यह सिर्फ मेरा है।”

उसने नियंत्रण संभाल लिया। वह ऊपर-नीचे हो रही थी, आगे-पीछे, अपने कूल्हों को घुमाते हुए। उसके स्तन हवा में नाच रहे थे। मैंने उन्हें पकड़ लिया, दबाया, उनके अग्रभाग को अपनी उंगलियों के बीच रगड़ा। वह और तेज़ हो गई, उसकी साँसें छोटी-छोटी हो रही थीं। “हाँ… हाँ… ऐसे ही… मुझे चोदो, प्रियांशु… सालों से मैं तुम्हारी चुदाई का इंतज़ार कर रही थी,” वह चिल्लाई।

उसके शब्दों ने मुझे पागल कर दिया। मैंने उसे पलट दिया, अब मैं ऊपर था। मैंने उसकी टांगें अपने कंधों पर रख लीं, और जोर से, गहरे, तेज़ थ्रस्ट्स मारने शुरू किए। वह चीख़ने लगी, उसकी उंगलियाँ चादरों में घुस गईं। “और जोर से! मुझे तोड़ दो!” उसकी आवाज़ भर्रा गई थी।

मैंने वैसा ही किया। मेरे कूल्हे एक मशीन की तरह चल रहे थे, उसे बिस्तर में धकेलते हुए। हवा में केवल हमारी कराहनें, चादरों की सरसराहट और शरीरों के टकराने की आवाज़ थी। मैंने उसे गुदा के पास, उसकी जांघ के पीछे काट लिया। उसने और जोर से चिल्लाया। उसकी योनि मेरे लंड के इर्द-गिर्द सिकुड़ने लगी, संकेत कि वह चरम पर पहुँच रही है।

“मैं आ रही हूँ…” वह कराही।
“मेरे साथ,” मैंने गुर्राते हुए कहा, और एक आखिरी, गहरा धक्का देकर, मैंने भी अपना वीर्य उसके अंदर छोड़ दिया। वह काँप उठी, एक लंबी, दर्द भरी चीख़ के साथ, और मैं उस पर गिर पड़ा, दोनों हाँफ रहे थे, पसीने से लथपथ।

कमरे में सन्नाटा छा गया, केवल हमारे दिलों की धड़कनें सुनाई दे रही थीं। मैं उसके पास लेटा रहा, मेरा सिर उसके स्तनों पर टिका हुआ था। उसने अपनी उंगलियाँ मेरे बालों में घुमाईं।

“तुम्हें पता है,” उसने धीरे से कहा, “30 अगस्त, 2007 को मैं लाइब्रेरी गई थी। तुमसे बात करने।”
मैंने सिर उठाया। “और?”
“और तुम वहाँ नहीं थे। तुम्हारे दोस्त ने बताया कि तुम पहले ही शहर छोड़कर जा चुके हो। प्लेसमेंट सेलिब्रेशन के लिए। मैं वहीं खड़ी रह गई। मेरी हिम्मत, मेरा सब कुछ… बेकार चला गया।”

उसकी आँखों में आँसू थे। मैंने उसे चूमा। “माफ़ करना।”
“मत माँफ़ करो,” उसने फिर कहा। “आज रात ने सब कुछ ठीक कर दिया।”

लेकिन ऐसा नहीं था। यह शुरुआत थी। उस रात के बाद, हम और भी बार मिले। हर बार जुनून और भावनाएँ और गहरी होती गईं। मैं ऋचा से दूर होता गया। अनमोल मेरी एक लत बन गई। हमारे फोन पर गुप्त संदेशों का आदान-प्रदान होने लगा। कभी कोड वर्ड्स में, कभी पुरानी कविताओं की लाइनें भेजकर।

फिर वह दिन आया। मैं ऑफिस से लौटा, तो ऋचा सोफे पर बैठी थी, उसके हाथ में मेरा फोन था। उसका चेहरा पत्थर जैसा ठंडा था।
“यह ‘मेरी चांदनी रात’ कौन है?” उसने पूछा, आवाज़ में जहर घुला हुआ था। उसने मेरे फोन को मेरी तरफ़ फेंका। स्क्रीन पर एक मैसेज खुला था, अनमोल का: “आज की रात भी तुम्हारे बिना अधूरी है। तुम्हारी गंध अभी भी मेरे तकिए पर है। कल मिलोगे? वही जगह, वही समय। तुम्हारी अनमोल।”

सब कुछ सामने आ गया। झूठ, बहाने, गुप्त मुलाकातें। ऋचा ने सब जान लिया था। उसने चीख़-चिल्लाहट शुरू कर दी, आँसू बहाए, धमकियाँ दीं। मैं चुपचाप सब सुनता रहा। मेरे अंदर कोई पछतावा नहीं था, बस एक खालीपन था।

अगले दिन, मैं अनमोल से मिला। उसने मेरे चेहरे की उदासी देख ली। “उसे पता चल गया, है ना?” उसने पूछा।
मैंने हाँ में सिर हिलाया।
“तो अब क्या?” उसकी आवाज़ में डर था।
“अब मुझे चुनना होगा,” मैंने कहा। “तुम और मेरा अतीत, या ऋचा और मेरा वर्तमान।”

उसने मेरा हाथ पकड़ लिया। “प्रियांशु, हमने इतने साल गँवा दिए। दोबारा मौका नहीं मिलेगा। मैं तुमसे प्यार करती हूँ। हमेशा से की है। मेरा जीवन तब से खाली है जब से तुम चले गए। मुझे और अकेला मत छोड़ दो।”

उसकी आँखों में वही भाव था, जो उस डायरी की एंट्रीज़ में था। शुद्ध, निस्वार्थ, अटूट प्यार। ऋचा के साथ मेरा रिश्ता सालों पहले ही मर चुका था, हम सिर्फ दिखावा कर रहे थे। लेकिन यहाँ, अनमोल के साथ, एक जीवित, साँस लेता हुआ प्यार था, जो समय की धूल के नीचे दबा हुआ था, लेकिन मरा नहीं था।

मैंने उसकी ओर देखा। उसकी आँखें, उसके होंठ, वह चेहरा जो मेरे सपनों में सालों तक रहा था बिना नाम के।
“तुम्हें पता है,” मैंने कहा, “उस डायरी में तुमने लिखा था कि तुम मुझसे बात करने की हिम्मत नहीं जुटा पा रही थीं।”
उसने हाँ में सिर हिलाया।
“तो अब मैं बोलता हूँ,” मैंने कहा, और घुटने टेक दिए। उसके सामने नहीं, बल्कि उसके सामने, एक सच्चे प्यार के सामने, जो इंतज़ार करता रहा। “अनमोल, तुम मेरी ज़िंदगी का सबसे खूबसूरत रहस्य हो। मैं तुम्हारे बिना वापस नहीं जा सकता। मेरा वर्तमान एक झूठ है। मेरा भविष्य… अगर तुम मुझे चाहो तो, तुम्हारे साथ है।”

उसकी आँखों से आँसू बह निकले। लेकिन这次, वे खुशी के आँसू थे। उसने मेरा हाथ खींचकर मुझे उठाया, और मुझे जोर से चूमा। “मैं हमेशा से तुम्हारी हूँ,” उसने फुसफुसाया। “अब और हमेशा के लिए।”

और उस पल, मैंने अपना फैसला कर लिया। मैंने अपना पुराना प्रेम चुना, उस सच्चाई को चुना जो सालों से मेरे इतने करीब थी कि मैं उसे देख ही नहीं पाया। वर्तमान के झूठे रिश्ते को छोड़कर, मैंने उस अधूरे प्रेम कहानी को पूरा करने का रास्ता चुना, जिसकी शुरुआत एक पुरानी डायरी में हुई थी, और जिसका अंत अब हम दोनों मिलकर लिखेंगे।