मुझे आज भी वो रात याद है, बिल्कुल साफ़, हर एक पल, हर एक स्पर्श, हर एक आहट। मैं रवि शाही हूं, और ये कहानी है मेरी, उस रात की, जब मैंने सोचा था कि मैं कंट्रोल में हूं, लेकिन असल में कंट्रोल किसी और के हाथों में था। और वो कोई और नहीं, निशा राय थी।
मैं मुजफ्फरपुर में पला-बढ़ा हूं। यहां की गर्मी, यहां की धूल, यहां के लिच्छवी नगर के मोहल्ले, सब कुछ मेरी रगों में घुला हुआ है। मेरा बचपन सादा था। पापा का छोटा-सा हार्डवेयर स्टोर, मम्मी का स्कूल में टीचर होना। मैंने यहीं से पढ़ाई की और फिर एक प्राइवेट बैंक में नौकरी पकड़ ली। ज़िंदगी एक ट्रैक पर चल रही थी – ऑफिस, दोस्तों के साथ चाय की दुकान पर गप्पें, घर, सोना, और फिर वही सब। फिर मैं निशा से मिला।
पहली बार मैंने उसे सिटी सेंटर के पास वाले ‘ब्लू मून’ कैफे में देखा था। वो एक टेबल पर अकेली बैठी थी, लैपटॉप पर कुछ टाइप कर रही थी, और कॉफ़ी का एक सिप लेते हुए बाहर बारिश को देख रही थी। उसकी मौजूदगी ने पूरे कमरे को किसी तरह बदल दिया था। उसके लंबे, काले बाल कंधों पर बिखरे हुए थे, एक साधारण सी सफ़ेद कुर्ती पहनी हुई थी और नीली जींस। उसके होंठों पर एक हल्की सी मुस्कान थी, जैसे कोई दिलचस्प सोच रही हो। उसकी आंखें… शायद उसकी सबसे ख़ास चीज़ थीं। बड़ी-बड़ी, काजल लगी हुई, और एक अजीब सी गहराई लिए हुए। वो सिर्फ़ बैठी थी, लेकिन एक तरह का आकर्षण उसके आसपास घूम रहा था। मैं उसकी तरफ़ देखता रह गया, इतना कि मेरे दोस्त आदित्य ने मेरी कोहनी में धक्का दिया और कहा, “अरे, ध्यान कहां है? देखते रह गए। पता है कौन है वो? निशा राय। नई आई है टाउन में। कहते हैं डिज़ाइनर है।”
उस दिन तो बस नज़रें मिलीं, एक पल के लिए। उसने मेरी तरफ़ देखा, मैंने उसकी तरफ़। कोई ख़ास बात नहीं हुई। लेकिन उस नज़रों के मिलने में कुछ था – एक सवाल, एक दिलचस्पी। फिर कुछ हफ़्तों बाद, एक कॉमन फ्रेंड के जन्मदिन की पार्टी में हम फिर मिले। वहां उसने पहली बार मुझसे बात की। उसकी आवाज़ मुलायम थी, लेकिन उसमें एक तरह की मज़बूती भी थी। वो मुजफ्फरपुर के बारे में पूछ रही थी, अच्छी जगहों के बारे में। मैंने उसे बताया कि शाही समोसे वाला ठेला कहां मिलता है, और कबड्डी की प्रैक्टिस कहां होती है। वो मेरी बातें सुनकर हंस रही थी। उसकी हंसी की आवाज़ मुझे बहुत पसंद आई।
धीरे-धीरे हम दोस्त बन गए। वो दिल्ली से आई थी, फ्रीलांस ग्राफिक डिज़ाइनर थी। उसका अपना एक छोटा सा घर था, जो उसने रेंट पर लिया था, गांधी नगर के एक शांत लेन में। मैं उसे अक्सर मिलता, कभी चाय पीने, कभी साथ में मूवी देखने। हर बार मिलने पर मैं उसे और बेहतर तरीके से जान पाता। वो बहुत सीधी थी, जो सोचती थी वो कह देती थी। उसमें एक तरह की बेफिक्री थी, जो मुझ जैसे ‘सेटल्ड’ इंसान को आकर्षित करती थी। और फिर उसका शरीर… मैं मानता हूं, मैं उसकी तरफ़ आकर्षित था। वो लंबी नहीं थी, लेकिन उसके शरीर का अनुपात बिल्कुल सही था। उसके स्तन आकार में थे, न ज़्यादा बड़े न छोटे, और उसकी कमर पतली थी। वो जब चलती थी, तो एक लयबद्ध तरीके से, जैसे कोई अपना ही संगीत सुन रहा हो। उसके हाथ नाज़ुक थे, लेकिन उनमें ताकत थी, ख़ासकर जब वो स्केच बनाती थी। उसकी गर्दन लंबी थी, और जब वो अपने बाल पीछे करती थी, तो वहां का नाज़ुक क्षेत्र दिखता था, जो मेरा ध्यान खींच लेता था।
मेरा अपना शरीर? मैंने हमेशा खुद को औसत समझा। मैं जिम जाता था, तो शरीर ठीक-ठाक बना हुआ था। छाती चौड़ी थी, बाजू मज़बूत थे। मेरे दोस्त कहते थे कि मेरा चेहरा ‘इंनोसेंट’ लगता है, जो शायद सही भी था। मैं ज़्यादा बातूनी नहीं था, लेकिन निशा के साथ मैं खुल जाता था।
बिल्डअप धीरे-धीरे हुआ। छोटी-छोटी बातें। कभी चाय का कप पास करते हुए हमारी उंगलियों का छू जाना, और फिर तुरंत हट जाना, लेकिन उस स्पर्श की गर्मी बनी रहना। कभी बात करते-करते अचानक चुप्पी पड़ जाना, और हम दोनों का एक-दूसरे की आंखों में देखते रह जाना। वो कभी-कभी मुझे ऐसे देखती थी, जैसे मैं कोई पज़ल हूं जिसे वो सुलझाना चाहती है। एक बार हम उसके घर पर थे, वो अपने प्रोजेक्ट पर काम कर रही थी और मैं किताब पढ़ रहा था। अचानक उसने कहा, “रवि, तुम्हारी आंखों का रंग बहुत अच्छा है। बादलों जैसा।” मैं चौंक गया। कोई लड़की मुझे इतनी सीधी तारीफ़ नहीं करती थी। मैंने कुछ कहा नहीं, बस मुस्कुरा दिया। वो भी मुस्कुराई और फिर अपने काम में लग गई। लेकिन उसके बाद से, हमारे बीच एक तनाव बनने लगा था। एक अच्छा तनाव, जिसमें हर मुलाकात के दौरान हमारे बीच की हवा गर्म और भारी लगने लगी।
एक शाम, वो मेरे घर आई। मेरे माता-पिता अपने रिश्तेदारों के यहां गए हुए थे। हमने खाना बनाया – साधारण दाल-चावल और आलू की भजिया। खाने के बाद हम लिविंग रूम के सोफे पर बैठे, टीवी पर कोई शो चल रहा था, लेकिन हम दोनों का ध्यान उस पर नहीं था। वो मेरे पास बैठी थी, उसके पैर मुड़े हुए थे, और उसकी जांघ मेरी जांघ से छू रही थी। एक हल्का सा, लगातार स्पर्श। मैंने उसकी तरफ़ देखा। वो पहले से ही मेरी तरफ़ देख रही थी, उसकी आंखों में एक चमक थी, एक ऐसी चमक जो मेरे पेट में तितलियां उड़ाने लगी।
“तुम क्या सोच रहे हो?” उसने पूछा, आवाज़ एकदम शांत।
“कुछ नहीं,” मैंने कहा, लेकिन मेरी आवाज़ थोड़ी भारी लगी।
वो मुस्कुराई और धीरे से अपना हाथ बढ़ाया। उसने मेरे गाल को अपनी उंगलियों से सहलाया। उस स्पर्श में एक कोमलता थी, लेकिन एक दावेदारी भी थी। मेरी सांसें तेज़ हो गईं। उसने अपना चेहरा करीब लाया। हमारी नाकें लगभग छू रही थीं। मैं उसकी सांसों की गर्मी महसूस कर सकता था। फिर उसने मेरे होंठों को अपने होंठों से छुआ। पहला चुंबन कोमल था, एक प्रश्न की तरह। फिर दूसरा, ज़्यादा दबाव के साथ। मैंने जवाब दिया, अपने होंठों को उसके होंठों पर दबाते हुए। हमारे चुंबन धीरे-धीरे गहरे होते गए। उसने अपनी जीभ से मेरे होंठों को खोला और मेरे मुंह में घुस गई। स्वाद मीठा था, चाय और उसके लिप बाम का मिला-जुला। मेरे हाथ उसकी पीठ पर गए, उसे मेरे करीब खींचा। वो मेरे सीने से दब गई। हमारे शरीर एक-दूसरे के साथ फिट हो गए, जैसे पहेली के दो टुकड़े।
फिर वो अचानक पीछे हट गई। उसकी आंखों में अब एक अलग ही आग थी। “चलो,” उसने कहा, और मेरा हाथ पकड़कर मुझे मेरे ही बेडरूम की तरफ़ खींच लिया। कमरे में अंधेरा था, सिर्फ़ बाहर की स्ट्रीट लाइट की हल्की रोशनी आ रही थी। वो मेरे सामने खड़ी हो गई और मेरी शर्ट के बटन खोलने लगी। उसके हाथों की उंगलियां मेरी छाती पर फिसल रही थीं, हर बटन खुलने पर मेरी त्वचा पर एक ठंडी हवा का झोंका लगता। जब आखिरी बटन खुला, तो उसने शर्ट को मेरे कंधों से नीचे सरका दिया। उसकी नज़रें मेरी छाती पर टिक गईं। फिर उसने अपना सिर झुकाया और मेरे एक निप्पल को अपने होंठों से छुआ। मैं सिहर उठा। उसने अपनी जीभ से उसे चाटा, फिर हल्का सा दबाया। एक गर्म लहर मेरी रीढ़ की हड्डी से होती हुई नीचे तक उतर गई। उसने वहीं से शुरुआत की, अपने होंठों को मेरे पेट की तरफ़ ले जाते हुए। हर एक इंच पर उसकी जीभ का स्पर्श, उसके नरम होंठों का दबाव… मैं कराह उठा। मेरे हाथ उसके बालों में चले गए, लेकिन उसने मेरे हाथ पकड़ लिए और उन्हें वापस मेरी तरफ़ धकेल दिया। “नहीं,” उसने फुसफुसाया, “आज तुम हाथ नहीं हिला सकते।”
ये सुनकर मेरे अंदर एक अजीब सी उत्तेजना फूट पड़ी। उसने मेरे पैंट का बटन खोला और ज़िप नीचे की। फिर वो घुटनों के बल नीचे आ गई। उसने मुझे अपने हाथों से पकड़ा, एक मज़बूत पकड़। मेरी नब्ज़ तेज़ हो रही थी। उसने मुझे देखा, आंखों में एक शरारत भरी चुनौती। फिर उसने अपना मुंह आगे बढ़ाया और मुझे अपने होंठों से छुआ, सिर्फ़ टिप को। ये एक इलेक्ट्रिक शॉक की तरह था। मैंने एक तेज़ सांस ली। उसने फिर से किया, इस बार अपनी जीभ का इस्तेमाल करते हुए। वो बस टिप पर ही खेल रही थी, चाट रही थी, हल्का सा चूस रही थी, और फिर रुक जाती थी, जब मैं कराहने लगता था। ये एक तड़पाने वाला खेल था। हर बार जब मैं लगभग पूरी तरह उसके मुंह में जाने की उम्मीद करता, वो पीछे हट जाती, एक रहस्यमयी मुस्कान के साथ। “प्लीज़, निशा,” मैंने हांफते हुए कहा। उसने कोई जवाब नहीं दिया, बस मुस्कुराती रही।
फिर वो उठ खड़ी हुई। उसने अपना कुर्ता उतार फेंका। उसके नीचे एक साधारण सा काले रंग का लेस वाला ब्रा था। उसने उसे भी खोल दिया। उसके स्तन बाहर आ गए, और स्ट्रीट लाइट की रोशनी में वो खूबसूरत लग रहे थे। उसने अपनी जींस उतारी, और अब वो सिर्फ़ एक मैचिंग ब्लैक पैंटी में खड़ी थी। वो बिस्तर पर चढ़ी और मेरे ऊपर आ गई, अपने घुटनों को मेरी कमर के दोनों तरफ़ टिकाते हुए। उसने मेरे हाथ पकड़े और उन्हें बेड के हेडबोर्ड की लोहे की सलाखों के पास ले गई। फिर, अपने एक हाथ से मेरे दोनों कलाइयों को मज़बूती से पकड़े रखते हुए, उसने दूसरे हाथ से बेडसाइड टेबल के ड्रॉअर से एक जोड़ी चमकदार, धातु की हथकड़ियां निकालीं। मेरी आंखें फैल गईं। “ये क्या…” मैंने कहा। “श्श्श,” उसने कहा, और तेज़ी से मेरी कलाइयों को हथकड़ियों से हेडबोर्ड की सलाख से कसकर बांध दिया। क्लिक की आवाज़ ने कमरे की हवा में एक फिनाले की तरह गूंज छोड़ी। मैं अब पूरी तरह से उसके कब्ज़े में था। मेरे हाथ ऊपर फैले हुए थे, मेरी छाती खुली हुई थी, और मैं बिल्कुल असहाय था। इस असहायता में एक अजीब सी आज़ादी थी। मुझे कुछ नहीं करना था, बस महसूस करना था।
उसने मेरी छाती पर झुककर फिर से चुंबन करना शुरू किया, लेकिन इस बार और भी धीरे-धीरे, और भी जानबूझकर। फिर वो नीचे की तरफ़ बढ़ी, अपनी जीभ से मेरे पेट के मसल्स का अनुसरण करती हुई। वो मेरे कूल्हों तक पहुंची, और फिर वापस ऊपर आई। अब वो मेरे ऊपर बैठी थी, मेरी कमर पर। उसने मुझे फिर से अपने हाथों में लिया, इस बार एक दृढ़, नियंत्रित गति से स्ट्रोक करने लगी। हर स्ट्रोक के साथ मेरी सांसें फूलने लगीं। फिर, बिना किसी चेतावनी के, वो नीचे झुकी और मुझे अपने मुंह में ले लिया। इस बार कोई टीज़िंग नहीं थी। वो गहराई तक गई, अपनी जीभ का पूरा इस्तेमाल करते हुए। मेरे सिर ने तकिए में धंसना शुरू कर दिया। मैंने अपनी मुट्ठियां बंद कीं, हथकड़ियों की जंजीरें खनखनाईं। वो एक लय में चल रही थी, ऊपर-नीचे, अपने हाथों का समन्वय बनाते हुए। मैं कगार पर पहुंच रहा था, मेरे पैरों की मांसपेशियां तन गईं। तभी उसने रोक दिया। वो ऊपर आई, उसके होंठ चमक रहे थे। “अभी नहीं,” उसने कहा, आवाज़ में एक शांत आदेश।
वो मेरे ऊपर से उतरी और अपनी पैंटी भी उतार फेंकी। फिर वो वापस मेरे ऊपर आई, इस बार अपने घुटनों को मेरे कूल्हों के पास टिकाते हुए। उसने मुझे अपने हाथ से पकड़ा और खुद को सही पोजिशन में लायी। मैं उसके प्रवेश द्वार के गर्म, नम स्पर्श को महसूस कर सकता था। उसने मेरी नज़रों में देखा, एक लंबी, तीव्र नज़र। फिर, धीरे-धीरे, वो नीचे की तरफ़ डूबी। एक इंच, फिर दूसरा। गर्मी और तंगी ने मुझे घेर लिया। मैं कराह उठा। वो पूरी तरह से नीचे आ गई, जब तक कि हमारे शरीर एक-दूसरे से चिपक नहीं गए। वो वहीं रुकी, अपनी आंखें बंद करके, इस एहसास को समेटते हुए। फिर उसने हिलना शुरू किया। उसकी हिप्स एक नियंत्रित, गोलाकार गति में घूम रही थीं। ऊपर-नीचे नहीं, बल्कि घूमते हुए, मुझे हर कोण से महसूस कराते हुए। ये एक धीमी, जानलेवा लय थी। उसने अपने हाथ मेरी छाती पर रखे, अपने नाखूनों से हल्का सा दबाव डाला।
फिर वो आगे की तरफ़ झुकी। उसके स्तन अब मेरे चेहरे के ठीक ऊपर लटक रहे थे। उसने उन्हें हल्का सा हिलाया, उनके निप्पल मेरे होंठों को छू रहे थे। मैंने स्वतः ही अपना मुंह खोला और एक को अपने मुंह में ले लिया। उसका स्वाद नमकीन और मीठा था। मैंने चूसना शुरू किया, जितना कि मेरी पोजिशन में हो सकता था। वो एक गहरी आह भरी। उसकी हिप्स की गति तेज़ होने लगी, अब वो गोलाकार नहीं, बल्कि ऊपर-नीचे की तेज़ गति में आ गई थी। मैंने अपनी कलाइयों को खींचा, हथकड़ियों को तोड़ने की कोशिश की। मैं उसे छूना चाहता था, उसकी पीठ पर अपने हाथ फेरना चाहता था, उसके बालों को पकड़ना चाहता था। “प्लीज़, निशा… मुझे छूने दो,” मैंने हांफते हुए कहा। उसने अपनी गति रोकी। उसकी आंखें, जो अब तक आनंद में डूबी हुई थीं, अचानक कठोर हो गईं। “मैंने कहा था ना, आज तुम हाथ नहीं हिला सकते,” उसने कहा, और फिर, तेज़ी से, उसने अपना हाथ उठाया और मेरी छाती पर एक हल्का सा, लेकिन ठोस तमाचा जड़ दिया। थप्प! आवाज़ ने कमरे में गूंज छोड़ी। दर्द नहीं था, लेकिन आश्चर्य और उत्तेजना ने मुझे झकझोर दिया। मैं चुप हो गया।
उसने फिर से अपनी गति शुरू की, और इस बार और भी तेज़, और भी निर्दयतापूर्वक। वो अपनी खुशी के पीछे भाग रही थी, और मैं सिर्फ़ एक साधन था। उसकी सांसें तेज़ हो गईं, उसके मुंह से छोटी-छोटी आहें निकलने लगीं। उसने अपनी आंखें बंद कर लीं, और अपने सिर को पीछे की तरफ़ झटका। उसके शरीर में एक खिंचाव आया, एक कड़ापन। फिर वो चीखी – एक दबी हुई, गहरी चीख। उसकी योनी की मांसपेशियों ने मुझे जोर से निचोड़ा, एक लयबद्ध संकुचन में। ये एहसास अविश्वसनीय था। वो अपने ओर्गैज़्म में डूबी हुई थी, अपने शरीर को हिलाते हुए, मुझे अपने अंदर से हर बूंद निचोड़ते हुए। मैं भी कगार पर था, लेकिन वो रुकी नहीं। जब उसके संकुचन धीमे हुए, तब उसने अपनी आंखें खोलीं। उसके चेहरे पर संतुष्टि और एक जंगली चमक थी। उसने हांफते हुए सांस ली, और फिर अपने हाथ बढ़ाए। उसने हथकड़ियों की चाबी निकाली, और मेरी कलाइयों को आज़ाद कर दिया। जंजीरें खुलते ही मेरे हाथ ऊपर से नीचे आ गए, सुन्न और भारी लग रहे थे।
लेकिन अब आज़ादी मिलते ही, मेरे अंदर जमा हुआ सारा तनाव, सारी बेचैनी, सारी तड़प एक साथ फूट पड़ी। मैंने तेज़ी से बैठा, और उसे पकड़कर, उसके कंधों पर हाथ रखकर, उसे बिस्तर पर पलट दिया। उसने हैरानी से मेरी तरफ़ देखा, लेकिन उसकी आंखों में कोई डर नहीं था, बल्कि एक नई चुनौती थी। मैंने उसके पैरों को अलग किया और खुद को उसके बीच में स्थापित किया। फिर, बिना किसी दया के, मैंने उसमें प्रवेश किया। ये कोमल नहीं था। ये एक जानवर की तरह का, बेकाबू ज़ोर था। हर धक्के के साथ वो चीखती, लेकिन उसकी चीखों में दर्द नहीं, बल्कि एक गहरा आनंद था। उसने अपनी टांगें मेरी कमर के चारों ओर लपेट लीं, मुझे और भी गहराई तक खींचते हुए। हमारे शरीर एक-दूसरे से टकरा रहे थे, पसीने से चिपचिपे हो चुके थे। कमरे में सिर्फ़ हमारी हांफने की आवाज़ें, चीखें और शरीरों के टकराने की आवाज़ें गूंज रही थीं। मैंने लंबे समय तक संयम नहीं रखा। वो तीव्रता बहुत ज़्यादा थी। एक गहरी कराह के साथ, मैंने उसमें विसर्जित कर दिया, मेरा शरीर एक झटके में कांप उठा। मैं उस पर गिर पड़ा, मेरी सांसें भारी थीं, दिल धड़क रहा था जैसे किसी दौड़ से लौटा हूं।
कुछ मिनटों तक हम वैसे ही पड़े रहे, हमारे शरीर एक-दूसरे से चिपके हुए, सांसें धीरे-धीरे सामान्य होती जा रही थीं। कमरे की हवा में सेक्स और पसीने की गंध घुली हुई थी। आखिरकार, मैं उसके बगल में लेट गया। वो अपनी आंखें बंद किए हुए थी, उसके होंठों पर एक शांत मुस्कान थी। मैंने उसकी तरफ़ देखा। उसके बाल बिस्तर पर बिखरे हुए थे, उसके शरीर पर मेरे द्वारा दिए गए हल्के निशान थे। वो खूबसूरत लग रही थी। “ये…” मैंने कहना शुरू किया, लेकिन शब्द नहीं मिले। “हां?” उसने आंखें खोलीं और मेरी तरफ़ देखा। “कुछ नहीं,” मैंने कहा। वो मुस्कुराई और मेरी तरफ़ रेंगती हुई आई, अपना सिर मेरी छाती पर रख लिया। उसकी उंगलियां मेरे पेट पर नाचने लगीं। “तुम्हें कैसा लगा?” उसने पूछा। मैंने सोचा। असहाय होना? आज़ाद होना? नियंत्रित होना? नियंत्रण करना? ये सब कुछ एक साथ। “अलग था,” मैंने आखिरकार कहा। वो हंस पड़ी, एक साफ़, खुलकर हंसी। “अच्छा,” उसने कहा। हम फिर चुप हो गए, बस एक-दूसरे की गर्मी का आनंद लेते हुए। बाहर से रिक्शे वाले की आवाज़ आई, और कहीं दूर कुत्ते भौंके। दुनिया वापस अपनी जगह आ रही थी। लेकिन मैं जानता था कि मैं वो रवि नहीं रहा जो इस कमरे में आया था। कुछ बदल गया था। और ये बदलाव डरावना नहीं, बल्कि रोमांचक लग रहा था। मैंने निशा को और करीब खींचा, और वो मेरे स्पर्श में सिकुड़ गई। रात अभी बाकी थी।
