मेरा नाम अर्जुन राठौड़ है। चौबीस साल का, जयपुर से। दिल्ली आने का कारण था दो दिन बाद की फ्लाइट, दिल्ली से दुशान्बे, ताजिकिस्तान। वहाँ मेडिकल की पढ़ाई शुरू करनी थी। दिल्ली पहुँचकर मैंने पहले दिन होटल अशोका रेजिडेंसी में चेक-इन किया, पहाड़गंज में, न्यू दिल्ली रेलवे स्टेशन के पास। एक साइड स्ट्रीट पर बना यह मिड-रेंज लॉज मेरे बजट के लिए परफेक्ट था।
अगले दिन दोपहर को मेहक से मिलना था। उसे मैं इंस्टाग्राम के जरिए जानता था। तीन-चार महीने से बात चल रही थी। वह भी दुशान्बे के लिए निकलने वाली थी, एक अलग मेडिकल यूनिवर्सिटी में। हमारी फ्लाइट एक ही थी, तो सोचा था कि एक दिन पहले मिल लें, कनेक्शन बना लें।
मैंने उसे कनॉट प्लेस के एक कैफे में मिलने के लिए बुलाया था। ‘ब्लू टोकाई’ कैफे। शाम के चार बजे। मैं थोड़ा जल्दी पहुँच गया। नर्वसनेस थी। ऑनलाइन बात करना एक बात है, आमने-सामने बैठना दूसरी। मैंने एक कॉर्नर वाली सोफा सीट चुनी। पाँच मिनट बाद वह आई।
मेहक मल्होत्रा। तेईस साल की। द्वारका, दिल्ली से। जैसे ही वह अंदर आई, मेरी साँस थोड़ी रुक सी गई। उसकी तस्वीरों ने उसे जस्टिस नहीं दिया था। वह लंबी थी, पतली कमर और एक आकर्षक फिगर के साथ। उसने एक डेनिम ड्रेस पहनी हुई थी – वो जो टॉप और स्कर्ट एक साथ जुड़े होते हैं। डेनिम का रंग हल्का नीला था। उसके अंदर एक साधारण सफेद कैमिसोल था, जो ड्रेस के ऊपर से दिख रहा था। उसके पैर लंबे और सुडौल थे, जो डेनिम स्कर्ट से पूरी तरह दिख रहे थे। उसके बाल लंबे, काले, थोड़े लहराते हुए, कंधों पर गिर रहे थे। चेहरे पर हल्का मेकअप, जो उसकी हल्की साँवली रंगत और बड़ी-बड़ी भूरी आँखों को और निखार रहा था।
वह मुस्कुराते हुए मेरी तरफ आई। “अर्जुन?” उसकी आवाज़ मधुर थी।
“हाँ, मेहक। तुम आ गई। बैठो,” मैंने कहा, उठकर उसका स्वागत करते हुए।
वह सामने वाली सीट पर बैठ गई, अपना बैग एक तरफ रखते हुए। “तुम तो फोटो से भी ज्यादा लंबे लग रहे हो,” उसने कहा, शरारती मुस्कान के साथ।
“और तुम… तुम तो फोटो से कहीं ज्यादा खूबसूरत लग रही हो,” मैंने कहा, और यह कोई फ़्लर्ट करने वाली लाइन नहीं थी, बल्कि सच्चाई थी।
थोड़ी देर हमने ऑर्डर देने और आम बातचीत में बिताई। कॉलेज, दुशान्बे की तैयारी, फ्लाइट का डर। बातचीत आसानी से फ्लो हो रही थी। वह बुद्धिमान थी, हँसमुख, और उसकी आँखों में एक चंचल चमक थी। मैं उसकी हरकतों पर नज़र रखे हुए था – जब वह कॉफी का कप पकड़ती, अपने बाल पीछे करती, या हँसते हुए सिर हिलाती।
“तो तुमने होटल कहाँ लिया है?” उसने पूछा।
“पहाड़गंज में। अशोका रेजिडेंसी। तुम्हारा घर तो द्वारका है ना? यहाँ से काफी दूर पड़ेगा शाम को,” मैंने कहा।
“तुम मुझे आज रात कनॉट प्लेस घुमाओगे। मैंने लंबे समय बाद दोस्तों के साथ आउटिंग की है।”
मेरे दिल ने एक तेज धड़कन मारी। “डील,” मैंने कहा।
शाम को हम कनॉट प्लेस घूमने निकले। बातचीत जारी रही, लेकिन अब उसमें एक नया, हल्का-फुल्का फ़्लर्टेशन शामिल हो गया था। रेगल बिल्डिंग के सामने फव्वारे देखते हुए, मैंने उसकी तरफ देखा। हवा ने उसके बालों को उड़ाया और वह उन्हें अपने चेहरे से हटा रही थी। मैंने अनजाने में अपना हाथ बढ़ाया और उसके चेहरे से एक लट को हटा दिया, उसके गाल को छूते हुए। मेरी उंगलियाँ उसकी त्वचा पर एक सेकंड के लिए रुक गईं। वह चौंकी नहीं, बल्कि उसने अपनी आँखें मूंद लीं, एक छोटी सी साँस ली।
“सॉरी,” मैंने कहा, हाथ वापस खींचते हुए।
“कोई बात नहीं,” उसने कहा, आँखें खोलकर। उनमें एक गर्मजोशी थी।
जैसे-जैसे रात गहराई, हमारे बीच की दूरी कम होती गई। चलते समय हमारे हाथ कभी-कभी टकरा जाते। बैठे समय हमारे घुटने एक-दूसरे को छूने लगे। हम दोनों इस बात को नज़रअंदाज कर रहे थे, पर हम दोनों जानते थे कि यह जानबूझकर नहीं, बल्कि एक आकर्षण का नतीजा था।
रात के आठ बजे थे जब हमने खाना खाया। एक छोटे से रेस्तराँ में। थोड़ी शराब भी पी। दो पैग के बाद, हम दोनों और रिलैक्स्ड महसूस कर रहे थे। मेहक की आँखों में एक सुनहरी चमक आ गई थी और वह थोड़ी ज्यादा बातूनी हो गई थी।
टैक्सी में वापसी के समय, वह मेरे कंधे से सिर टिकाए बैठी थी। टैक्सी का अंदरूनी हिस्सा अंधेरा था, सिर्फ बाहर की स्ट्रीट लाइट्स की रोशनी आ-जा रही थी। मैंने अपना हाथ उसकी पीठ के पीछे से डाला, और वह और करीब सिमट गई। उसके बालों की खुशबू मेरी नाक तक आ रही थी – नारियल के तेल और किसी हल्के फूल जैसी।
“तुम ठीक हो?” मैंने फुसफुसाया।
“हाँ,” उसने कहा, और उसने अपना हाथ मेरी जांघ पर रख दिया। एक साधारण सी हरकत, लेकिन उससे मेरे शरीर में करंट सा दौड़ गया।
होटल अशोका रेजिडेंसी पहुँचने पर, लॉबी में एक अजीब सा तनाव था। रिसेप्शनिस्ट ने हमें देखा, फिर मुझे पहचाना और दो कुंजियाँ निकालीं। “आपका रूम 204 है, सर। डबल बेड।”
लिफ्ट में सफर चुपचाप बीता। मैं उसकी तरफ देख रहा था, और वह दर्पण में मेरी तरफ देख रही थी। उसके होंठों पर एक संकोची, पर आश्वस्त मुस्कान थी।
कमरा साफ-सुथरा और साधारण था। एक बड़ा बेड, एक टीवी, एक टेबल। मैंने लाइट्स ऑन की, और अपना बैग एक तरफ रख दिया। मेहक दरवाजे के पास खड़ी थी, जैसे अभी भी दिमाग में कुछ चल रहा हो।
“तुम… तुम ठीक हो?” मैंने फिर पूछा।
वह मेरी तरफ मुड़ी। “हाँ। बस… थोड़ा अजीब लग रहा है। हम एक-दूसरे को इतना नहीं जानते।”
“मैं जानता हूँ,” मैंने कहा, करीब जाकर। “हम रुक सकते हैं। तुम चाहो तो मैं लॉबी में दूसरा रूम ले लेता हूँ।”
उसने सिर हिलाया। “नहीं। मैं यहाँ रुकना चाहती हूँ।” उसने एक गहरी साँस ली। “मैं बस इतना कहना चाहती हूँ कि… मैं ये सब इसलिए नहीं कर रही क्योंकि हमारी फ्लाइट एक ही है। मैं… मैं तुम्हें पसंद करती हूँ, अर्जुन। इन तीन महीनों की बातचीत से।”
उसकी बात सुनकर मेरा दिल भर आया। मैंने उसका हाथ पकड़ा। “मैं भी तुम्हें पसंद करता हूँ, मेहक। बहुत।”
और फिर वह पल आया। मैंने धीरे से उसकी ठुड्डी को उठाया और उसके होंठों को अपने होंठों से छुआ। पहला किस हल्का, कोमल, एक सवाल जैसा था। उसने जवाब दिया, अपने होंठों को मेरे होंठों के साथ मिलाते हुए। यह कोई उतावला, भावुक चुंबन नहीं था, बल्कि एक धीमी, अन्वेषण करने वाली शुरुआत थी।
हमारे होंठ अलग हुए, और हम एक-दूसरे की आँखों में देखने लगे। उसकी आँखों में इच्छा थी, और थोड़ा डर भी। मैंने उसके गाल पर हाथ फेरा। “हम आराम से चलेंगे,” मैंने कहा।
उसने हाँ में सिर हिलाया। फिर मैंने उसे फिर से किस किया, इस बार थोड़ा गहरा। मेरा हाथ उसकी पीठ पर फिरा, उसके डेनिम ड्रेस के ऊपर से। कपड़े के नीचे उसका शरीर गर्म था। मैंने उसे अपने करीब खींचा, और हमारे शरीर एक-दूसरे से चिपक गए।
धीरे-धीरे, किस और छूने का दायरा बढ़ने लगा। मेरा हाथ उसकी पीठ से होता हुआ उसकी कमर पर आया, फिर उसके नितंबों पर। मैंने उन्हें अपने हाथों में भरकर हल्का सा दबाया। वह एक हल्की सी कराह उभारकर मेरे मुँह में और गहराई से घुस गई। उसकी जीभ मेरी जीभ से मिली, और एक आग सी लग गई।
हम बिस्तर की तरफ बढ़े, बिना अपने होंठ अलग किए। मैंने उसकी ड्रेस के पीछे का ज़िप खोला, और वह उसे उतारने में मेरी मदद करने लगी। डेनिम का वह ड्रेस नीचे फर्श पर गिरा। अब वह सिर्फ अपने सफेद कैमिसोल और अंडरवियर में थी। उसका शरीर… वाह। पतली कमर, चिकनी त्वचा, और सुडौल नितंब। मेरी नज़रें उसके स्तनों पर टिक गईं, जो कैमिसोल के अंदर से भरपूर और आकर्षक लग रहे थे।
“तुम… तुम बहुत सुंदर हो,” मैंने भर्राई आवाज़ में कहा।
उसने शर्माते हुए मुस्कुराया। “तुम्हारे हाथ बहुत गर्म हैं,” उसने कहा, जब मैंने उसकी नंगी पीठ पर हाथ फेरा।
मैंने उसे बिस्तर पर लिटा दिया, और खुद उसके ऊपर आ गया, अपने घुटनों के बल। मैंने उसके कैमिसोल के स्ट्रैप्स उतारे, और धीरे से उसे नीचे खींचा। उसके स्तन बाहर आए, और मेरी साँस रुक सी गई। वह आकार में पूर्ण थे, गोल, उनके ऊपर गहरे रंग के चूचे थे। मैंने पहले बस देखा, उनकी सुंदरता को महसूस किया। फिर मैंने झुककर एक को अपने मुँह में लिया।
उसने एक तेज साँस खींची, और अपने हाथ मेरे बालों में घुसेड़ दिए। मैंने उसके चूचे को अपनी जीभ से घुमाया, हल्का सा चूसा, फिर दांतों से हल्का सा काटा। वह कराह उठी, “अर्जुन…” उसकी कराह ने मुझे और उत्तेजित कर दिया। मैंने दूसरे स्तन पर भी वही किया, उसे बराबर प्यार दिया। मेरा एक हाथ उसकी जांघ पर फिर रहा था, उसकी चिकनी त्वचा को महसूस करते हुए।
फिर मैं नीचे की ओर बढ़ा। मैंने उसकी पैंटी के किनारों को अपने अंगूठों से पकड़ा और उसे धीरे से नीचे खींचा। वह अपने कूल्हों को ऊपर उठाकर मेरी मदद करने लगी। अब वह पूरी तरह नंगी थी। मैंने उसके पैरों को अलग किया और उसके बीच देखा। वह गीली थी, तैयार। मैंने अपनी उंगली उसकी चूत के ऊपर फेरी, और वह काँप उठी।
“प्लीज,” उसने फुसफुसाया।
मैंने एक उंगली अंदर डाली, धीरे से। वह गर्म और तंग थी। उसने अपनी आँखें मूंद लीं, और उसके मुँह से एक लंबी कराह निकली। मैंने उंगली हिलानी शुरू की, एक आरामदायक गति से, जबकि मेरा अंगूठा उसके चूचे के ऊपर घूमता रहा। मैंने झुककर उसकी चूत को चूमा, फिर अपनी जीभ से उसके चूचे को उत्तेजित किया।
“ओह माई गॉड…” वह हाँफने लगी, उसके हाथ बिस्तर के चादर को पकड़े हुए थे। उसकी कराहें तेज हो रही थीं। मैंने एक और उंगली अंदर डाल दी, और अपनी जीभ की गति तेज कर दी। कुछ ही मिनटों में, वह तेजी से साँस लेने लगी, उसकी जांघें काँपने लगीं, और वह चिल्लाई, “मैं आ रही हूँ!” उसका शरीर एक झटके के साथ अकड़ गया, और फिर शिथिल हो गया। वह हाँफ रही थी, उसकी आँखें बंद थीं, चेहरे पर एक संतुष्ट, थकी हुई मुस्कान।
मैंने अपनी उंगलियाँ बाहर निकालीं और ऊपर की ओर बढ़ा, उसके चेहरे के सामने आकर। उसने आँखें खोलीं, और उनमें एक ऐसी कृतज्ञता थी जिसने मेरे दिल को छू लिया। उसने मेरा हाथ पकड़ा और अपने होंठों से चूमा।
“अब तुम,” उसने कहा, और उसने मेरी शर्ट के बटन खोलने शुरू कर दिए। मैंने उसकी मदद की, और जल्द ही मेरा ऊपरी हिस्सा भी नंगा था। फिर उसने मेरी पैंट और अंडरवियर नीचे खींची। मेरा लंड पहले से ही कड़ा और उत्तेजित था। उसने उसे देखा, फिर अपना हाथ बढ़ाया और उसे पकड़ लिया। उसके हल्के स्पर्श ने मुझे कराहने पर मजबूर कर दिया।
वह बैठ गई, और मुझे बिस्तर पर लिटा दिया। अब वह ऊपर थी। उसने मेरे लंड को अपने हाथों से सहलाया, फिर झुककर उसे अपने मुँह में ले लिया। मैं एक गहरी साँस भरकर रुक गया। उसकी जीभ का अनुभव… अद्भुत था। वह अनुभवी नहीं लग रही थी, लेकिन उत्सुक और इच्छुक जरूर। उसने धीरे-धीरे चूसा, अपनी जीभ से सिरे को घुमाया। मेरा हाथ उसके सिर पर गया, और मैंने उसके बालों में अपनी उंगलियाँ फँसा लीं, उसे प्रोत्साहित करते हुए।
“मेहक… बस… थोड़ा और,” मैं हाँफने लगा। मुझे लगा मैं समय से पहले ही निकलने वाला हूँ। मैंने उसे धीरे से ऊपर खींचा। “मैं तुम्हारे अंदर जाना चाहता हूँ,” मैंने कहा।
उसकी आँखों में सहमति थी। वह मेरे ऊपर सवार हो गई, अपने घुटनों के बल। उसने मेरे लंड को पकड़ा और धीरे से अपनी चूत के ऊपर रखा। फिर, आँखें मेरी आँखों में गड़ाए हुए, वह नीचे बैठी। वह धीरे-धीरे नीचे आई, मेरे लंड को अपने अंदर लेते हुए। हम दोनों ने एक साथ कराहा। वह इतनी गर्म, इतनी तंग थी… यह अविश्वसनीय था।
वह पूरी तरह नीचे आ गई, और रुक गई, अपने शरीर को इस नए अनुभव के लिए अभ्यस्त होने दिया। फिर उसने हिलना शुरू किया। धीरे-धीरे पहले, ऊपर-नीचे। मैंने उसकी कमर को पकड़ा और उसकी गति में मदद की। उसके स्तन हवा में झूम रहे थे। दृश्य इतना कामुक था कि मैं अपनी इंद्रियों पर काबू नहीं रख पा रहा था।
कुछ देर बाद, मैंने उसे पलट दिया। अब मैं ऊपर था। मैंने उसके पैरों को अपने कंधों पर रखा और तेज गति से अंदर-बाहर करना शुरू किया। यह मिशनरी पोजीशन थी, लेकिन गहरी। हर थ्रस्ट के साथ वह चिल्लाती। “हाँ! वहाँ! ठीक वहाँ!” उसने अपनी एड़ियों से मेरी पीठ को जकड़ लिया।
फिर मैंने उसे पलटकर डॉगी स्टाइल की पोजीशन में ले आया। वह अपने घुटनों और हाथों के बल थी, उसका नितंब हवा में था। मैंने फिर से अंदर प्रवेश किया, और इस बार का एंगल और भी बेहतर था। मैंने जोर से मारना शुरू किया, पटक-पटक के। उसकी चूत से गीले आवाज़ें आ रही थीं। उसने अपना सिर तकिए में दबा लिया था, और उसकी कराहें दबी हुई, गहरी थीं।
“मेरी गांड मारो! जोर से!” वह चिल्लाई, और उसकी बात ने मुझे और उत्तेजित कर दिया। मैंने एक हाथ से उसकी कमर पकड़ी और दूसरे हाथ से उसके बाल खींचे, और और तेज, और गहरा मारा। कमरा हमारी कराहों, चूमने की आवाजों और बिस्तर के चरमराने की आवाज से गूंज रहा था।
मुझे लगा मेरा वक्त आ रहा है। “मैं निकलने वाला हूँ,” मैं हाँफा।
“अंदर ही निकलो,” उसने मुँह घुमाकर कहा।
उसकी बात ने मेरी इच्छा को तोड़ दिया। मैंने एक आखिरी, गहरा धक्का दिया, और मेरा लंड उसकी चूत के अंदर फड़कने लगा। गर्मी का एक झोंका मेरी रीढ़ से होता हुआ ऊपर उठा, और मैं एक लंबी, गहरी कराह के साथ निकल गया। उसी समय, मेहक फिर से चरम पर पहुँच गई, उसका शरीर मेरे नीचे काँप उठा। हम दोनों एक साथ गिरे, थककर चूर।
मैं उसके ऊपर से लुढ़ककर बगल में आ गया, हाँफते हुए। कमरे में सिर्फ हमारी साँसों की आवाज थी। कुछ मिनट तक हम कुछ नहीं बोले। फिर मेहक ने मुड़कर मेरी तरफ देखा। उसके चेहरे पर पसीना था, बाल उलझे हुए थे, लेकिन उसकी आँखों में एक शांत, गहरी संतुष्टि थी।
“वाह,” उसने फुसफुसाया।
“हाँ। वाह,” मैंने कहा, और उसे अपनी बाँहों में भर लिया। वह मेरी छाती से सट गई।
हम बिस्तर पर लेटकर बातें करने लगे। अब कोई संकोच नहीं था, कोई तनाव नहीं था। सिर्फ दो लोग, जो एक-दूसरे के करीब आ गए थे।
“कल फ्लाइट के बाद… हम अलग हो जाएँगे,” उसने कहा, उदास स्वर में।
“लेकिन हम एक ही शहर में रहेंगे,” मैंने कहा, उसके बालों में उंगलियाँ फिराते हुए। “हम मिल सकते हैं। हम ऐसा दोबारा कर सकते हैं।”
उसने मुस्कुराकर मेरी तरफ देखा। “पर क्या तुम मुझे इतना पटक-पटक के मारोगे हर बार?”
मैं हँस पड़ा। “बिल्कुल। तुम्हें मज़ा आया ना?”
उसने शर्माते हुए अपना चेहरा मेरी छाती में छुपा लिया। “बहुत ज्यादा।”
थोडी दर बाद वो घर चाली गई. उसने ऑलरेडी पॅकिंग कर की थी. बस कल वापस एअरपोर्ट पे मिलने वाले थे.
आगले दीन फ्लाइट में, हम बगल-बगल बैठे थे। जब प्लेन टेकऑफ़ के लिए दौड़ने लगा, तो मेहक ने मेरा हाथ पकड़ लिया। मैंने उसकी तरफ देखा। वह थोड़ी डरी हुई लग रही थी।
“सब ठीक होगा,” मैंने कहा।
“मुझे पता है,” उसने कहा, और मेरे हाथ को दबाया। “क्योंकि तुम मेरे साथ हो।”
जैसे ही प्लेन हवा में उठा, हम एक नए शहर, एक नए अध्याय की तरफ बढ़ रहे थे। हम अलग-अलग यूनिवर्सिटी जा रहे थे, लेकिन अब हमारे बीच एक बंधन था – गर्म, शारीरिक, और ईमानदार। यह सिर्फ एक रात का मजा नहीं था। यह एक शुरुआत थी। और मैं जानता था कि दुशान्बे में, इस कहानी के और भी कई गर्म, रोमांचक अध्याय लिखे जाने थे।
