मेरा नाम राहुल कटोच है और मैं आज तीस साल का हो गया हूँ। पर ये कहानी उस रात की है जब मैं अट्ठाईस का था और अपनी कंपनी के एक प्रोजेक्ट के सिलसिले में धर्मशाला आया हुआ था। दो हफ्ते का काम था और मैंने मैक्लोडगंज रोड के पास एक छोटा सा होमस्टे बुक किया था। वहाँ की हर सुबह चाय की चुस्कियों और दूर बर्फ से ढके धौलाधार पर्वतों के नज़ारों के साथ शुरू होती थी। काम ख़त्म होने के बाद की शामें थोड़ी सूनी सी लगती थीं। फिर मैंने उस कैफे की खोज की, जहाँ ये सब शुरू हुआ।
कैफे का नाम था ‘द नॉमैडिक स्पिरिट’। लकड़ी के बड़े शीशे, अंदर लटकते हुए पेंडेंट लाइट्स, और दीवारों पर लगी तिब्बती थांगका पेंटिंग्स – माहौल बिल्कुल शांत और आरामदेह था। मैं अक्सर एक कोने वाली सीट पर बैठकर लैपटॉप पर काम निपटाता या किताब पढ़ता रहता। तीसरे दिन, जब मैं अपनी अदरक वाली चाय का ऑर्डर दे रहा था, तभी उसकी आवाज़ सुनाई दी।
“अंकल, वन मोर एलाय चीज़ केक, प्लीज़।”
आवाज़ में एक मिठास थी, एक साफ़ सुथरी तरलता। मैंने मुड़कर देखा। वह कैश काउंटर के पास खड़ी थी। लम्बे, सीधे काले बाल जो कंधों से नीचे तक गिर रहे थे। उसने एक सादी सी क्रीम रंग की टर्टलनेक स्वेटर पहन रखी थी और नीचे से डार्क जीन्स नज़र आ रही थी। उसके चेहरे की बनावट तिब्बती मूल की थी – ऊँचे गालों की हड्डियाँ, बड़ी और चमकदार आँखें जो शहद के रंग जैसी लगती थीं, और होंठों पर एक हल्की सी नैचुरल गुलाबी छाया। उसका नाम सोनम चोदेन था, जैसा कि बाद में पता चला। वह कैफे में ही काम करती थी, शायद पार्ट-टाइम।
उस दिन तो बस नज़रें मिलीं और हल्की सी मुस्कुराहट का आदान-प्रदान हुआ। लेकिन अगले कुछ दिनों में, जब भी मैं कैफे आता, वह मेरी टेबल पर चाय लाने की ज़िम्मेदारी ख़ुद ले लेती। पहली बातचीत फुटपाथ पर हुई। शाम ढल रही थी और हवा में ठंडक बढ़ने लगी थी। मैं कैफे से निकला ही था कि देखा वह सामने ही खड़ी है, अपने फोन में कुछ देख रही है।
“तुम यहाँ रहती हो, सोनम?” मैंने पूछा, नाम लेकर, ताकि बातचीत शुरू हो सके।
उसने सिर उठाया, उसकी आँखों में एक चमक थी। “हाँ। ऊपर ही फ्लैट है। आप तो बाहर से लगते हैं?”
“दिल्ली से हूँ। प्रोजेक्ट पर आया हुआ हूँ।”
“अच्छा। तो कितने दिन रहेंगे?”
“एक हफ्ता और।”
वह मुस्कुराई। “तब तो आपको धर्मशाला की सारी जगहें घुमा लेनी चाहिए। केवल यही कैफे नहीं देखना।”
उसकी मुस्कुराहट में एक ऐसी गर्मजोशी थी जो इस पहाड़ी शहर की ठंडी हवा को भी गर्म कर दे। उस दिन हमने दस मिनट बात की। उसने बताया कि वह हिमाचल यूनिवर्सिटी से होस्पिटैलिटी मैनेजमेंट की पढ़ाई कर रही है और पढ़ाई के साथ यहाँ काम करती है। उसकी बात करने का अंदाज़ बिल्कुल रिलैक्स था, बिना किसी झिझक के। मैंने नोटिस किया कि जब वह बात करती है तो अपने हाथों से हवा में छोटे-छोटे इशारे करती है, और कभी-कभी सिर के बालों को कान के पीछे करने का उसका तरीका… वो काफी प्यारा था।
अगले दो दिन हमारी बातचीत का दायरा बढ़ता गया। कैफे में कम रहने वाले ग्राहकों के समय, वह मेरी टेबल के सामने वाली कुर्सी पर बैठ जाती और हम कॉलेज, फिल्मों, यात्राओं के बारे में बातें करते। एक दिन मैंने उससे पूछा कि क्या वह कभी दिल्ली गई है।
“नहीं,” उसने कहा, नाक सिकोड़ते हुए। “वहाँ की भीड़ और प्रदूषण से डर लगता है। यहाँ की शांति और हरियाली ही मेरे लिए काफी है।”
“पर कभी-कभी शांति भी उबाऊ लगने लगती है न?” मैंने शरारत से पूछा।
उसने गहरी नज़रों से मेरी तरफ देखा। “तो आप क्या सुझाव देते हैं, मिस्टर राहुल? शांति को थोड़ी ‘एक्साइटमेंट’ से रिप्लेस कर दूँ?”
उसके कहने के तरीके में एक हल्की सी चुनौती थी, एक इशारा। मेरे अन्दर एक सिहरन सी दौड़ गई। “शायद। डिपेंड करता है कि एक्साइटमेंट किस चीज़ में मिलती है।”
वह हँस दी, और उसकी हँसती हुई आँखों में एक चमक दौड़ गई जो साफ कह रही थी कि वह मेरे इशारे को समझ गई है। उस दिन जब वह उठकर काउंटर की तरफ गई, तो उसने जानबूझकर मेरे कंधे से हल्का सा टच किया। एक इलेक्ट्रिक शॉक सा लगा। ये छोटे-छोटे पल, ये नज़रें, ये हल्के टच… इन सबने एक तनाव पैदा कर दिया था। एक ऐसी उम्मीद जो हर मुलाकात के साथ बढ़ती जा रही थी।
मेरे धर्मशाला में आखिरी वीकेंड से एक दिन पहले, मैंने उससे पूछा कि क्या वह अपने ऑफ के दिन मुझे शहर के कुछ छिपे हुए स्पॉट्स दिखा सकती है। वह तैयार हो गई। शनिवार की सुबह हम मिले। उसने एक फिटेड ऑफ-व्हाइट टॉप और डेनिम शॉर्ट्स पहना हुआ था, जिससे उसकी लम्बी और सुडौल टाँगें पूरी तरह नज़र आ रही थीं। उस दिन हमने भागसून झरना देखा, स्ट. जॉन चर्च घूमा, और दोपहर को एक छोटी सी लोकल दुकान पर मोमोज़ खाए। बातें होती रहीं, हँसी मज़ाक चलता रहा। कभी चलते हुए हमारे हाथ आपस में टकरा जाते, और हम दोनों ही उस टच को थोड़ा और लम्बा खींचने की कोशिश करते, बिना कुछ कहे।
शाम को वह मुझे अपने फ्लैट पर चाय पीने के लिए आमंत्रित करने लगी। “मेरा रूममेट आज अपने गाँव गई हुई है,” उसने कहा, आँखों में एक शरारत लिए हुए। “तो हम बिना डिस्टर्बेंस के बात कर सकते हैं।”
मैं मान गया। उसका फ्लैट कैफे के ठीक ऊपर ही था, छोटा सा लेकिन साफ-सुथरा और आरामदायक। कमरे में उसकी खुशबू थी – हल्की सी वैनिला और फूलों जैसी। उसने चाय बनाने के लिए किचन में जाते हुए कहा, “तुम लाउंज में बैठो। मैं आती हूँ।”
मैं सोफे पर बैठ गया। थोड़ी देर में वह दो कप चाय लेकर आई और मेरे पास ही बैठ गई। दूरी इतनी कम थी कि मैं उसके शरीर की गर्मी महसूस कर सकता था। हम चाय पी रहे थे और कुछ देर तक सामान्य बातें करते रहे – आज का दिन कैसा रहा, धर्मशाला की यादें। फिर एक पल ऐसा आया जब बातचीत थम गई। वह अपना कप टेबल पर रखकर मेरी तरफ मुड़ी। उसकी आँखें मेरी आँखों में घुस गईं, और उस पल हवा में जो तनाव था, वह अब एक भौतिक चीज़ बन चुका था। मैंने धीरे से अपना हाथ बढ़ाया और उसके गाल पर रख दिया। उसने आँखें बंद कर लीं और मेरे हाथ के स्पर्श में खो सी गई। फिर उसने अपना हाथ मेरे हाथ पर रखा, और मैंने महसूस किया कि उसकी उँगलियाँ हल्की सी काँप रही थीं।
मैंने धीरे से उसकी ओर झुककर उसके होंठों को चूमा। पहला चुंबन कोमल था, एक पूछताछ की तरह। उसने जवाब दिया, उसके होंठ मेरे होंठों पर खुले और उसने मेरी गर्दन को अपने हाथों से पकड़ लिया। अब चुंबन गहरे होने लगे, उत्सुक, तीव्र। हमारी साँसें तेज़ हो गईं। मेरे हाथ उसकी पीठ पर फिरे, उसके बालों में। वह मेरे करीब आती गई, उसके स्तन मेरी छाती से दब रहे थे। एक लम्बे चुंबन के बाद वह पीछे हटी, साँस लेते हुए, उसके चेहरे पर एक लालिमा और आँखों में एक तेज चमक थी।
“तुम… तुम रुको,” उसने फुसफुसाते हुए कहा और उठकर किचन की तरफ चली गई, शायद कप रखने। मैं भी उठा और उसके पीछे-पीछे किचन में चला गया। वह सिंक के पास खड़ी थी। मैं पीछे से उसके पास गया और अपने हाथ उसकी कमर पर रख दिए। उसने सिर झुकाया, मेरे स्पर्श में डूब गई। मैंने अपने होंठ उसकी गर्दन पर रखे, हल्के से चूमते हुए। वह कराह उठी।
“राहुल…” उसने कहा, और उसकी आवाज़ में एक बेताबी थी।
मैंने उसे धीरे से घुमाया और उसे किचन के काउंटर की तरफ धकेल दिया। उसकी आँखों में एक चुनौती भरी चमक थी। मैंने हल्के से, शरारत से उसकी गांड पर एक थप्पड़ जड़ा। आवाज़ तेज़ और साफ़ थी। उसकी आँखें चौंधिया गईं, और उसके होंठों पर एक दीवानी सी मुस्कान फैल गई।
“ओह!” उसने कहा, एक झूठा गुस्सा दिखाते हुए।
मैंने मुस्कुराते हुए उसे कमर से पकड़ा और उसे काउंटर पर बैठा दिया। लकड़ी का ठंडा स्पर्श उसे लगा। मैंने धीरे से उसकी डेनिम शॉर्ट्स के हेम को ऊपर की ओर खींचा, उसकी चिकनी जांघें पूरी तरह से खुल गईं। मैंने घुटने टेके और अपना चेहरा उसकी भीतरी जांघों के करीब लाया। मैंने अपनी जीभ से उसकी त्वचा का स्वाद चखा – नमकीन, गर्म, और उसके शरीर की मीठी खुशबू से भरपूर। मैं ऊपर की ओर बढ़ा, एक कोमल, लम्बी लकीर उसकी त्वचा पर खींचते हुए। वह सिसकारी भरने लगी, उसकी उँगलियाँ मेरे बालों में चिपक गईं।
फिर मैंने उसके अंतरंग हिस्से पर अपना मुँह रखा। पहला स्पर्श कोमल था, बस जीभ का फिरना। उसने एक तेज सी आह भरी, उसका शरीर ऐंठ गया। मैंने अपनी जीभ पर ज़ोर दिया, उसके सबसे संवेदनशील बिंदु को ढूँढते हुए। जब मैंने उसे पाया, तो मैंने उस पर ध्यान केंद्रित किया – दबाव डाला, चाटा, हल्के से चूसा। वह तेजी से साँस लेने लगी, उसकी कराहें कमरे में गूँजने लगीं। “हाँ… वहीं… ओह भगवान…” वह फुसफुसाई। उसने मेरे सिर को पकड़ लिया और अपने मुंह की ओर दबाया, अपनी हिप्स को मेरे चेहरे के खिलाफ रगड़ते हुए। उसकी उत्तेजना का स्वाद, उसकी गर्मी… सब कुछ मदहोश कर देने वाला था।
कुछ मिनट बाद, मैंने खुद को वापस खींच लिया और खड़ा हो गया। मेरे मुंह और ठुड्डी पर उसकी नमी चमक रही थी। उसने मुझे भूखी नज़रों से देखा, फिर अपनी नज़रें मेरी बेल्ट पर टिका दीं। बिना कुछ कहे, उसने अपने हाथ आगे बढ़ाए और मेरी बेल्ट की बकल खोल दी। उसने मेरी ज़िप नीचे खींची और मुझे अपने हाथों से बाहर निकाला। उसने मुझे देखा, एक क्षण के लिए रुकी, फिर अपना मुँह आगे बढ़ाया।
पहला स्पर्श कोमल था, बस होंठों का ऊपर-नीचे होना। फिर उसने मुझे अपने मुँह में ले लिया। गर्मी और नमी का एहसास लाजवाब था। उसने धीरे-धीरे शुरुआत की, अपनी जीभ का इस्तेमाल करते हुए। मैंने अपना सिर पीछे झुका लिया, एक गहरी साँस ली। वह गति बढ़ाने लगी, अपने हाथों का इस्तेमाल करते हुए। मैंने अपने हाथ उसके सिर पर रखे, उसे नियंत्रित नहीं करते हुए, बस उसकी गति में खो जाने दिया। उसकी लय ने मुझे अपनी ओर खींच लिया, और मैंने धीरे से अपने हिप्स को आगे बढ़ाया, अपने आप को उसके गले की गहराई में धकेलते हुए। वह गले के हल्के गागर से बच गई, लेकिन उसने मेरी गति को स्वीकार कर लिया, अपनी आँखें ऊपर उठाकर मुझे देखते हुए। नज़ारा दिमाग हिला देने वाला था।
“बस… अब रुक,” मैंने हाँफते हुए कहा। मैंने उसे धीरे से पीछे खींचा। उसके होंठ चमक रहे थे। मैंने उसे काउंटर से उतारा और उसे अपनी बाँहों में उठा लिया। वह हल्की थी। उसने अपनी बाँहें मेरी गर्दन के चारों ओर लपेट लीं और जब मैं उसे लेकर लाउंज से होते हुए बेडरूम की ओर चला, तो वह मुझे चूमती रही – मेरे होंठ, मेरी ठुड्डी, मेरे गाल। उसके चुंबन उत्सुक और बेताब थे।
मैंने उसे बिस्तर पर लिटा दिया। उसका कमरा नरम, धुंधले प्रकाश से भरा हुआ था। मैंने उसके ऊपर झुककर उसे एक लम्बा, कोमल चुंबन दिया। फिर मैंने उसकी शॉर्ट्स और अंडरवियर को पूरी तरह से उतार दिया। वह पूरी तरह से नग्न थी, और मैंने एक पल के लिए बस उसे निहारा – उसकी कोमल वक्रताएँ, उसकी चिकनी त्वचा। मैंने अपने कपड़े उतारे और उसके बीच में लेट गया।
मैंने अपने आप को उसके प्रवेश द्वार पर रखा और धीरे से अंदर धकेलना शुरू किया। वह तंग और गर्म थी। उसने एक तीखी सी साँस खींची, और उसकी आँखें चौड़ी हो गईं। मैंने रुककर उसे चूमा, उसे अभ्यस्त होने दिया। फिर मैंने धीरे-धीरे आगे बढ़ना शुरू किया, एक लयबद्ध गति में। मिशनरी पोज़िशन में, मैं उसकी आँखों में देख सकता था, उसके हर एक भाव को पढ़ सकता था। उसने अपनी टाँगें मेरी कमर के चारों ओर लपेट लीं, मुझे और गहराई तक खींचते हुए। उसकी कराहें और फुसफुसाहटें मेरे कानों में मधुर संगीत की तरह लग रही थीं।
कुछ देर बाद, मैंने अपनी पोज़िशन बदली। मैं उसके पास लेट गया, और हम साइड-बाय-साइड हो गए। हमारे अंग आपस में उलझ गए। यह अधिक अंतरंग था, हम एक-दूसरे को चूम सकते थे, छू सकते थे। इस पोज़िशन में गति धीमी थी लेकिन गहरी। मैं उसके शरीर के हर हिस्से को छू सकता था – उसके स्तन, उसकी कमर, उसके नितंब। हर स्पर्श पर वह सिहर उठती।
फिर, एक आवेग में, मैंने उसे धीरे से पलट दिया। वह अपने पेट के बल लेट गई। मैंने उसके पीछे खड़े होकर, डॉगी स्टाइल पोज़िशन में, फिर से उसमें प्रवेश किया। इस कोण से गहराई और भी ज़्यादा थी। उसने अपना सिर तकिए में दबा लिया, और उसकी कराहें दबी हुई और तीखी हो गईं। मैंने अपनी गति तेज़ की। तभी उसने अपना एक हाथ पीछे ले जाकर खुद को फैलाया, मुझे और गहराई तक जाने के लिए जगह देते हुए। यह देखकर मेरे भीतर का जानवर जाग उठा।
मेरे हाथ उसके नितंबों पर गए, और मैंने एक थप्पड़ जड़ा। आवाज़ गूँज उठी। उसने चीख़ मारी, लेकिन वह चीख़ आनंद से भरी हुई थी। मैंने फिर मारा, और फिर… एक लय बन गई। मेरे थप्पड़ों की आवाज़ और उसकी कराहों की आवाज़ कमरे में गूँजने लगीं। मेरे भीतर तनाव बढ़ रहा था, एक विस्फोटक सीमा तक। मेरी गति अनियंत्रित हो गई, तेज़ और जंगली। और फिर यह हुआ – एक गहरा, स्खलनकारी झटका जिसने मेरी रीढ़ की हड्डी से होते हुए मेरे पूरे शरीर को झंकृत कर दिया। मैं गरजा, उसके अंदर अपना सारा तनाव छोड़ते हुए।
मेरे स्खलन के झटकों ने उसे भी उत्तेजित कर दिया। मेरे थप्पड़ों से उसकी गांड लाल हो गई थी, और उस उत्तेजना ने उसे भी चरम पर पहुँचा दिया। वह एक लम्बी, कर्कश चीख़ के साथ चरमोत्कर्ष पर पहुँची, उसका शरीर मेरी गति के साथ ऐंठ गया। फिर हम दोनों ही स्थिर हो गए, केवल हमारी तेज़ साँसें ही कमरे में सुनाई दे रही थीं।
मैं उसके ऊपर गिर पड़ा, अपना वजन उस पर डालते हुए। हमारी पसलियाँ एक दूसरे के खिलाफ फड़फड़ा रही थीं। उसकी पीठ पर पसीना चमक रहा था। मैंने अपना सिर उसके कंधे पर रख दिया और उसके कान के पास फुसफुसाया, “सोनम…” वह कोई जवाब नहीं दे पाई, बस एक सुखद सी सिसकारी भरी।
कुछ मिनट बाद, मैं उसके अंदर से निकल आया और उसके बगल में लेट गया। वह पलटी और अपना सिर मेरी छाती पर रख लिया। हम कुछ देर तक चुपचाप लेटे रहे, केवल हमारे दिलों की धड़कनें ही धीरे-धीरे सामान्य हो रही थीं। बाहर से धर्मशाला की रात की ठंडी हवा का झोंका खिड़की से अंदर आया, हमारे गर्म शरीरों पर एक सुखद सिहरन लाता हुआ।
वह पहली बोली। “वाह…” उसने कहा, उसकी आवाज़ थकी हुई लेकिन संतुष्ट। “ये… ये तो बहुत intense था।”
मैंने मुस्कुराते हुए उसके बालों में उँगलियाँ फेरीं। “हाँ। शांति को एक्साइटमेंट से रिप्लेस करने का यही तो तरीका था न?”
वह हँस पड़ी, एक कोमल, थकी हुई हँसी। “हाँ। बिल्कुल सही तरीका था।”
हम फिर से चुप हो गए। मेरा दिमाग अभी भी उस रोमांच से भरा हुआ था – किचन के काउंटर से लेकर इस बिस्तर तक का सफर। सोनम की आँखों में वो चमक, उसकी कराहें, उसकी गर्मी… सब कुछ मेरी यादों में ताजा था। मैंने उसे और करीब खींचा, और उसने मेरी बाँहों में आराम से सिमटते हुए एक गहरी साँस ली। धर्मशाला की वो रात, और वो चुभती हुई गर्मी… शायद यही वो पल था जिसने मेरे धर्मशाला प्रवास को एक यादगार बना दिया। और सोनम… वो तो अब सिर्फ एक याद नहीं, बल्कि मेरे शरीर और दिमाग पर एक अमिट छाप बनकर रह गई थी।
