वो पनिपत की गर्मी और एक बेचैन शाम का वो मदहोश अंजाम: पलक और मेरी कहानी

मेरा नाम अंकित हूडा है और मैं पनिपत का रहने वाला हूँ। यह कहानी उस शाम की है, जिस शाम ने मेरी ज़िन्दगी के एकांतपन को एक ऐसे रंग से भर दिया, जिसकी कल्पना भी नहीं की थी। वो गर्मियों की एक typical शनिवार की शाम थी। सूरज ढलने का नाम नहीं ले रहा था, और हवा में उमस इस कदर थी कि शरीर से चिपकी हुई कपास की कमीज़ भी बोझिल लग रही थी। मैं अपने उस छोटे से फ्लैट के बालकनी में खड़ा, नीचे सड़क पर शाम की भीड़ को देख रहा था। पनिपत की इस कॉलोनी में शाम ढलते ही एक अजीब सी ज़िन्दादिली आ जाती है – बच्चों की चीखें, गली के कुत्तों का भौंकना, और कहीं दूर से आती बाइक के साइलेंसर की आवाज़।

मेरा फ्लैट शहर के उस हिस्से में है जहाँ न नए शहर की चकाचौंध है, न पुराने शहर की भीड़भाड़। एक सुन्दर सा बैलेंस। उस दिन मैं अकेला था। दोस्त लोग अपने-अपने काम में व्यस्त। दिमाग में कुछ ख़ास नहीं चल रहा था, बस वही रोज़मर्रा की उबाऊ ज़िन्दगी का एक और दिन। तभी मोबाइल की घंटी बजी। स्क्रीन पर नाम था – पलक। एक मुस्कुराहट मेरे चेहरे पर आ गई। पलक… वो लड़की जिससे मेरी मुलाक़ात महीने भर पहले, सिटी सेंटर के उस छोटे से कैफ़े ‘ब्लू टोकरी’ में हुई थी। दोस्तों के ग्रुप में वो एक दोस्त की दोस्त के तौर पर आई थी। पहली नज़र में ही कुछ अलग लगी थी। उसकी आवाज़ में एक मिठास थी, और आँखों में एक चंचलता, जो बात-बात पर मुझे देखकर मुस्कुरा देती थी।

पलक की आवाज़ फोन पर और भी मधुर लगी। “हेलो अंकित, क्या कर रहे हो? बोर तो नहीं हो रहे अकेले-अकेले?” उसने पूछा, उसकी आवाज़ में एक playful टोन थी।
“अरे पलक! नहीं यार, बस… टाइम पास कर रहा था। तुम कहाँ हो?” मैंने कहा।
“मैं तो तुम्हारे एरिया में ही हूँ। कुछ शॉपिंग करने आई थी। अब वापस जाने का मन नहीं कर रहा। अगर तुम्हारा कोई प्लान नहीं है, तो चलो कहीं चाय पीते हैं?” उसका प्रस्तआव सुनकर मेरे दिल की धड़कन थोड़ी तेज़ हो गई। एक अजीब सी बेचैनी महसूस हुई। शायद अकेलेपन से छुटकारा मिल जाएगा, ये सोचकर मैंने हाँ कह दिया।

हम ‘ब्लू टोकरी’ कैफ़े में मिलने का फैसला किया। मैं तैयार होकर निकला। गर्मी के मारे शहर में शाम के ढलते ही थोड़ी राहत महसूस हो रही थी। कैफ़े पहुँचा तो पलक पहले से ही एक कोने की टेबल पर बैठी मेरा इंतज़ार कर रही थी। उस दिन वो एक साधारण सी नीली जीन्स और एक सफ़ेद ऑफ-शोल्डर टॉप पहने हुई थी। उसके लम्बे, काले बाल खुले हुए थे, जो उसके चेहरे के नाज़ुक ढाँचे पर और भी खिले हुए लग रहे थे। उसकी आँखें, जिनमें एक natural काजल सा लगा था, मुझे देखते ही चमक उठीं। उसके होंठों पर एक हल्की सी गुलाबी टिंट थी। वो सचमुच आकर्षण की मूरत लग रही थी।

“तुमने तो time नहीं लिया,” मैंने कहा, बैठते हुए।
“तुम्हें बुलाया था ना, तो देर कैसे करती?” उसने मुस्कुराते हुए कहा, और उसकी नज़रें एक पल के लिए मेरी आँखों से चिपक गईं। एक ललक सी महसूस हुई, पर हम दोनों ने ही नज़रें झुका लीं। बातचीत शुरू हुई – ऑफिस के किस्से, common friends की बातें, फिर धीरे-धीरे personal बातों पर आ गई। पता चला कि उसे भी अकेलापन काफी खलता है। “तुम्हारे साथ बात करने में अच्छा लगता है, अंकित,” उसने एक पल की चुप्पी के बाद कहा, अपनी चाय के कप को घुमाते हुए। उसकी उंगलियों का movement देखकर मेरा ध्यान भटक गया। “मुझे भी,” मैंने सच कहा।

कैफ़े से निकलते वक़्त शाम ढल चुकी थी। “चलो, मैं तुम्हें ड्रॉप कर देता हूँ,” मैंने कहा। वो मान गई। मेरी बाइक पर बैठते वक़्त उसने हल्के से मेरी कमर पकड़ी। रास्ते भर हवा के झोंके और उसके शरीर का हल्का सा स्पर्श एक अजीब सी सिहरन पैदा कर रहा था। उसके घर के बाहर उतरते हुए उसने कहा, “अच्छा, तो अब मिलते रहना। अकेले मत बैठा करो।” और फिर एक क्षण के लिए रुककर बोली, “अगर तुम्हारा मन करे… तो कभी चाय के लिए मेरे घर भी आ सकते हो। मैं अकेली रहती हूँ।” ये कहकर वो तेज़ी से अंदर चली गई, मुझे हैरान छोड़कर। उसकी बातों में एक कशिश थी, जो मुझे खींच रही थी।

अगले कुछ हफ़्तों में हमारी मुलाक़ातें बढ़ती गईं। कभी लंच के लिए, कभी शाम को वॉक के लिए। हर बार बातचीत और गहरी होती जाती। मैंने महसूस किया कि पलक सिर्फ़ खूबसूरत ही नहीं, बहुत समझदार और हंसमुख भी है। उसकी हंसी एक contagious सी थी। एक दिन हम पनिपत के ओल्ड टाउन की तंग गलियों में घूम रहे थे। भीड़ में उसका हाथ कभी-कभी मेरे हाथ से टकरा जाता। एक बार तो वो पूरी तरह से मेरे हाथ पर आ गिरा। उसने तुरंत हाथ हटा लिया, पर उसके चेहरे पर एक शरारती सी मुस्कान थी। “सॉरी,” उसने कहा, पर उसकी आँखों में ‘सॉरी’ जैसा कुछ नहीं था। उस दिन लौटते वक़्त, मेरे फ्लैट के बाहर, उसने अचानक पूछा, “अंकित, तुम्हें कभी अकेले में डर नहीं लगता?” मैंने कहा, “नहीं, क्यों लगेगा?” वो बोली, “पता नहीं… कभी-कभी लगता है कि अकेलापन खा जाएगा।” और फिर बिना कुछ कहे, उसने मुझे जल्दी से गले लगा लिया। वो embrace ज्यादा देर तक नहीं था, पर उसकी गर्माहट और उसके बालों की खुशबू ने मुझे एक पल के लिए मदहोश सा कर दिया। उसने पीछे हटते हुए कहा, “गुड नाइट,” और चली गई। मेरे दिल की धड़कनें लंबे वक़्त तक सामान्य नहीं हुईं।

फिर वो शाम आई। पलक का मैसेज आया, “चाय बना रही हूँ, अगर तुम पास हो तो आ जाओ।” मैं तैयार हुआ और निकल पड़ा। उसका घर एक छोटे से सोसाइटी में था। दरवाज़ा खोला तो वो एक साधारण सी सलवार सूट पहने हुई थी, पर उस पर भी वो कमाल की लग रही थी। उसके गीले बाल बताते थे कि अभी-अभी नहा कर आई है। कमरे में चाय की खुशबू थी। “आ जाओ, बैठो,” उसने कहा। हमने चाय पी, और हमेशा की तरह बातें करने लगे। पर आज का माहौल कुछ अलग था। हवा में एक तनाव सा था। शायद इसलिए कि हम दोनों जानते थे कि हम अकेले हैं। कोई नहीं आने वाला।

चाय ख़त्म हुई तो वो उठकर बर्तन उठाने लगी। मैं भी मदद के लिए उठा। रसोई की तंग जगह में हमारे शरीर एक दूसरे के बहुत करीब आ गए। उसने मुड़कर कुछ कहना चाहा, और उसका चेहरा मेरे चेहरे के इतना करीब आ गया कि मैं उसकी सांसों की गर्माहट महसूस कर सकता था। उसकी नज़रें मेरे होंठों पर टिक गईं। मेरा गला सूख गया। एक लम्बी चुप्पी छा गई, जिसमें सिर्फ़ हमारी सांसों की आवाज़ थी। फिर, जैसे कोई बिजली का झटका लगा हो, मेरे होंठ उसके होंठों से टकरा गए। शुरुआत में वो चुंबन कोमल था, एक अनिश्चित सा स्पर्श। पर फिर, जैसे ही उसने जवाब दिया, वो तीखा और गरम होता चला गया। उसने अपनी बाँहें मेरी गर्दन के चारों ओर लपेट दीं, और मैंने उसकी कमर को अपनी बाँहों में कस लिया। वो पल एक सपने जैसा था – उसके होंठों की मिठास, उसके शरीर की गर्माहट, और उस उत्तेजना का अहसास जो हर रोम-रोम में फैल रही थी।

अचानक उसने अपना सर पीछे हटाया, उसकी आँखों में एक अलग ही चमक थी। वो मेरा हाथ पकड़कर लिविंग रूम की तरफ़ खींचने लगी। वहाँ एक आरामदायक सोफा था। उसने मुझे धक्का देकर उस पर बैठा दिया। और फिर, बिना एक शब्द कहे, वो मेरे ऊपर आकर बैठ गई, मेरी जांघों पर अपनी जांघें रखकर। उसकी स्थिति ने मेरे अंदर एक जंगली सी वासना जगा दी। उसने फिर से मेरे होंठों को अपने होंठों से ढक लिया, और अपने शरीर को मेरे शरीर से रगड़ने लगी। कपड़ों के बावजूद, उसके स्तनों का दबाव मेरी छाती पर और उसके निचले हिस्से का दबाव मेरे ऊपर एक अद्भुत उत्तेजना पैदा कर रहा था। उसकी सांसें तेज़ हो रही थीं, और मेरे कानों में उसकी हल्की सी फुसफुसाहट आई, “तुम्हारे हाथ… मुझे छूने दो।”

उसने मेरे हाथों को पकड़ा और धीरे से अपने ऊपर ले गई। उसने उन्हें अपने स्तनों पर रख दिया। उसकी आँखें मेरी आँखों में घुस गईं, और उसने एक कर्कश, लालित्य भरी आवाज़ में कहा, “इन्हें दबाओ… थोड़ा सा दर्द देकर।” उसकी बात सुनकर मेरे अंदर एक झटका सा लगा, पर उसकी नज़रों में इतनी बेताबी और इतना विश्वास था कि मैं मना नहीं कर सकता था। मैंने धीरे से, फिर ज़ोर से अपनी उंगलियों से उसके नरम मांस को भींचा। उसने अपनी आँखें बंद कर लीं और एक मदहोश सी आह भरी। फिर उसने कहा, “और… थप्पड़ मारो।” मैंने हल्के से, फिर थोड़ा ज़ोर से उसके एक स्तन पर हथेली से वार किया। उसकी चीख निकल गई, पर वो एक संतुष्टि भरी चीख थी। मैंने देखा कि उसके निपल्स कपड़े के अंदर से सख्त होकर उभर आए थे। ये देखकर मेरी कामेच्छा और भी भड़क उठी।

उसने अपने हाथों से मेरी शर्ट के बटन खोलने शुरू कर दिए। उसकी उंगलियों का स्पर्श मेरी त्वचा पर आग लगा रहा था। शर्ट खुलते ही उसने अपने नाखूनों से मेरी छाती पर हल्के से खरोंचे मारनी शुरू कर दीं। दर्द में एक अजीब सी मिठास थी। फिर उसने अपनी जांघों का दबाव बढ़ाया और धीरे-धीरे अपने हिप्स को नीचे किया। मैंने महसूस किया कि वो मेरे पैंट के बटन खोल रही है। एक पल की असमंजस के बाद, वो अपने सलवार की धोती को हटाते हुए, मेरे ऊपर धीरे से नीचे आई। और फिर, एक लम्बी, गहरी सांस लेते हुए, उसने मुझे अपने अंदर ले लिया।

पहला प्रवेश एक ऐसी अनुभूति थी जिसका वर्णन शब्दों में कर पाना मुश्किल है। गर्मी, तंगापन, और एक पूर्णता का अहसास। उसने एक कराहट भरी आह निकाली, और मैंने अपनी आँखें बंद कर लीं, इस पल को महसूस करने के लिए। वो धीरे-धीरे, ऊपर-नीचे हिलने लगी। उसकी गति एक ताल की तरह थी – धीमी, नियंत्रित, पर गहरी। वो अपने हाथों को मेरे कंधों पर टिकाए, अपने सर को पीछे की ओर झुकाए हुए थी। उसकी यह अदा देखकर मैं और भी उत्तेजित हो उठा। मैंने अपने हाथों से उसके स्तनों को पकड़ा, और उसके कड़े हुए निपल्स को अपनी उंगलियों के बीच मरोड़ा। उसकी एक तीखी सी सिसकी निकली, और उसकी गति थोड़ी तेज़ हो गई।

“हाँ… ऐसे ही,” वो फुसफुसाई। उसकी आवाज़ में एक दर्द भरी खुशी थी। मैंने उसके निपल्स को और ज़ोर से दबाया, घुमाया। उसकी सांसें तेज़ होती जा रही थीं, और उसके चेहरे पर एक मद छा गया था। वो अब तेज़ी से ऊपर-नीचे हो रही थी, उसके शरीर का उछाल एक मधुर लय बन गया था। उसके बाल हवा में लहरा रहे थे, और उसकी आँखें अर्ध-बंद थीं, मुख पर एक तीव्र एकाग्रता। अचानक, मैंने अपने आप को उठाया, उसे अपने ऊपर लिए हुए। वो हैरान रह गई, पर उसने अपनी टांगें मेरी कमर पर और कसकर लपेट लीं। मैं खड़ा हो गया, अब भी उसके अंदर धंसा हुआ। उसका वजन मेरे ऊपर था, पर उस पल में मुझे कोई बोझ महसूस नहीं हुआ, सिर्फ़ एक जुनून था।

मैंने उसे उठाकर दीवार की तरफ़ मोड़ा और उसके पीठ को ठोस दीवार से दबा दिया। उसने अपनी बाँहें मेरे कंधों पर जकड़ लीं, और मैंने उसे सहारा देते हुए, ज़ोर-ज़ोर से उसके अंदर प्रहार करना शुरू कर दिया। हर thrust के साथ दीवार से उसकी पीठ टकराती, और वो मदहोश सी आहें भरती। उसकी आवाज़ें, उसकी कराहटें, सब मिलकर एक symphony बना रही थीं। उसकी टांगें मेरी कमर पर कसती जा रही थीं, और मैं और तेज़, और गहरे thrusts मारता जा रहा था। फिर अचानक, उसके शरीर में एक ज़ोरदार ऐंठन हुई। उसने अपना सर पीछे की ओर फेंका, एक लम्बी, दम घुटती सी चीख निकाली, और उसका पूरा शरीर काँपने लगा। उसकी आँखें खुली रह गईं, पर नज़रें कहीं और थीं। उसका ओर्गास्म था, intense और raw। मैंने अपनी गति रोक दी, उसे इस पल को महसूस करने दिया।

थोड़ी देर बाद, जब उसके शरीर की ऐंठन कम हुई, मैंने उसे दीवार से हटाया और बेडरूम की तरफ़ ले चला। बिस्तर पर मैंने उसे कोमलता से लिटाया। वो थकी हुई, पर संतुष्ट लग रही थी, उसकी आँखों में एक चमक थी। मैं उसके ऊपर आया, और एक बार फिर उसके अंदर प्रवेश किया। अब की बार गति धीमी थी, गहरी थी। हर thrust के साथ मैं उसकी आँखों में देखता, और वो मेरी तरफ़ देखती। ये कोमलता पहले के उन्माद से बिलकुल अलग थी, पर उतनी ही तीव्र। उसने अपनी उंगलियाँ मेरे बालों में फंसा लीं, और मुझे अपनी ओर खींचा। हमारे होंठ फिर से मिले, एक कोमल, भावनात्मक चुंबन में। मेरी गति धीरे-धीरे तेज़ होने लगी, और मैंने अपनी सारी शक्ति लगा दी। आखिरी क्षणों में, मैंने खुद को उसकी गहराई में छोड़ दिया, एक गहरी, लम्बी कराह के साथ। मेरा सारा तनाव, सारी बेचैनी, उसी पल बह गई।

शांति छा गई। सिर्फ़ हमारी सांसों की आवाज़ें थीं, जो धीरे-धीरे सामान्य हो रही थीं। मैं उसके ऊपर से हटकर उसके बगल में लेट गया। वो तुरंत मेरी ओर मुड़ी और अपना सर मेरी छाती पर रख लिया। हम कुछ देर तक बिना कुछ कहे वैसे ही लेटे रहे। उसकी गर्म सांसें मेरी त्वचा पर पड़ रही थीं। फिर उसने धीरे से कहा, “धन्यवाद, अंकित।” मैंने पूछा, “किस लिए?” वो बोली, “इस शाम के लिए… इस एहसास के लिए… इस बेचैनी से छुटकारा दिलाने के लिए।” मैंने उसे और पास खींच लिया। बाहर से रात की ठंडी हवा का झोंका आया, पर अंदर की गर्मी ने उसे गर्म कर दिया था। मैं जानता था कि ये सिर्फ़ एक शाम की बात नहीं थी। ये एक शुरुआत थी। पनिपत की उस गर्मी में, एक बेचैन शाम ने दो अकेले दिलों को एक ऐसे बंधन में बाँध दिया था, जिसकी शुरुआत वासना से हुई थी, पर जिसमें एक गहरी समझ का बीज छिपा था। और मैं, अंकित हूडा, उस बीज के अंकुरित होने का इंतज़ार करने लगा।