मेरे पति मुझे अपने बॉस के साथ सेक्स करने के लिए भेजते हैं।

मैं कविता हूँ, और यह कहानी मेरी है। पिछले छह साल से मैं नोएडा के सेक्टर 74 में एक छोटे से 2BHK फ्लैट में अपने पति रोहित के साथ रह रही हूँ। रोहित एक मिड-लेवल मैनेजर है, एक प्राइवेट फर्म में। मैं एक डिजाइन एजेंसी में फ्रीलांस ग्राफिक डिजाइन का काम करती हूँ। पैसों की टेंशन हमेशा से रही है, लेकिन पिछले कुछ महीनों से वह दबाव एक सीमा पार कर गया है। कर्ज़ा, कार का इंश्योरेंस, और अब सोसाइटी की मेंटेनेंस फीस बढ़ गई है। रोहित हमेशा चिंतित दिखता है, उसकी आँखों के नीचे काले घेरे पड़ गए हैं।

एक शुक्रवार की शाम, वह घर आया तो उसका चेहरा मिट्टी जैसा पीला था। उसने अपना बैग फेंका और सीधे किचन में आया, जहाँ मैं रात का खाना बना रही थी।
“क्या हुआ?” मैंने पूछा, हाथ में कलछी रोककर।
उसने एक लंबी साँस ली। “कंपनी में रिस्ट्रक्चरिंग चल रही है। मेरी पोजीशन… अट रिस्क है।”
मेरा दिल धक से रह गया। “क्या मतलब? तुम तो टीम लीड हो।”
“हूँ। पर अब ‘कॉस्ट-कटिंग’ का दौर है। तीन महीने का नोटिस पीरियड है। पर अगर मैं… अगर मैं एक प्रोजेक्ट सेटल कर दूँ, तो शायद बच सकता हूँ।”
उसकी आवाज़ में एक अजीब डर था, एक ऐसी लाचारी जो मैंने पहले कभी नहीं देखी थी। उसने मुझे देखा, फिर नज़रें चुरा लीं। “बॉस… मिस्टर खन्ना… उन्होंने एक प्रपोजल दिया है।”

मिस्टर राजीव खन्ना। रोहित के डिपार्टमेंट के हेड, एक चालबाज़, धूप के चश्मे पहनने वाले, पचास साल के आदमी जिनकी नज़र हमेशा औरतों पर रेंगती रहती थी। मैंने उन्हें कंपनी के एक इवेंट में देखा था, उनकी नज़रें मेरे ऊपर से हटती ही नहीं थीं।
“क्या प्रपोजल?” मैंने पूछा, आवाज़ थोड़ी कर्कश हो गई।
रोहित ने अपना चेहरा हाथों में छुपा लिया। “वो… वो चाहते हैं कि तुम उनकी एक पर्सनल प्रोजेक्ट पर काम करो। एक प्राइवेट वीकेंड रिट्रीट के लिए डिजाइन का काम। पेमेंट अच्छा होगा। बहुत अच्छा। और… और मेरी जॉब सेफ हो जाएगी।”
“तो इसमें परेशानी क्या है?” मैंने कहा, पर मेरा दिमाग तेजी से काम कर रहा था। कुछ सही नहीं लग रहा था।
“प्रपोजल… प्राइवेट है। उनके फार्महाउस में। इसी वीकेंड। सिर्फ… सिर्फ तुम और वो।”

कमरे की हवा जम गई मानो। मेरी साँसें रुक सी गईं। “क्या कह रहे हो तुम?”
“कविता, सुनो,” वह मेरे पास आया, उसने मेरे हाथ पकड़े। उसकी हथेलियाँ पसीने से तर थीं। “हमारे पास कोई चारा नहीं है। अगर मैं नौकरी गँवा दूँगा, तो हम इस फ्लैट का इएमआई भी नहीं भर पाएँगे। हमें शहर छोड़ना पड़ेगा। मेरे माँ-बाप… उनकी मेडिकल कीमतें… तुम जानती हो।”
“पर यह… यह तो सीधा शोषण है!” मैंने अपना हाथ झटककर छुड़ा लिया। “तुम मुझे उसके पास अकेले भेज रहे हो? अपनी पत्नी को? तुम्हें कुछ शर्म आती है?”
उसकी आँखों में आँसू आ गए। “शर्म आती है, कवि। हर पल आती है। पर मैं मजबूर हूँ। वो मेरी जिंदगी की सारी मेहनत पर पानी फेर सकता है। बस एक वीकेंड… बस डिजाइन का काम करना है तुम्हें।”
“और अगर वो कुछ और चाहे?” मैंने चीख़कर पूछा।
रोहित ने नज़रें झुका लीं। उसका सिर हिला, मानो वह इस सवाल का जवाब देने से भी डर रहा था। उसकी यह चुप्पी मेरे लिए एक तमाचे से कम नहीं थी। मेरा अपना पति, जिसने मुझे हमेशा सुरक्षित महसूस कराया था, आज मुझे एक शिकारी के सामने धकेल रहा था। विश्वास का एक ऐसा टुकड़ा मेरे भीतर टूटा कि उसकी आवाज़ मुझे दूर, बेमानी लगने लगी।

शनिवार की सुबह, मैंने एक सादी सी सूती साड़ी पहनी, चेहरे पर बिल्कुल मेकअप नहीं। रोहित ने मुझे गेट तक छोड़ा, उसने मेरा हाथ दबोचा। “बस… सावधान रहना। और… माफ़ करना।”
मैंने उसकी तरफ देखा भी नहीं। मेरा गला भरा हुआ था। खन्ना का फार्महाउस नोएडा एक्सटेंशन में था, एक विशाल, आधुनिक बंगला। उसने खुद दरवाज़ा खोला। उस दिन वह कैज़ुअल ड्रेस में था – एक फिटेड वी-नेक टी-शर्ट और चड्ढ़ी। उसकी नज़रें मेरे शरीर पर ऐसे दौड़ीं जैसे मैं कोई चीज़ हूँ, कोई इंसान नहीं।
“आइए, कविता जी,” उसने एक चिकनी मुस्कान के साथ कहा। “आपका स्वागत है।”
अंदर का लिविंग रूम विशाल था, फर्श पर महँगे पर्शियन कारपेट बिछे थे। एक कोने में एक डिजाइनर सोफा सेट था। उसने मुझे वहीं बैठने को कहा।
“तो, प्रोजेक्ट के बारे में बताइए,” मैंने औपचारिकता बनाए रखते हुए कहा।
“प्रोजेक्ट… बाद में,” उसने आराम से कुर्सी पर पीछे झुकते हुए कहा। उसकी नज़रें मेरे चेहरे पर टिकी थीं। “रोहित ने बताया होगा कि यह कितना ज़रूरी है उसके लिए।”
“हाँ।”
“और तुम्हारे लिए भी। अच्छी खासी रकम मिलेगी। एक फ्रीलांसर के लिए तो सोने के अंडे जैसा है।”
मैं चुप रही।
“देखो कविता,” उसने अपनी आवाज़ को नरम, अंतरंग बनाते हुए कहा। “यह दुनिया सौदेबाजी से चलती है। रोहित अपनी नौकरी बचाना चाहता है। मैं उसे बचा सकता हूँ। बदले में… मुझे कुछ चाहिए।”
“डिजाइन का काम।” मैंने दोहराया।
वह हँसा, एक खुरदुरी, बेपरवाह हँसी। “डिजाइन तो बहाना है, प्रिय। तुम सुंदर हो। बहुत सुंदर। और मैं… मैं तुम्हें पाना चाहता हूँ। एक वीकेंड। बस इतना ही।”
मेरी रीढ़ की हड्डी में बिजली दौड़ गई। मैं उठ खड़ी हुई। “यह बातचीत खत्म हुई।”
“अगर तुम जाओगी,” उसकी आवाज़ अचानक कठोर हो गई, “तो कल सुबह रोहित को उसका क्लीयरेंस लेटर मिल जाएगा। और मैं यह सुनिश्चित करूँगा कि इस इंडस्ट्री में उसे दोबारा नौकरी न मिले। तुम जानती हो, मेरा दबदबा है।”
मैं वहीं जम गई। यह धमकी थी। सीधी और क्रूर। मैंने दरवाज़े की तरफ देखा, फिर खिड़की की तरफ। मैं भाग सकती थी। पर फिर? रोहित की नौकरी, हमारा घर, सब कुछ… मेरे एक कदम पर टिका था। एक भयानक सी शक्ति मेरे भीतर उठी। गुस्सा नहीं, बल्कि एक सुन्न, निर्णायक ठंडक।
“क्या चाहिए आपको?” मेरी अपनी आवाज़ मुझे अजनबी लगी।
उसकी आँखों में जीत की एक चमक दौड़ गई। वह उठा और मेरे पास आया। उसने अपना हाथ उठाया और मेरे गाल को छुआ। उसकी उँगलियाँ खुरदुरी थीं। “तुम्हारा सब कुछ।”

उस पल, मेरे और रोहित के बीच का सारा प्यार, सारा विश्वास, एक धुंधली याद बनकर रह गया। मेरे पति ने मुझे यहाँ बेच दिया था। अब यह मेरी लड़ाई थी। मेरी शर्तों पर।
मैंने उसका हाथ पकड़ा और उसे अपने चेहरे से हटा दिया। “एक शर्त है।”
वह हैरान रह गया। “शर्त?”
“हाँ। मैं राजी हूँ। पर मैं चाहूँगी कि यह मेरे तरीके से हो।”
एक अजीब सी उत्सुकता उसके चेहरे पर आ गई। उसने सिर हिलाया। “बोलो।”
“पहले, तुम मुझे वो पूरी रकम दो, नकद। अभी।” मैंने कहा। “दूसरा, रोहित के प्रमोशन और सैलरी इन्क्रीमेंट का लिखित आश्वासन, तुम्हारे साइन के साथ।”
उसने सोचा, फिर मुस्कुराया। “चलो, मज़ा आएगा। तुम जैसी औरत के लिए थोड़ा रिस्क तो लिया ही जा सकता है।” वह एक कमरे में गया और एक मोटा लिफाफा लेकर आया। उसमें नोटों के गड्डे थे। फिर उसने एक पेपर पर कुछ लिखकर साइन किया और मुझे थमा दिया। “संतुष्ट?”
मैंने लिफाफा और पेपर अपने पर्स में रख लिए। एक अजीब सी शांति मुझ पर छा गई। अब मैं नियंत्रण में थी। मेरा शरीर अब सिर्फ एक हथियार नहीं था, बल्कि एक विकल्प बन गया था।
“अब,” मैंने कहा, और धीरे-धीरे अपनी साड़ी का पल्लू सम्हालते हुए, “तुम्हें वो मिलेगा जो तुम चाहते हो। पर याद रहे, अब से हर कदम मेरे कहे अनुसार।”
उसकी आँखों में कामुकता के साथ-साथ हैरानी भी थी। उसने हाँ में सिर हिलाया।
मैं सोफे पर वापस बैठ गई और अपनी साड़ी का ब्लाउज खोलना शुरू किया। बटन एक-एक करके खुलते गए। उसने साँस रोककर देखा। मैंने ब्लाउज उतारकर एक तरफ रख दिया। मेरे स्तन एक साधारण सूती ब्रा में कैद थे। मैंने उसकी तरफ देखा। “आओ।”
वह एक दमंत की तरह आगे बढ़ा। उसने मेरे सामने घुटनों के बल बैठकर मेरे स्तनों को अपने हाथों से ढँक लिया। उसकी साँसें तेज थीं। उसने ब्रा के कप को नीचे खिसकाया और मेरे एक स्तन को मुँह में ले लिया। उसने जोर से चूसा, दाँतों से कुछ कसकर काटा। एक तेज दर्द उभरा, पर मैंने कोई आवाज़ नहीं निकली। मैंने उसके बालों में अपनी उँगलियाँ फँसा दीं और उसे और जोर से अपनी तरफ दबाया। वह आश्चर्यचकित रह गया, फिर और उत्तेजित हो गया।
उसने मुझे सोफे पर ही लिटा दिया और मेरी साड़ी की चुन्नट खोलनी शुरू की। मैं निष्क्रिय नहीं थी। मैंने अपने हाथों से उसकी टी-शर्ट ऊपर खींची और उसे उतार फेंका। उसका शरीर मुलायम था, पसीने से लथपथ। मैंने उसकी छाती पर अपने नाखूनों के निशान बनाए। वह कराह उठा।
“तुम… तुम जबरदस्त हो,” उसने हाँफते हुए कहा।
मैं मुस्कुराई। “अभी तो शुरुआत है।”
उसने मेरी पेटी उतार दी और मेरे अंडरवियर को तीखी गति से नीचे खींचा। उसकी नज़रें मेरी योनि पर टिक गईं। उसने अपनी उँगली उठाई और धीरे से मेरे भगोष्ठों पर फेरी। मैंने अपनी टाँगें और खोल दीं। एक आत्मसमर्पण नहीं, बल्कि एक निमंत्रण था यह।
“चाटो,” मैंने आदेश दिया।
उसने आज्ञाकारी भाव से सिर हिलाया और अपना मुँह मेरी योनि पर लगा दिया। उसकी जीभ ने जोरदार घुमाव लगाना शुरू किया। एक गहरी, अंधेरी संतुष्टि मेरे भीतर उठी। यह मेरा शरीर था, और मैं इसे बेच रही थी, पर उसकी कीमत वसूल रही थी। मैंने सिर उठाकर देखा, वह लगन से काम में जुटा था। मैंने अपने हाथों से उसके सिर को दबोचा और अपनी योनि को उसके चेहरे से और रगड़ा। वह कराहता रहा, उत्तेजना से तड़पता रहा।
कुछ देर बाद, मैंने उसे ऊपर खींचा। “अब तुम्हारी बारी।”
उसने अपनी पैंट उतार दी। उसका लिंग खड़ा था, आकार में औसत, शायद छह इंच का। मैंने उसे हाथ से पकड़ा और जोर से दबाया। वह चिल्लाया। “आह! हल्के से।”
“चुप रहो,” मैंने कहा और उसे सोफे पर पीठ के बल लिटा दिया। मैं उसके ऊपर सवार हो गई। मैंने उसका लिंग पकड़ा और सीधा अपनी योनि के प्रवेश द्वार पर रखा। मैंने नीचे देखा, उसकी आँखों में लालसा और एक डर भी था। फिर मैंने नीचे दबाव डाला।
मेरी योनि ने उसके लिंग को एक ही बार में पूरा निगल लिया। वह जोर से चीख़ा। “ओह! कविता!”
मैंने गति पकड़नी शुरू की। ऊपर-नीचे। मेरे स्तन उछल रहे थे। मैंने अपने हाथों से उसकी छाती को दबोचा, अपने नाखून गड़ाए। उसकी आँखें फटी की फटी रह गईं। वह बड़बड़ाने लगा, “हाँ… हाँ… ऐसे ही… तुम रानी हो… मेरी रानी।”
पर मैं रानी नहीं थी। मैं एक व्यापारी थी। और यह मेरा सौदा था। मैंने और तेज गति की। मेरे भीतर एक आग जल रही थी, एक ऐसी आग जो गुस्से और शक्ति से भरी थी। मैं मजे ले रही थी। मेरे पति ने कभी मुझे ऐसा आनंद नहीं दिया था। शायद इसलिए कि वह मुझे कभी बराबर नहीं समझ पाया। यह आदमी, यह शिकारी, आज मेरा शिकार बन चुका था।
मैंने गति और बढ़ा दी, जोर-जोर से साँसें लेते हुए। मेरी योनि उसके लिंग को कसकर जकड़े हुए थी। वह चीख़ने लगा, “मैं… मैं निकलने वाला हूँ!”
“नहीं,” मैंने दमदार आवाज़ में कहा। “जब तक मैं न कहूँ, नहीं।”
मैंने गति रोक दी और उस पर बैठी रही, केवल अंदर हलचल करते हुए। उसका चेहरा पीड़ा से तन गया। वह मेरी मर्जी का गुलाम बन चुका था। कुछ और मिनटों तक मैंने उसे ऐसे ही रखा, फिर गति फिर से शुरू की। इस बार और भी तेज, और भी बेरहम। मेरे शरीर से पसीना बह रहा था, मेरे बाल चिपक गए थे। आखिरकार, मैंने स्वयं एक झटके के साथ ऊँची चीख़ निकाली, मेरा शरीर काँप उठा। उसी क्षण मैंने उसे आज्ञा दी, “अब निकलो।”
उसका शरीर ऐंठा और वह गरजने लगा, उसका वीर्य मेरी योनि के भीतर गर्म धारा की तरह फूट पड़ा। वह हाँफता रहा, मानो उसकी सारी ऊर्जा खत्म हो गई हो।
मैं उसके ऊपर से उतरी और अपने कपड़े उठाने लगी। मेरा शरीर दर्द कर रहा था, पर मेरा मन हल्का था। मैंने अपना ब्लाउज पहना, फिर साड़ी। वह सोफे पर पड़ा हुआ था, उसकी आँखें बंद थीं।
मैंने अपना पर्स उठाया, जिसमें वह पैसा और वह आश्वासन पत्र था। मैं दरवाज़े की तरफ बढ़ी।
“कविता,” उसने थकी हुई आवाज़ में पुकारा।
मैंने मुड़कर देखा।
“तुम… कभी वापस आओगी?” उसकी आवाज़ में अब भी लालसा थी।
मैंने कोई जवाब नहीं दिया। मैं बाहर निकल आई। शाम का ठंडा हवा का झोंका मेरे गर्म चेहरे से टकराया। मैंने एक टैक्सी बुलाई और घर की तरफ चल पड़ी।

रोहित घर पर ही था, लिविंग रूम में टीवी देख रहा था। जैसे ही मैं अंदर आई, वह उछलकर खड़ा हो गया। उसकी आँखों में चिंता, डर और एक अजीब सी उम्मीद थी।
“कैसा रहा? सब ठीक तो है?” उसने जल्दी-जल्दी में पूछा।
मैंने अपना पर्स टेबल पर रख दिया। “तुम्हारी नौकरी सुरक्षित है। तुम्हारा प्रमोशन और इन्क्रीमेंट भी। यह रहा लिखित आश्वासन।”
उसकी साँसें रुक सी गईं। उसने पेपर की तरफ देखा, फिर मेरी तरफ। उसकी आँखों में राहत की एक लहर दौड़ गई, फिर शर्म की एक काली छाया। “कवि… मैं…”
“और यह रहा पैसा,” मैंने लिफाफा निकालकर रख दिया। “हमारी सारी फाइनेंशियल प्रॉब्लम अब खत्म।”
वह मेरे पास आया, उसने मेरा हाथ पकड़ना चाहा। “तुम्हें… तुम्हें कुछ हुआ? वो… उसने तुम्हारे साथ…”
मैंने उसका हाथ झटक दिया। “जो हुआ, वह तुम्हारी वजह से हुआ। तुमने मुझे चुनना था, अपनी पत्नी को या अपनी नौकरी को। तुमने नौकरी चुनी।”
“पर मैं मजबूर था!” उसने विलाप किया।
“हर कोई मजबूर होता है, रोहित,” मैंने शांत, पर कटु स्वर में कहा। “फर्क सिर्फ इतना है कि तुमने मुझे बेच दिया। और मैंने… मैंने खुद को खरीद लिया।”
मैं बेडरूम की तरफ मुड़ी। “मैं कल सुबह अपना सामान लेकर मायके चली जाऊँगी। तलाक के लिए मेरा वकील तुमसे संपर्क करेगा।”
उसका चेहरा सफेद पड़ गया। “तलाक? नहीं, कविता, ऐसा मत करो। मैं गलती कर बैठा, मैं जानता हूँ। माफ़ कर दो। हम सब कुछ ठीक कर लेंगे।”
मैंने उसकी तरफ पलटकर देखा। उसकी आँखों में सच्चा दुख था। पर अब बहुत देर हो चुकी थी। जिस रिश्ते की नींव में विश्वास न रहा हो, वह महल कैसे टिक सकता था?
“विश्वास एक शीशे के गिलास की तरह होता है, रोहित,” मैंने धीरे से कहा। “एक बार टूट जाए, तो चाहे कितनी भी अच्छी गोंद लगा लो, दरारें हमेशा दिखती रहेंगी। और तुमने तो उसे जानबूझकर फेंककर तोड़ दिया।”
मैं बेडरूम में चली गई और दरवाज़ा बंद कर लिया। उस रात, मैंने सोया नहीं। मैं खिड़की के पास खड़ी होकर बाहर अँधेरे को देखती रही। मेरे शरीर पर खन्ना के दाँतों और नाखूनों के निशान थे। पर उनसे कहीं ज्यादा गहरा निशान मेरे दिल पर था – रोहित के विश्वासघात का। पर हैरानी की बात यह थी कि दर्द के साथ-साथ एक नई ताकत भी मेरे भीतर जाग रही थी। मैंने अपनी कीमत खुद तय की थी। मैं एक वस्तु नहीं रही थी। मैं एक सौदा थी, और मैंने उसमें जीत हासिल की थी।
सुबह होते ही, मैंने एक छोटा सूटकेस भरा। रोहित सोफे पर सोया हुआ था, उसके चेहरे पर आँसू सूखे हुए थे। मैंने उसे देखा, एक पल के लिए दया आई। पर फिर वह पल टूट गया। मैंने चाबी टेबल पर रखी और बिना पीछे मुड़े देखे दरवाज़ा खोला। सीढ़ियों से उतरते हुए, मैंने एक लंबी साँस ली। यह अंत नहीं था। यह एक नई शुरुआत थी। एक ऐसी शुरुआत जहाँ मैं सिर्फ और सिर्फ अपने फैसलों की गवाह बनकर जिऊँगी। बिना किसी की कीमत पर।