मैं, अलोक मंझी, बस उस एक क्षण के लिए जी रहा था। मेरा पूरा शरीर उसकी गर्माहट में डूबा हुआ था, उसकी साँसें मेरे गले में फंसी हुई थीं, और हमारे बीच की हवा में सिर्फ़ तनाव और अनकही इच्छाओं का गुबार घुमड़ रहा था। यह गया का एक साधारण फ्लैट था, जहाँ की दीवारें हमारी चिल्लपों और ख़ामोश चाहतों दोनों की गवाह बनी थीं। और आज रात, सब कुछ एक ऐसे मोड़ पर आकर ठहर गया था, जहाँ से कोई लौटकर नहीं आ सकता था।
यह शुरुआत तो बिल्कुल मामूली झगड़े से हुई थी। प्रिया सिंह, मेरी रूममेट, या यूँ कहूँ कि मेरी ज़िन्दगी में आई एक ऐसी आँधी जिसने मेरे सब क़ायदे-क़ानून तहस-नहस कर दिए। हम एक ही कॉलेज में पढ़ते थे, और पैसे बचाने के चक्कर में इस दो-बेडरूम फ्लैट में शिफ्ट हो गए थे। उसकी पहली नज़र में ही कुछ ऐसा था जो मुझे अपनी तरफ़ खींच लेता। लम्बी, कद-काठी से पतली, मगर उसके चेहरे पर एक अजीब सी बेबाकी और आँखों में एक ऐसी चमक जो किसी भी रात को दिन में बदल सकती थी। वह जीन्स और ढीली टी-शर्ट पहनती, उसके लम्बे बाल अक्सर एक गन्दे बन में बंधे रहते, मगर उसके होंठ… वो होंठ हमेशा एक हल्की सी मुस्कान लिए रहते, जैसे कोई राज़ जानते हों।
पहले कुछ हफ़्ते तो बस औपचारिकताएँ निभीं। “अलोक, पानी का मटका ख़ाली है,” या “प्रिया, तुम्हारा फोन बज रहा है।” फिर धीरे-धीरे बातें बढ़ीं। कॉलेज के प्रोजेक्ट्स पर बहसें, रात को चाय बनाते हुए फ़िल्मों पर बातचीत, और वो अजीब सा वक़्त जब हम दोनों लिविंग रूम में अलग-अलग सोफ़े पर पड़े मोबाइल चलाते रहते। मैंने उसे नोटिस करना शुरू किया। जब वह गहरी सोच में डूबी होती, तो अपने निचले होंठ को दाँतों से दबा लेती। जब कोई फ़नी वीडियो देखती, तो उसकी हँसी पूरे कमरे में गूँज जाती—एक साफ़, बेफ़िक्र हँसी। एक दिन वह बरसात में भीगकर आई, उसकी सफ़ेद कुर्ती उसके शरीर से चिपक गई थी, और मैं अनजाने में ही उसके उभारों पर नज़र टिका बैठा। उसने मेरी नज़र पकड़ी, शर्माई नहीं, बल्कि एक तीखी, चुनौती भरी मुस्कान दिखाते हुए कहा, “देख लिया? अब जाकर तौलिया लाओ।”
उस दिन के बाद एक तनाव पैदा हो गया। एक अदृश्य खिंचाव। किचन में काम करते हुए हमारे हाथ अचानक छू जाते, और हम दोनों एक सिसकी भरी साँस लेकर पीछे हट जाते। वह जानबूझकर मेरे सामने झुकती, ये जानते हुए कि मेरी नज़र उसकी नेकलाइन पर टिक जाएगी। मैं उसके पास बैठकर मूवी देखता, और हमारी जाँघें एक-दूसरे को छूती रहतीं, एक गर्म, बेचैन कर देने वाला स्पर्श। वह मज़ाक में कहती, “अलोक, तुम तो बिल्कुल दीवाने लगते हो आजकल,” और मैं जवाब देता, “तू ही है जो दीवाना बना रही है।” हमारी बातचीत में “डर्टी टॉक” नहीं थी, बस इशारे थे, आँखों के इशारे, और वो लम्बी चुप्पियाँ जिनमें बहुत कुछ कह दिया जाता था।
लेकिन आज रात, सब कुछ अलग था। शायद गर्मी थी, शायद दोनों के दिमाग़ में चल रहा तनाव। वह अपने प्रोजेक्ट के बारे में परेशान थी, मैं अपनी नौकरी के इंटरव्यू को लेकर। हमने छोटी-सी बात से झगड़ा शुरू किया, और देखते-ही-देखते वह एक ज़बरदस्त लड़ाई में बदल गई। “तुम्हारी वजह से मेरी नींद हराम हो गई है!” वह चिल्लाई। “तू ही है जो रात भर फोन पर बात करती रहती है!” मैंने जवाब दिया। हम किचन में खड़े थे, बीच में सिर्फ़ मरबल का काउंटर। उसकी आँखों में आग थी, गुस्से से चमक रही थीं। उसके गाल लाल थे, और साँसें तेज़। मेरे भीतर कुछ उबल रहा था—न सिर्फ़ गुस्सा, बल्कि वो सब कुछ जो महीनों से दबा हुआ था।
और फिर वो पल आया। एक और अपशब्द कहने के बाद, मेरे भीतर का तूफ़ान फूट पड़ा। मैंने आगे बढ़कर उसे जोर से काउंटर के किनारे धकेल दिया। उसका शरीर पत्थर से टकराया, एक दमदार ठोकर की आवाज़ आई। वह एक पल को चौंकी, उसकी साँस रुक गई। हमारी नज़रें मिलीं, और फिर कुछ ऐसा हुआ जिसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती थी। उस गुस्से, उस तनाव, उस बेचैनी के बीच, मेरे होंठ उसके होंठों से जा टकराए। यह कोमल चुंबन नहीं था, यह एक जानवराना, क्रूर, दर्द से भरा भरा चुंबन था। हमारे दाँत टकराए, होंठ दब गए, मगर हम पीछे नहीं हटे। उसने मेरे बालों में हाथ फँसाए और मुझे और करीब खींच लिया। उसकी जीभ मेरे मुंह में घुस गई, और मेरी उसके। स्वाद, गर्मी, और एक उन्माद जो सिर से पैर तक बिजली की तरह दौड़ गया।
मैंने उसकी ड्रेस के हेम को पकड़ा और ऊपर खींच दिया। उसकी जांघें दिखीं, चिकनी और ताकतवर। मेरे हाथ उसकी कमर तक पहुँचे, और मैंने उसकी पैंटी को एक झटके में फाड़कर अलग कर दिया। वह एक तीखी साँस भरकर रुकी, उसकी आँखें चौंधिया गईं। मैंने उसे काउंटर के किनारे और दबोचा, और अपने शरीर को उसके शरीर से रगड़ा। मेरी पैंट के अंदर, मैं पहले से ही कठोर और तनाव से भरा हुआ था। मैंने उसके कान में फुसफुसाया, “आज तू मेरी है,” और वह काँप उठी, उसकी आँखों में एक बेकाबू, वासनापूर्ण आग जल उठी।
उसने जवाब दिया। उसके हाथ मेरी बेल्ट तक पहुँचे, उसने बकल खोली और मेरी पैंट के बटन खोल दिए। उसने मुझे बाहर निकाला, और उसका स्पर्श—ठंडा और फिर तेज़ी से गर्म होता हुआ—मुझे एक झटका दे गया। उसने मुझे दृढ़ता से थामा, और फिर अपने अंगूठे से सिरे पर जमा हुआ तरल फैला दिया। यह इशारा इतना अंतरंग, इतना दमदार था कि मैं कराह उठा। “प्रिया,” मैंने उसके नाम की गुहार लगाई, मगर शब्द मेरे गले में फंस गए।
फिर मैंने उसे उठाया और काउंटर पर बैठा दिया। उसकी पीठ मार्बल से टिक गई। मैं घुटनों के बल नीचे झुका और अपना चेहरा उसकी जांघों के बीच ले गया। मैंने कोमलता से नहीं, बल्कि एक जुनूनी, भूखे जानवर की तरह उसे चाटना शुरू किया। उसकी तीखी, नम गंध ने मेरे दिमाग को झकझोर दिया। उसने चीख मारी, “अलोक!” उसके हाथ मेरे बालों में कसकर फंस गए, मुझे और करीब खींचते हुए। मैंने एक उंगली, फिर दो, उसमें घुसा दीं, उसकी गर्मी और तंगी में खो जाते हुए। मेरी जीभ उसके सबसे संवेदनशील हिस्से पर नाच रही थी, और उसके शरीर में एक लयबद्ध कंपन शुरू हो गया। वह मेरे सिर को दबोचे हुए थी, उसकी साँसें तेज और टूटी हुई थीं, उसकी कराहने की आवाजें किचन की हवा में घुल रही थीं।
फिर, उसके शरीर में एक तेज झटका दौड़ा। वह चिल्लाई, एक तीखी, अनियंत्रित चीख जो सीधे मेरी रीढ़ में उतर गई। उसकी जांघें मेरे सिर को जकड़ लीं, और वह कई सेकंडों तक काँपती रही, उसकी आहें भरती रहीं। मैंने ऊपर देखा। उसका चेहरा रिलीज की एक अलौकिक शांति से धुल गया था, उसकी आँखें बंद थीं, होंठ हल्के से खुले हुए।
मैं खड़ा हुआ। मैंने उसकी जांघों को फैलाया और अपने आप को उसके प्रवेश द्वार पर रखा। एक पल की रुकावट, और फिर मैंने पूरी ताकत से अंदर धकेल दिया। वह एक और चीख के साथ ऊपर उठी, उसकी आँखें खुल गईं, और उनमें एक चुनौती और आत्मसमर्पण का अजीब मेल दिखाई दिया। उसने अपने पैर मेरी कमर के चारों ओर लपेट लिए। मैंने गति पकड़ी—तेज, अनियंत्रित, हताश। काउंटर हमारे वजन और जोर के नीचे हिलने लगा, बर्तनों के झनझनाने की आवाजें आने लगीं। हमारे शरीर एक दूसरे से टकरा रहे थे, पसीने और गर्मी से चिपके हुए। उसकी कराहें मेरे कानों में गूंज रही थीं, “हाँ… हाँ… और जोर से।” हर धक्के के साथ, महीनों का दबाव, इच्छा और तनाव बाहर निकल रहा था।
उसकी निगाहें मेरी आँखों में जकड़ी हुई थीं। फिर, उसके चेहरे पर फिर से वही अभिव्यक्ति आई। एक गहरी, गर्दन तक उतरती हुई कराह, उसके शरीर में एक और ऐंठन, और वह फिर से चरमोत्कर्ष पर पहुँच गई। इस बार यह धीमा, लंबा और अधिक तीव्र था। उसके नाखून मेरी पीठ में घुस गए। यह देखकर, मेरा अपना नियंत्रण टूट गया। मैंने उसे काउंटर के किनारे से खींचा, अपने अंदर और गहरा धकेला, और तब, आखिरी क्षण में, बाहर खींच लिया। गर्म धाराएँ उसके पेट और जांघों पर फैल गईं, एक चिपचिपी, गर्म निशानी छोड़ती हुईं।
हम वहीं खड़े रहे, हाँफते हुए, हमारे शरीर अब भी एक-दूसरे से चिपके हुए। किचन की रोशनी हमारे पसीने से तर बदन पर पड़ रही थी। आसपास का वातावरण धीरे-धीरे सामान्य हो रहा था। फ्रिज की हल्की गुनगुनाहट फिर से सुनाई देने लगी। बाहर गली में किसी कुत्ते के भौंकने की आवाज आई। प्रिया ने अपनी आँखें खोलीं। उनमें अब गुस्सा नहीं था, न ही वह चुनौती भरी चमक। बस एक गहरी, थकी हुई शांति थी। उसने धीरे से अपना हाथ बढ़ाया और मेरे गाल को छुआ, उसकी उंगलियाँ हल्की और कंपकंपाती हुई।
“ये…” उसकी आवाज़ भारी और भरी हुई थी, “…बहुत ज़्यादा था।”
मैंने कोई जवाब नहीं दिया। बस अपना माथा उसके माथे से टिका लिया। हमारी साँसें धीरे-धीरे एक साथ मिलने लगीं। उसने देखा कि उसके पेट पर मेरा तरल बिखरा हुआ है। वह शर्मिंदा नहीं हुई। उसने अपनी उंगली भिगोई, देखा, और फिर मेरी तरफ देखा। उसकी आँखों में एक नया प्रश्न था, एक नई शुरुआत का संकेत। मैंने उसे काउंटर से उतारा। वह लड़खड़ाई, और मैंने उसे थाम लिया। हम बिना कुछ कहे, अपने कपड़े सुधारते हुए, उसी टूटे-फूटे किचन में खड़े रहे, जहाँ अभी कुछ देर पहले सिर्फ गुस्सा और चीखें थीं। अब एक खामोशी थी, मगर वह पहले जैसी असहज खामोशी नहीं थी। यह एक समझौते की खामोशी थी। एक ऐसी रात की शुरुआत की खामोशी, जिसके बारे में शहर को कभी पता नहीं चलेगा। गया सो गया था, लेकिन हमारे अंदर की आग अभी बुझी नहीं थी। बस थोड़ी शांत हुई थी, एक गहरे, संतुष्ट अंगारे की तरह।
