मेरा नाम विक्रम है और मैं नोएडा में रहता हूँ। मेरी ज़िंदगी एक ट्रैक पर दौड़ती थी – सुबह ऑफिस, शाम को घर, बीच में एक लंबा और थका देने वाला कम्यूट। यूपी के इस शहर की धूल-भरी हवा और भागमभाग भरी ज़िंदगी में मेरा एकमात्र स्टेशन था सेक्टर ५१ का मेट्रो स्टेशन, और उस पर चलने वाली एक्वा लाइन। मैं हर रोज़ सुबह आठ बजे की ट्रेन पकड़ता, एक ही कोच के दरवाज़े के पास खड़ा होता, और शाम को साढ़े सात बजे वापसी की भीड़ में खुद को धकेलता हुआ घर लौट आता। ये एक ऐसा सिलसिला था जिसमें कोई रंग नहीं था, बस एक धूसरता थी। फिर वो आई।
एक सुबह, जब ट्रेन आई और मैंने हमेशा की तरह दरवाज़े के पास जगह बनाने की कोशिश की, तो मैंने पहली बार उसे देखा। वो मेरे ठीक सामने खड़ी थी, एक नीले रंग की फॉर्मल शर्ट और क्रीम कलर की पेंसिल स्कर्ट पहने हुए। उसके लंबे, सिल्की बाल एक स्लिक पोनीटेल में बंधे हुए थे जो उसकी गर्दन को छू रहे थे। उसका चेहरा… शब्दों में बयां करना मुश्किल है। गोल-मटोल, थोड़ा बचकाना सा, लेकिन आँखों में एक तेज़ रोशनी थी। वो अपने फोन में कुछ देख रही थी, और उसकी भौंहें कभी-कभी एकाग्रता से सिकुड़ जाती थीं। उस दिन तो बस इतना ही हुआ। ट्रेन भरी थी, हम दोनों के बीच महज़ दो फीट की दूरी थी, लेकिन हमारी नज़रें कहीं और थीं।
लेकिन फिर ये एक आदत बन गई। हर रोज़ वो वहीं खड़ी मिलती। कभी अलग सूट, कभी सलवार सूट, लेकिन हमेशा परफेक्टली ग्रूम्ड। धीरे-धीरे, एक अनकहा नियम बन गया। वो दरवाज़े के बाईं तरफ खड़ी होती, मैं दाईं तरफ। कभी-कभार जब ट्रेन झटका देती, तो हमारे शरीर एक-दूसरे से टकरा जाते। एक बार तो मेरा हाथ उसकी कोहनी से लग गया और मैंने फौरन “सॉरी” बोल दिया। उसने मुस्कुराते हुए सिर हिलाया, “कोई बात नहीं।” उसकी आवाज़ मधुर थी, थोड़ी गहरी। उस दिन से, कभी-कभी हमारी नज़रें मिल जातीं, और एक हल्की सी, शर्मीली सी मुस्कान का आदान-प्रदान होता।
एक महीना बीत गया इसी तरह। मैंने उसका नाम तब जाना जब एक दिन मेट्रो में उसकी एक सहेली मिली और उसे “कृति” कहकर बुलाया। कृति। नाम उस पर सूट करता था। वो एक क्रिएटिव एजेंसी में काम करती थी, ये भी मैंने उसी दिन उसकी सहेली से बातचीत में सुना। मैं खुद एक सॉफ्टवेयर फर्म में प्रोजेक्ट मैनेजर हूँ। हमारे ऑफिस सेक्टर १२५ में थे, जहाँ एक्वा लाइन की अंतिम स्टॉप है। एक दिन, ट्रेन में देरी थी। लोग बेचैन हो रहे थे। मैं और कृति हमेशा की तरह अपनी-अपनी जगह पर खड़े थे। अचानक उसने मेरी तरफ देखा और पूछा, “आपका भी सेक्टर १२५ में ऑफिस है ना? मैंने आपको वहाँ उतरते देखा है।”
मैं हैरान रह गया। उसने मुझे नोटिस किया था। “हाँ,” मैंने कहा, “मैं विक्रम हूँ।” इस तरह हमारी पहली बातचीत शुरू हुई। बातें सतही थीं – ट्रैफिक, नोएडा का मौसम, सेक्टर १२५ में लंच के लिए अच्छी जगहें। लेकिन हर बातचीत के साथ उसकी एक और परत खुलती जाती। वो बेहद तेज़-तर्रार थी, बात करते वक्त उसकी आँखें चमकती थीं। वो सिनेमा पसंद करती थी, खासकर वो ओल्ड हिंदी फिल्में जिनमें गाने होते थे। उसे सड़क किनारे की चाय पसंद थी, लेकिन ऑफिस में वो लट्टे पीती थी। वो मज़ाकिया थी, और उसमें एक शैतानी सी चुस्ती थी जो उसके प्रोफेशनल अवतार के नीचे छुपी रहती थी।
धीरे-धीरे, मेट्रो की सवारी मेरे दिन का सबसे बेहतरीन वक्त बन गया। उन बीस मिनटों में हम क्या-क्या नहीं करते थे। कभी ऑफिस के गप्पे, कभी किसी नई वेब सीरीज पर बहस, कभी बचपन के किस्से। एक बार जब मैंने किसी प्रोजेक्ट में बहुत स्ट्रेस लिया हुआ था, तो उसने मेरे चेहरे को देखकर पूछा, “क्या हुआ? लगता है बॉस ने आज सारा गुस्सा आप पर निकाल दिया।” मैंने सब कुछ बता दिया, और उसने ऐसी समझदारी से सलाह दी कि मैं दंग रह गया। उसकी बुद्धिमत्ता मुझे आकर्षित करती थी। वो सिर्फ खूबसूरत नहीं थी, वो तेज़ थी।
और फिर शरीर… ध्यान न देना असंभव था। जब वो हँसती, तो उसके गालों पर डिम्पल पड़ते। जब वो किसी बात पर गंभीर होती, तो अपने होठों को दबा लेती, जो गुलाबी और नर्म थे। उसकी कमीज़ के बटन खुले होते तो मैं उसकी गर्दन की नाजुक लकीरों को देखता, और फौरन नज़रें हटा लेता। कभी ट्रेन के झटके में उसका हाथ मेरे हाथ से छू जाता, और एक सिहरन सी दौड़ जाती। उसकी खुशबू… हल्की सी, वुडी सी, शायद उसके शैम्पू या परफ्यूम की। वो मेरे दिमाग में घर कर गई थी। मैं रोज़ सुबह उसी के बारे में सोचकर उठता, और शाम को उससे मिलने का इंतज़ार करता। लेकिन मैं कुछ कह नहीं पाता था। डर था कि कहीं ये सब बर्बाद न हो जाए। क्या पता वो सिर्फ एक अच्छी सहयात्री थी, और कुछ नहीं।
फिर वो दिन आया जिसने सब कुछ बदल दिया। हमारी एजेंसी और उनकी कंपनी एक ही क्लाइंट के लिए काम कर रही थीं, और एक बड़े प्रोजेक्ट पर हमारा सीधा टकराव था। मीटिंग्स में हम एक-दूसरे के आइडियाज को खारिज करते, डेटा के आंकड़ों पर बहस करते। ऑफिस के बाहर हम दोस्त थे, लेकिन ऑफिस के अंदर हम प्रतिद्वंद्वी। एक दिन, डेडलाइन से एक रात पहले, हम दोनों को लेट नाइट काम करना पड़ा। उसका ऑफिस हमारी बिल्डिंग से सटा हुआ था। रात के दस बजे थे जब मैंने उसे व्हाट्सएप पर मैसेज किया: “तुम्हारा प्रेजेंटेशन तैयार है? हमारे यहाँ तो कैंटीन बंद हो गई है, चाय की तलब है।”
दो मिनट बाद उसका रिप्लाई आया: “मेरा भी हाल यही है। मेरे ऑफिस में एक इलेक्ट्रिक केटल है। आ जाओ, चाय बनाते हैं।”
मैं दिल धड़कता हुआ उसकी ओफिस की ओर चल पड़ा। उसका ऑफिस एक क्रिएटिव स्पेस था – रंगीन दीवारें, बिखरे हुए स्केच, एक बड़ी सी व्हाइटबोर्ड जिस पर आइडियाज लिखे हुए थे। वो अपनी डेस्क पर बैठी थी, लैपटॉप की स्क्रीन की रोशनी में उसका चेहरा नहाया हुआ था। उसने अपनी पोनीटेल खोल दी थी, और बाल उसके कंधों पर बिखरे हुए थे। उसने अपनी फॉर्मल शर्ट के ऊपर एक लूज, मुलायम स्वेटर पहन रखा था।
“बहुत ठंड लग रही थी,” उसने कहा, “एयर कंडीशनर बंद कर दिया है।”
मैंने एक कुर्सी खींची और बैठ गया। उसने चाय बनाई – तेज़, मसालेदार अदरक वाली चाय। हमने काम की बात की, लेकिन जल्दी ही बातचीत का रुख बदल गया। हमने उस प्रतिस्पर्धा के बारे में बात की जो हमारे बीच थी।
“तुम्हारा आइडिया वाकई बहुत बढ़िया था,” उसने कहा, “मैं उसे रद्द करने पर थोड़ा अफसोस महसूस कर रही थी।”
“लेकिन तुम्हारा कॉन्सेप्ट ज्यादा क्लीन था,” मैंने कहा, “मैंने उसे देखकर ईर्ष्या महसूस की।”
वो हँसी, “सच में? तुमने कभी दिखाया ही नहीं।”
“तुम भी तो नहीं दिखाती थीं,” मैंने कहा, “हम दोनों ही अपनी-अपनी ईगो छुपाए हुए थे।”
एक पल की चुप्पी छा गई। हवा में एक तनाव था, लेकिन वो अच्छा था। मैंने उसकी आँखों में देखा, और वो मेरी आँखों में देख रही थी। वो लंबे समय तक चली, वो नज़रें। मैंने देखा कि उसके होठों के कोने एक मुस्कान के लिए उठे, फिर गिरे। उसकी साँसों की गति थोड़ी तेज़ थी।
“विक्रम…” उसने कहा, उसकी आवाज़ एक फुसफुसाहट थी।
“हाँ?”
“क्या तुम कभी… क्या तुमने कभी सोचा है कि अगर हम इस प्रोजेक्ट पर साथ काम करते, तो कितना अच्छा होता?”
“हर दिन,” मैंने सच कहा, “हर दिन सोचता हूँ।”
उस पल, सब कुछ बदल गया। वो दीवार जो हमने खड़ी कर रखी थी, वो टूट गई। मैंने देखा कि उसकी नज़रें मेरे होंठों पर टिकी हुई हैं। मैं उठा, और धीरे-धीरे उसकी तरफ बढ़ा। वो भी उठी। हमारे बीच की दूरी महज़ एक फुट रह गई थी। मैंने उसके चेहरे पर एक बेचैनी देखी, एक उम्मीद, एक डर। मैंने अपना हाथ उठाया और उसके गाल को छुआ। उसकी त्वचा गर्म और मुलायम थी। उसने अपनी आँखें बंद कर लीं, और एक हल्की सी कराह निकली।
फिर मैंने झुककर उसके होंठों को अपने होंठों से छुआ। पहला चुंबन कोमल था, एक पूछताछ की तरह। लेकिन जब उसने जवाब दिया, तो सब कुछ भड़क उठा। उसने अपनी बाहें मेरी गर्दन के चारों ओर डाल दीं, और मेरे मुँह को अपने मुँह से दबा दिया। यह कोमल नहीं था, यह भूखा, जरूरी, तीव्र था। सालों की इच्छा उस एक चुंबन में उड़ेल दी गई थी। हमारी साँसें फूलने लगीं, और हमारे शरीर एक-दूसरे से दबने लगे।
मैंने उसे धीरे से डेस्क की तरफ धकेला। उसकी पीठ लकड़ी से टकराई, और उसने एक छोटी सी आह भरी। मैंने अपने हाथ उसकी कमर पर रखे, और उसकी पेंसिल स्कर्ट का ज़िप खोल दिया। कपड़ा उसके कूल्हों से फिसला और उसके पैरों के पास जमीन पर गिर गया। वो सिर्फ अपनी अंडरवियर में खड़ी थी, और मैंने देखा कि कपड़ा पहले से ही गीला हो चुका था। मैंने अपनी उंगलियों को उसके अंदरूनी हिस्से पर रखा और उसे हल्के से दबाया। उसने अपना सिर पीछे की ओर झुका लिया और एक लंबी, गहरी कराह निकाली।
“विक्रम…” उसने फुसफुसाया।
मैंने उसे जवाब नहीं दिया, बल्कि अपने घुटनों के बल बैठ गया और अपने मुँह को उसकी जाँघों के बीच लगा दिया। मैंने अपनी जीभ से उसके अंदरूनी हिस्से को, कपड़े के ऊपर से ही, महसूस किया। वो नम, गर्म था। उसने अपने हाथ मेरे बालों में भींच लिए।
फिर मैंने उठकर उसे डेस्क पर बैठा दिया। वो अपने हाथों को पीछे टिकाकर बैठ गई, उसकी टाँगें खुली हुई थीं। मैंने उसकी अंडरवियर को एक तरफ खिसकाया और अपनी उंगलियों को उसके अंदर डाल दिया। वो गर्म और तंग थी, और पहले से ही गीली। उसने एक तीखी सांस भरी। मैंने अपना मुँह उसके क्लिटोरिस पर लगाया और जीभ से उसे उत्तेजित करना शुरू किया, जबकि मेरी दो उंगलियाँ उसके अंदर धीमी गति से आगे-पीछे होने लगीं। उसकी कराहें तेज़ हो गईं, और उसने अपनी एड़ियों को मेरी पीठ पर दबाना शुरू कर दिया।
“रुको… रुको…” उसने हांफते हुए कहा।
मैंने रुककर उसे देखा। उसका चेहरा लालिमा लिए हुए था, और उसकी आँखें एक गहरे भूरे रंग में तैर रही थीं। वो उठी और अपने हाथों से मेरे बेल्ट को खोलने लगी। उसकी उंगलियाँ कांप रही थीं। उसने मेरी पैंट और अंडरवियर को नीचे खिसका दिया, और मेरे उत्तेजित लिंग को अपने हाथ में ले लिया। उसने एक दबाव के साथ उसे मसलना शुरू किया, और मैं कराह उठा। उसकी पकड़ मजबूत थी, एकदम सही।
फिर उसने मुझे पीछे धकेला और मुझे ऑफिस के छोटे से सोफे पर बैठा दिया। वो मेरे ऊपर आई, अपने घुटनों को मेरे कूल्हों के दोनों ओर टिकाते हुए। उसने अपने हाथों से मेरे कंधों को पकड़ा, और धीरे-धीरे अपने शरीर को नीचे किया, मेरे लिंग को अपने अंदर लेते हुए। एक लंबी, दर्द भरी कराह उसके होठों से निकली क्योंकि वो पूरी तरह से अंदर समा गई। वो ठहरी, सांस रोके हुए, आँखें बंद किए हुए। फिर उसने धीमी गति से हिलना शुरू किया।
उसकी सवारी मेरे जीवन का सबसे रोमांचक अनुभव थी। वो अपने शरीर के हर हिलने को नियंत्रित कर रही थी, कभी गहराई से, कभी हल्के से, कभी तेज़, कभी धीमे। उसकी आँखें मेरी आँखों में जकड़ी हुई थीं, और उसके चेहरे पर एक ऐसा भाव था जो आनंद और शक्ति का मिश्रण था। मैंने अपने हाथ उसकी कमर पर रखे, उसे मार्गदर्शन देने की कोशिश की, लेकिन वो पूरी तरह से नियंत्रण में थी। उसकी साँसें फूलने लगीं, और उसकी गति अनियमित हो गई। मैंने महसूस किया कि उसका शरीर अकड़ रहा है, और फिर एक झटके के साथ वो चीखी। उसने अपना सिर पीछे फेंका, और उसका पूरा शरीर काँपने लगा। मैंने उसे अपनी बाहों में कसकर पकड़ लिया, जबकि वो अपने ओर्गैज़्म से गुज़र रही थी।
जब उसकी कंपकंपी रुकी, तो वो मेरे ऊपर झुक गई, उसकी साँसें अभी भी तेज़ थीं। “मैं तुम्हारे साथ और भी चाहती हूँ,” उसने फुसफुसाया।
मैंने उसे उठाया और सोफे पर लिटा दिया। सोफा छोटा था, इसलिए हम एक दूसरे के साथ चिपके हुए थे। मैंने उसे पीछे से पकड़ा, और अपने लिंग को फिर से उसकी योनि में प्रवेश कराया। यह कोण अलग था – गहरा, अधिक अंतरंग। मैंने धीमी, गहरी थ्रस्ट्स देनी शुरू की। उसने अपना हाथ पीछे ले जाकर मेरे अंडकोष को पकड़ लिया, और उन्हें नर्मी से मसलने लगी। यह सनसनी अविश्वसनीय थी। उसकी योनि मेरे लिंग के चारों ओर सिकुड़ रही थी, और मैंने महसूस किया कि वो फिर से चरमोत्कर्ष की ओर बढ़ रही है।
“विक्रम… हाँ… ऐसे ही…” उसकी आवाज़ भारी थी, गुर्राहट भरी।
उसकी कराहें तेज़ हो गईं, और उसका शरीर फिर से अकड़ गया। इस बार उसका ओर्गैज़्म और भी तीव्र लग रहा था। उसकी मांसपेशियों में ऐंठन आ गई, और वो एक लंबी, गुर्राती हुई चीख के साथ चरम पर पहुँची। उसके शरीर के सिकुड़ने ने मुझे भी बढ़ावा दिया। मैंने अपनी गति तेज़ कर दी, हर थ्रस्ट के साथ गहराई तक जाते हुए। मेरे अंदर गर्मी का एक विस्फोट हुआ, और मैं उसमें अपना वीर्य उड़ेल दिया, तेज़, तीखे झटकों के साथ। मैं कराह उठा, और उसने अपने हाथों से मेरी जाँघ को भींच लिया।
हम वैसे ही पड़े रहे, साँसें लेते हुए, पसीने से लथपथ। उसकी पीठ मेरे सीने से चिपकी हुई थी, और मैं उसके बालों से अपना माथा सहलाता रहा। सोफा हमारे लिए बहुत छोटा था, लेकिन उस पल हमें कोई फर्क नहीं पड़ता था। कमरे में सिर्फ हमारी साँसों की आवाज़ थी, और बाहर से आती हुई नोएडा की रात की हल्की सी गड़गड़ाहट।
“ये…” उसने आखिरकार कहा, उसकी आवाज़ थकी हुई और संतुष्ट, “ये उम्मीद से कहीं ज्यादा था।”
मैं हँसा, “तुम्हारा मतलब है, हमारी प्रतिस्पर्धा?”
“हाँ,” उसने कहा, और मुड़कर मुझे चूमा, “ये जीत तुम्हारी थी।”
“नहीं,” मैंने कहा, उसे अपनी बाहों में कसकर पकड़ते हुए, “ये ड्रॉ था।”
हम कुछ देर और वैसे ही पड़े रहे, फिर उठे। हमने अपने कपड़े पहने, लेकिन अब वो कपड़े हमारे बीच की दीवार नहीं थे। हमने चाय के लिए फिर से केटल चलाया, और इस बार हम सोफे पर एक-दूसके से सटकर बैठे। कोई शर्म नहीं थी, कोई झिझक नहीं थी। बस एक आराम, एक परिचितता, जो पुराने दोस्तों जैसी थी, लेकिन उसमें एक नया, रोमांचक आयाम जुड़ गया था।
जब हम ऑफिस से निकले तो आधी रात हो चुकी थी। मैंने उसे उसके फ्लैट तक छोड़ा, जो मेरे फ्लैट से सिर्फ दो ब्लॉक दूर था। उसके दरवाज़े पर, उसने मुझे फिर से चूमा, एक कोमल, लंबा चुंबन।
“कल सुबह मेट्रो में मिलेंगे?” उसने पूछा।
“हाँ,” मैंने कहा, “हमेशा की तरह।”
लेकिन हम दोनों जानते थे कि कुछ बदल गया था। अगली सुबह जब मैं मेट्रो स्टेशन पहुँचा, तो वो पहले से ही वहाँ खड़ी थी। उसने मुस्कुराते हुए मेरा हाथ पकड़ लिया, और हम दरवाज़े के पास, एक साथ खड़े हो गए। लोगों को कोई फर्क नहीं पड़ा। लेकिन हमारे लिए, सब कुछ बदल चुका था। हमारे हाथों का ये मिलना सिर्फ एक शुरुआत थी, एक लंबी, खूबसूरत यात्रा की, जो उस रात एक ऑफिस की चुप्पी में शुरू हुई थी।
