मेरी शादी के बाद पहला साल बिल्कुल वैसा नहीं था जैसा मैंने कल्पना की थी। बोपाल की गर्मी में, हमारा छोटा सा फ्लैट, जो सीहोर रोड पर था, अक्सर एक अजीब सी खामोशी से भर जाता था। अरविंद, मेरे पति, एक सॉफ्टवेयर इंजीनियर थे, जिनकी दुनिया लैपटॉप के स्क्रीन और डेडलाइन्स तक सीमित लगती थी। मैं, प्रिया, जो हमेशा से बातूनी और भावुक रही हूँ, खुद को एक ऐसे व्यक्ति के साथ बंद पाती थी जिसकी भावनाएँ एक एन्क्रिप्टेड कोड की तरह लगती थीं।
पहले कुछ महीने तो बस रस्मी थे। सुबह की चाय साथ पीते हुए भी एक अदृश्य दीवार होती थी। वो मेरे लिए नाश्ता रख देते, एक साधारण “ले लो” कहते, और उनकी नज़रें मेरे चेहरे से टकराकर तुरंत कहीं और चली जातीं। मैंने नए-नए साड़ियाँ सीखी थीं, हल्के-हल्के मेकअप के साथ खुद को सजाती, उम्मीद करती कि शायद उनकी नज़र मुझ पर ठहरेगी। पर वो तो बस एक सरसरी निगाह डालते और कहते, “अच्छी लग रही हो।” वो “अच्छी” इतनी सपाट और निर्जीव होती थी कि मेरा दिल सिकुड़ जाता।
मेरी असली पहचान, मेरी हंसी, मेरी सनक, मेरी वो बातें जो मुझे ‘मैं’ बनाती थीं, वो सब इस “अच्छी पत्नी” के खोल में दबती जा रही थीं। रातें सबसे ज़्यादा अजीब होतीं। हम एक ही बिस्तर पर सोते, बीच में इतनी जगह कि एक और शख्स आ सकता था। उनकी पीठ हमेशा मेरी तरफ होती। मैं उनकी साँसों की आवाज़ सुनती रहती, उनके कंधे की रेखा देखती रहती, और खुद से सवाल करती कि क्या प्यार ऐसा ही होता है? क्या यही वो इंटिमेसी है जिसके बारे में सब बातें करते हैं?
धीरे-धीरे, बहुत धीरे-धीरे, बदलाव आना शुरू हुआ। एक रविवार की सुबह, मैं पुराने गाने लगाकर रसोई में पराठे बना रही थी। मेरा पसंदीदा गाना बज रहा था, “लग जा गले।” बिना सोचे, मैंने गुनगुनाना शुरू कर दिया और थोड़ा-सा झूम भी लिया। पीछे से आवाज़ आई, “तुम्हारी आवाज़ बहुत सुरीली है।” मैं चौंककर मुड़ी। अरविंद दरवाज़े पर खड़े थे, एक हल्की सी मुस्कान उनके चेहरे पर थी। यह कोई रस्मी तारीफ नहीं थी। उनकी आँखों में एक सच्ची दिलचस्पी थी। उस दिन, पहली बार, हमने बिस्तर पर पीठ करके नहीं, आमने-सामने बैठकर नाश्ता किया। उन्होंने पूछा कि मुझे गाने का शौक कैसे हुआ, मेरे कॉलेज (बरकतउल्लाह यूनिवर्सिसिटी) के दिनों के बारे में, मेरे दोस्तों के बारे में।
यह एक सूक्ष्म शुरुआत थी। उन्होंने सीखना शुरू किया। उन्हें पता चला कि मुझे चाय में अदरक बहुत पसंद है, बस इतना ही नहीं, बल्कि वो खुद इसे कूटकर डालने लगे। उन्हें पता चला कि जब मैं थकी होती हूँ तो मेरे पैर दुखते हैं, और एक शाम, बिना कुछ कहे, उन्होंने एक बाल्टी गर्म पानी लाकर रख दी और कहा, “डाल लो, आराम मिलेगा।” ये छोटी-छोटी चीज़ें थीं, पर इनमें एक स्नेह था जो उनके शब्दों से कहीं ज़्यादा गहरा था।
इंटिमेसी के बारे में बातचीत शुरू होने में समय लगा। वो हमेशा से एक टैबू था। एक रात, जब हवा में बारिश की सी गंध थी, मैंने हिम्मत जुटाई। लाइट बंद थी, अंधेरे ने हौसला दिया। मैंने फुसफुसाते हुए कहा, “अरविंद… क्या तुम्हें लगता है… हम… हम एक दूसरे के और करीब आ सकते हैं?” सन्नाटा इतना गहरा था कि मैं अपनी धड़कनें सुन सकती थी। फिर उनका हाथ मेरे हाथ को ढूंढ़ता हुआ आया, उसे अपनी हथेली में लिया। “मैं चाहता हूँ,” उनकी आवाज़ भारी थी, “लेकिन मुझे डर लगता है कि तुम्हें असहज कर दूंगा। मैं… मैं अनुभवहीन हूँ।” उस पल की कमज़ोरी ने सारी दूरियाँ मिटा दीं। हमने बात की, डर के बारे में, उम्मीदों के बारे में, धीरे-धीरे करने के बारे में।
फिर वो तनावपूर्ण दौर आया। अरविंद की कंपनी में एक बड़ा प्रोजेक्ट आया, और वो रात-दिन काम में डूब गए। वो देर रात तक ऑफिस (इन्फोसिस, इंदौर) में रहते, और घर आकर भी उनका दिमाग लैपटॉप में ही चिपका रहता। वो पुराने अरविंद में वापस लौटने लगे थे, दूर, थके हुए, चिड़चिड़े। मैं खुद को फिर से अदृश्य पाने लगी। एक दिन, उन्होंने मेरा बनाया हुआ खाना, जिस पर मैंने खास मेहनत की थी, बस चखकर छोड़ दिया, कहा, “आज भूख नहीं है।” वो शब्द चाकू की तरह चुभे।
मैंने तय किया कि इस दूरी को बढ़ने नहीं दूंगी। अगले दिन शाम को, मैंने उनके ऑफिस जाने से पहले ही तैयारी शुरू कर दी। मैंने वो हल्के गुलाबी रंग की साड़ी पहनी जो उन्हें पसंद थी, पर उसे पहनने का अंदाज़ कुछ अलग था। पल्लू को थोड़ा लापरवाही से, एक कंधे से सरकते हुए छोड़ दिया। मैंने हल्का सा लिपस्टिक लगाया और अपने लंबे बालों को खुला छोड़ दिया। मैं जानती थी कि मेरी बॉडी, मेरे कर्व्स, मेरी त्वचा का रंग उस गुलाबी कपड़े में निखरकर सामने आएंगे। यह एक जानबूझकर किया गया इशारा था, एक चुनौती थी।
जब वो घर आए, तो मैं सोफे पर बैठी एक किताब पढ़ रही थी, पर मेरा ध्यान पूरी तरह से दरवाज़े पर था। उन्होंने अंदर कदम रखा, ब्रीफकेस रखा, और जैसे ही उनकी नज़र मुझ पर पड़ी, वो रुक गए। उनकी आँखों में वो थकान गायब हो गई, उसकी जगह एक तीखी, गहरी चमक ने ले ली। वो मेरी तरफ बढ़े, धीरे-धीरे। उन्होंने कुछ नहीं कहा। बस मेरे सामने खड़े हो गए। हवा में तनाव घुलने लगा। मैंने किताब नीचे रखी और उनकी आँखों में देखा। वो एक लंबी, बिना शब्दों की बातचीत थी। फिर, उन्होंने अपना हाथ बढ़ाया और मेरे गाल पर, मेरे होंठों के पास, उंगलियों से एक हल्का सा स्पर्श किया। “तुम आज बहुत खूबसूरत लग रही हो,” उन्होंने कहा, और उनकी आवाज़ में एक ऐसा गहरापन था जो पहले कभी नहीं था। “मैं तुम्हें मिस करता हूँ, प्रिया।”
उस रात, हमने खाना जल्दी खत्म किया। बातचीत वापस लौट आई थी, पर अब वो हल्की-फुल्की नहीं थी। वो भारी, इशारों भरी थी। वो मेरे पास सोफे पर बैठ गए, और हमारे बीच की दूरी गायब हो गई। उनकी जांघ मेरी जांघ से छू रही थी। मैंने महसूस किया कि मेरी सांसें तेज़ हो रही हैं। उन्होंने मेरे खुले बालों में से एक लट को उंगलियों में लपेटा और धीरे से खींचा। “तुम्हारे बाल… मुझे हमेशा से इन्हें छूने का मन करता था,” उन्होंने फुसफुसाया। उनकी सांसें मेरे कान को छू रही थीं। मैं एक झुरझुरी महसूस कर उठी। मैंने अपना सिर उनके हाथ की तरफ झुका दिया, एक साफ इजाज़त।
वो अब और इंतज़ार नहीं कर सकते थे। उन्होंने मेरा चेहरा अपने हाथों में लिया, लेकिन मेरे होंठों को नहीं चूमा, जैसा कि मैंने सोचा था। बल्कि, उनकी नज़रें मेरे होंठों पर टिकी रहीं, फिर मेरी गर्दन पर उतरीं, मेरे कंधे पर, और साड़ी के नीचे से झांक रहे मेरे स्तनों के उभार तक। “मैं तुम्हें देखना चाहता हूँ,” उन्होंने कहा, उनकी आवाज़ में एक दबी हुई, भरी हुई खुराक थी। “सब कुछ।”
मैंने हाँ में सिर हिलाया। वो उठे और मुझे हाथ पकड़कर बेडरूम तक ले गए। कमरे में सिर्फ एक बेडसाइड लैंप जल रहा था, जिससे नरम, छायादार रोशनी फैल रही थी। वो मेरे सामने खड़े हो गए और धीरे-धीरे, बिना जल्दबाज़ी के, मेरी साड़ी का पल्लू हटाया। फिर, उन्होंने मेरी साड़ी की पिनें खोलनी शुरू कीं। हर पिन खुलने की आवाज़, हर कपड़े के सरकने का एहसास, मेरे लिए एक बिजली का झटका था। जब साड़ी गिरकर मेरे पैरों के पास आ गिरी, तो मैं सिर्फ अपनी ब्लाउज और पेटीकोट में खड़ी थी। उनकी आँखों ने मेरे शरीर का भ्रमण किया, हर कर्व, हर मोड़ को निहारा। “तुम्हारा बदन… यह कमाल का है, प्रिया,” उन्होंने बड़बड़ाया।
फिर उन्होंने आगे बढ़कर मेरी ब्लाउज के बटन खोले। हर बटन खुलने पर उनकी उंगलियाँ मेरे पेट को छू जातीं। जब आखिरी बटन खुला, तो उन्होंने ब्लाउज को मेरे कंधों से उतार दिया। अब मैं सिर्फ अपनी ब्रा और पेटीकोट में थी। उन्होंने अपनी उंगली मेरी ब्रा के कप के ऊपर, मेरे एक स्तन के उभार पर रखी और एक गोलाकार गति में घुमाई। मैंने एक गहरी सांस ली, मेरे निप्पल सख्त होकर कपड़े के अंदर ही उभर आए। “यहाँ?” उन्होंने पूछा, उंगली का दबाव बढ़ाते हुए। मैं कराह उठी, “हाँ… वहीं।”
उन्होंने मेरी ब्रा का हुक खोला और उसे भी उतार दिया। मेरे भरे हुए, गोल स्तन बाहर आ गए, उनके गुलाबी निप्पल अब बिल्कुल सख्त और तन गए थे। अरविंद ने एक लंबी, भूखी नज़र से देखा। फिर उन्होंने झुककर एक निप्पल को अपने मुँह में ले लिया। उन्होंने बस चूसा ही नहीं, उसे अपनी जीभ से घेरा, दांतों से हल्का-सा काटा। एक तेज, मीठा दर्द मेरी रीढ़ तक दौड़ गया। “आह… अरविंद!” मैं चिल्लाई, मेरे हाथ उनके बालों में घुस गए। वो दूसरे स्तन पर गए, उसी तरह चाटना, चूसना, काटना। मेरे पैर कांपने लगे। उन्होंने मुझे बिस्तर पर लिटा दिया और मेरी पेटीकोट उतार दी। अब मैं पूरी तरह नंगी थी, उनकी नज़रों के सामने।
उन्होंने अपनी उंगलियाँ मेरे पेट पर घुमाईं, नाभि के आसपास, फिर नीचे, मेरी जांघों के बीच तक। उन्होंने मेरी चूत के बाहरी होंठों को महसूस किया, जो पहले से ही गीले और सूजे हुए थे। “तुम तो पहले से ही तैयार हो,” उन्होंने कहा, एक खुरदुरी मुस्कान के साथ। उन्होंने एक उंगली अंदर डाली। गर्मी और तंगी ने उन्हें घेर लिया। मैंने अपनी चूत की मांसपेशियों को उनकी उंगली के इर्द-गिर्द सिकोड़ा। “ओह, तुम सचमुच… तंग हो,” उन्होंने हांफते हुए कहा। उन्होंने उंगली चलानी शुरू की, पहले धीरे, फिर तेज। दूसरी उंगली जोड़ दी। मेरे अंदर का एक स्पॉट दबा, जिससे मेरे पूरे बदन में झनझनाहट दौड़ गई। मैं जोर-जोर से कराहने लगी, बिस्तर की चादरें अपने मुट्ठियों में भींचती हुई। “हाँ… वहीं… ऐसे ही!”
फिर उन्होंने अपनी उंगलियाँ निकालीं और उन्हें अपने मुँह में डालकर चाटा। “तुम्हारा स्वाद… शहद से भी मीठा है,” उन्होंने गुर्राया। उसके बाद, उन्होंने अपने कपड़े उतारने शुरू किए। उनका शरीर दुबला-पतला, मगर मजबूत था। और फिर, उनका लंड सामने आया। वो बड़ा, सख्त, और नसों से भरा हुआ था, उसकी नोक से एक बूंद टपक रही थी। मैंने बिना सोचे अपना हाथ बढ़ाया और उसे पकड़ लिया। गर्मी और कठोरता ने मुझे चौंका दिया। मैंने उसे ऊपर-नीचे हिलाना शुरू किया। अरविंद की आँखें बंद हो गईं, उन्होंने अपने दांत भींच लिए। “प्रिया… रुक जाओ… नहीं तो मैं…”
लेकिन मैं नहीं रुकी। मैंने झुककर उसकी नोक को अपने मुँह में ले लिया। मैंने उसे चूसा, अपनी जीभ से उसकी नसों को महसूस किया। उनका लंड मेरे मुँह में और गहरा धंस गया। उन्होंने मेरे सिर को पकड़ लिया और धीरे-धीरे, अपनी लय में, आगे-पीछे करना शुरू किया। “तुम्हारा मुँह… ओह भगवान…” वो कराह उठे। मैं उनके वीर्य का स्वाद लेना चाहती थी, लेकिन उन्होंने अचानक मुझे रोक दिया। “नहीं… अभी नहीं। मैं तुम्हारी चूत में चढ़ना चाहता हूँ।”
उन्होंने मुझे बिस्तर पर पीठ के बल लिटा दिया और मेरी टांगें अपने कंधों पर रख लीं। उन्होंने अपने लंड की नोक को मेरी चूत के द्वार पर रखा और धीरे से दबाया। तंगी के कारण वो अंदर नहीं घुस पा रहा था। “आराम करो, प्रिया,” उन्होंने कहा, मेरे चेहरे को देखते हुए। मैंने गहरी सांस ली और अपनी मांसपेशियों को ढीला किया। उसी पल, उन्होंने जोर लगाया।
“आह!” मैं चीखी। एक तेज, चुभता हुआ दर्द था, लेकिन वो जल्द ही एक भरी हुई, गहरी भराव की भावना में बदल गया। उनका पूरा लंड एक ही बार में मेरी चूत के अंदर समा गया था। “तुमने… पूरा ले लिया,” अरविंद हांफते हुए बोले, उनका चेहरा तनाव से भरा हुआ था। वो कुछ पल रुके, मुझे अंदर की भराव का एहसास होने दिया। फिर उन्होंने बाहर निकलना शुरू किया, और फिर अंदर धंसाया। धीमी, गहरी चोट। हर धक्के के साथ, दर्द गायब होता गया और उसकी जगह एक उबालती हुई, आग जैसी इच्छा ने ले ली। मैंने उनकी पीठ पर अपनी एड़ियाँ लगाईं और उन्हें और गहराई तक खींचा। “और… और जोर से!” मैंने गुहार लगाई।
उन्होंने गति तेज कर दी। अब वो मुझे जमकर चोद रहे थे। हर धक्का तेज और गहरा था। मेरी चूत की आवाज़ें गीली, चपचपी हो गई थीं। उनका लंड मेरे अंदर के हर कोने को छू रहा था। मैं जोर-जोर से चिल्ला रही थी, उनका नाम लेते हुए। “अरविंद! हाँ! ऐसे ही! मेरी चूत तोड़ दो!” मेरे शब्द गंदे और बेलगाम थे, पर मुझे कोई शर्म नहीं थी। यह मैं थी, असली प्रिया, जो सिर्फ महसूस कर रही थी। उन्होंने मेरे हाथ बिस्तर के ऊपर पकड़ लिए और और तेजी से चोदना शुरू किया, एक जानवर की तरह। मेरा शरीर एक झटके के साथ कांप उठा। मेरे अंदर एक विस्फोट हुआ, रोशनी की लहरें दौड़ गईं। मेरी चूत उनके लंड के इर्द-गिर्द जोर-जोर से सिकुड़ने लगी।
यह देखकर, अरविंद ने एक आखिरी, गहरा धक्का दिया और जमकर चिल्लाया। मैंने महसूस किया कि उनका गर्म वीर्य मेरी चूत के अंदर फूट रहा है, भर रहा है। वो मुझ पर गिर पड़े, दोनों हांफते हुए, पसीने से तरबतर।
कुछ देर बाद, जब हमारी सांसें सामान्य हुईं, अरविंद ने मेरी तरफ देखा। उनकी आँखों में एक नरमी थी, एक ऐसी नज़दीकी जो शारीरिक से कहीं ज़्यादा गहरी थी। “तुम ठीक हो?” उन्होंने पूछा। मैंने मुस्कुराते हुए हाँ कहा। वो पहली बार था जब हमने वास्तव में एक-दूसरे को जाना था, शरीर और आत्मा, दोनों स्तर पर।
उस रात के बाद, कुछ बदल गया। विश्वास गहरा हुआ। और जैसे-जैसे विश्वास गहरा हुआ, हमारी इंटिमेसी और भी रौद्र, और भी बेलगाम होती गई। अब वो नरम, धीमी शुरुआत नहीं होती। कभी-कभी, जब वो ऑफिस से लौटते हैं, तनाव से भरे हुए, वो सीधे मेरे पास आते हैं, मेरी कमर पकड़कर अपनी तरफ खींचते हैं और कान में गुर्राते हैं, “आज मैं तुम्हें जमकर चोदूंगा।” और मैं उस धमकी से गदगद हो उठती हूँ।
हमारा सेक्स अब और रफ हो गया है। वो मुझे दीवार से लगाकर चोदते हैं, मेरी गर्दन काटते हैं, मेरे हाथ मेरी पीठ के पीछे बांध देते हैं। मैं उनसे गुहार लगाती हूँ, “ज़ोर से चोदो! मेरी चूत फाड़ डालो!” और वो ऐसा ही करते हैं। कभी-कभी मैं उन पर हावी होती हूँ, उन्हें बिस्तर पर लिटाकर, उनका लंड अपनी चूत में लेकर, अपनी मर्जी से ऊपर-नीचे होती हूँ, उन्हें देखती हूँ जब वो मेरे नीचे कराहते हैं। फिर वो पलटकर मुझ पर हावी हो जाते हैं, मेरी टांगें चौड़ी करके, और और गहराई तक घुस जाते हैं।
हमारे पास अब एक भाषा है, एक गंदी, खूबसूरत भाषा। “मेरी रंडी,” वो कहते हैं। “मेरा लौड़ा,” मैं जवाब देती हूँ। यह सिर्फ शारीरिक नहीं रहा। यह एक ऐसा सुरक्षित मैदान है जहाँ हम अपनी सबसे कच्ची, सबसे जंगली इच्छाएं व्यक्त कर सकते हैं, बिना डर के।
आज, एक साल बाद, हमारी शादी वो नहीं है जो शुरुआत में थी। यह एक जीवंत, सांस लेती हुई चीज है। इसमें चुप्पियाँ भी हैं, पर अब वो असहज नहीं, सुकून भरी हैं। इसमें दूरियाँ भी आती हैं, पर अब हम जानते हैं कि उन्हें पाटना कैसे है। और इसमें वो जंगली, गहरी, शारीरिक भाषा भी है जो हर बार हमें याद दिलाती है कि हम सिर्फ साथ रहने वाले दो लोग नहीं हैं, बल्कि दो प्राणी हैं जिन्होंने एक-दूसरे के अंदरूनी तारों को, शरीर और दिल दोनों के, छू लिया है। बोपाल की गर्मी अब उस फ्लैट में नहीं, हमारे बीच की गर्मी में महसूस होती है। और मैं, प्रिया, अब वो अनिश्चित नई दुल्हन नहीं हूँ। मैं एक ऐसी औरत हूँ जो जानती है कि उसका पति उसे कैसे चाहता है, और जो बदले में, उसे पूरी तरह से, बेधड़क चाहती है।
