मैं, संदीप अग्रवाल, आज तीस साल का हूँ और दिल्ली में एक सॉफ्टवेयर कंपनी में काम करता हूँ। लेकिन मेरी कहानी शुरू होती है मेरे गृहनगर धनबाद से, जहाँ की धूल मेरी रगों में अब भी बसी है। यह कहानी है रिया महतो के साथ बिताए एक ऐसे दिन और रात की, जिसकी यादें आज भी मेरे दिमाग में ताज़ा हैं, जैसे कल की ही बात हो।
धनबाद: कोयले की धूल और एक नई शुरुआत
उस साल दिवाली की छुट्टियाँ थीं। घर वाले लगातार शादी के लिए टोक रहे थे। दोस्तों के साथ बैठकर पुराने दिन याद करने का मन था। एक शाम, मेरे स्कूल के दोस्त अभिषेक ने फोन किया। “अरे संदीप, तू आया है और मिला नहीं? कल शाम कोई प्लान है? मेरी कज़िन आ रही है, उसके साथ उसकी एक दोस्त भी है। चलते हैं सरधा लेक के पास वाले नए कैफ़े में। बहुत शांत जगह है।”
मैंने हामी भर दी। कुछ नया करने का मन था। अगले दिन शाम को, मैं अपनी सफ़ेद पोलो शर्ट और डार्क जीन्स पहने, अपनी मारुति स्विफ्ट में सरधा लेक की तरफ निकल पड़ा। कोहरे ने शाम को एक रहस्यमयी रंग दे दिया था। धनबाद की सर्दियों की शामें ही ऐसी होती हैं – थोड़ी ठंडी, थोड़ी रहस्यमयी, और किसी अनजाने इंतज़ार से भरी।
कैफ़े पहुँचा तो अभिषेक पहले से ही एक टेबल पर बैठा था। उसके साथ दो लड़कियाँ थीं। एक, जो उसकी कज़िन प्रिया थी, मैं पहचान गया। और दूसरी… वो थी रिया।
पहली नज़र में ही वो किसी फिल्मी हीरोइन की तरह लग रही थी, पर उसकी खूबसूरती में एक सादगी थी, एक ग्राउंडेडनेस जो धनबाद की लड़कियों में ही मिलती है। उसने सिंपल सी लाइट ब्लू कुर्ती और सफ़ेद चूड़ीदार पहनी हुई थी। उसके लंबे, घने काले बाल खुले हुए थे, जो हवा में थोड़े उड़ रहे थे। चेहरे पर हल्की सी मुस्कान थी, और आँखों में एक चमक, जैसे कोई दिलचस्प किस्सा सुनाने वाली हो।
“ये है मेरी दोस्त, रिया महतो। रिया, ये है मेरा दोस्त संदीप, दिल्ली से आया है सॉफ्टवेयर वाला बाबू,” अभिषेक ने मज़ाकिया अंदाज़ में परिचय कराया।
“हाय,” रिया ने आवाज़ लगाई, उसकी आवाज़ में एक मधुरता थी, जैसे बारिश की फुहार।
“हैलो,” मैंने कहा, थोड़ा नर्वस महसूस करते हुए। हमने बैठकर ऑर्डर दिया। शुरुआती बातचीत सामान्य थी – धनबाद के बारे में, दिल्ली की ज़िंदगी के बारे में। प्रिया और अभिषेक अपने पुराने किस्सों में व्यस्त थे, और धीरे-धीरे, मेरी और रिया की बातचीत एक अलग धारा में बहने लगी।
पता चला कि रिया रांची में एक नर्सिंग कॉलेज में पढ़ती थी और छुट्टियों में घर आई हुई थी। उसकी बात करने का अंदाज़ बहुत नैचुरल था। वो बोलते वक्त हाथों के इशारे करती, कभी मुस्कुराती, कभी गंभीर हो जाती। उसकी आँखें बात करते वक्त सीधी मेरी आँखों में देखतीं, जिससे एक अजीब सी गर्मी मेरे अंदर फैलने लगती।
“तो दिल्ली में सब ठीक है? वहाँ का तो बहुत शोर है न?” उसने पूछा, अपनी चाय की प्याली को दोनों हाथों से पकड़े हुए।
“हाँ, शोर तो है ही। पर यहाँ की शांति और ये कोहरा… ये सब कुछ अलग है,” मैंने कहा, खिड़की से बाहर कोहरे में धुँधली होती झील की तरफ देखते हुए।
“मुझे भी यही पसंद है। शाम के वक्त ऐसे कोहरे में घूमना। सब कुछ सॉफ्ट और मिस्टी लगता है,” उसने कहा, और उसकी नज़रें भी खिड़की से बाहर उसी दृश्य पर टिक गईं। उस पल हम दोनों एक साथ चुप हो गए, बस बाहर के नज़ारे को देखते रहे। वो चुप्पी अजीब तरह से आरामदेह थी।
रास्तों में बिखरी बातें और एक बढ़ती नज़दीकी
कैफ़े से निकलने के बाद, अभिषेक ने सुझाव दिया कि हम लोग लेक के चारों ओर थोड़ा घूम लें। प्रिया और अभिषेक आपस में बातें करते आगे निकल गए, और मैं और रिया थोड़ी दूरी पर उनके पीछे चलने लगे। रास्ता सुनसान था, सिर्फ सड़क के किनारे लगे लैंप पोस्ट्स की हल्की पीली रोशनी और चारों तरफ फैला कोहरा।
“तुम्हारा नाम रिया है, लेकिन महतो… तो तुम्हारा फैमिली बैकग्राउंड पॉलिटिकल है क्या?” मैंने पूछा, बातचीत को आगे बढ़ाने की कोशिश में।
वो हल्के से हँसी, “अरे नहीं, ऐसा कुछ नहीं है। बस एक कॉमन सरनेम है यहाँ। मेरे पापा एक प्राइवेट कंपनी में इंजीनियर हैं। पॉलिटिक्स से दूर-दूर तक कोई वास्ता नहीं।”
हमारी बातचीत धीरे-धीरे गहराई में उतरने लगी। हमने अपने सपनों के बारे में बात की। मैंने बताया कि कैसे मैं दिल्ली की भागदौड़ में फँसा हुआ महसूस करता हूँ, और कैसे कभी-कभी धनबाद की इस सादगी की याद आती है। रिया ने बताया कि वो नर्स बनकर ग्रामीण इलाकों में काम करना चाहती है, जहाँ स्वास्थ्य सुविधाएँ कम हैं।
“तुम्हारी सोच बहुत अच्छी है,” मैंने सच्चे दिल से कहा। उसकी आँखों में एक दृढ़ता थी, एक प्यास थी कुछ अच्छा करने की।
“शुक्रिया,” उसने कहा, और फिर अचानक उसने मेरी तरफ देखा, “तुम भी तो बहुत अलग हो। ज़्यादातर लोग यहाँ से निकलकर भूल जाते हैं। तुम्हें याद आता है।”
उसकी बात सुनकर मेरा दिल थोड़ा तेज़ धड़कने लगा। हम चलते-चलते एक बेंच के पास पहुँचे। प्रिया और अभिषेक कहीं आगे निकल गए थे। रिया ने बेंच पर बैठने का सुझाव दिया। हम बैठ गए। कोहरा और गहरा हो रहा था, और चारों तरफ सन्नाटा था, सिर्फ दूर कहीं कुत्ते के भौंकने की आवाज़ आ रही थी।
बैठते वक्त, हमारे हाथ अनजाने में एक दूसरे से टकरा गए। एक सेकंड के लिए, उसका गरम स्पर्श मेरी कलाई पर महसूस हुआ। हम दोनों ने एक दूसरे की तरफ देखा। उसकी आँखों में एक झिलमिलाहट थी, एक सवाल था। मैंने अपना हाथ वापस खींच लिया, पर उस स्पर्श की गर्मी मेरी त्वचा पर बनी रही।
“सॉरी,” मैंने कहा, थोड़ा शर्मिंदा होकर।
“कोई बात नहीं,” उसने कहा, और एक मासूम सी मुस्कान उसके चेहरे पर खिल आई।
हम वहाँ कुछ देर और बैठे रहे, आसमान में उभरते तारों के बारे में बात करते हुए। मैंने उसे बताया कि बचपन में मैं और मेरे दोस्त यहीं आकर तारों को गिनने की कोशिश करते थे। वो मेरी बात सुनकर हँसती, और फिर अपनी कोई याद साझा करती। उस पल लग रहा था जैसे समय थम सा गया हो। हम दोनों के बीच एक अदृश्य धागा बनता जा रहा था, एक ऐसा कनेक्शन जो शब्दों से परे था।
अचानक उसने अपनी बाँहों पर हाथ फेरते हुए कहा, “थोड़ा ठंड लग रही है।”
मैं तुरंत उठा, “चलो, हम वापस चलते हैं। अभिषेक लोग कहीं खो गए लगते हैं।”
वापस चलते हुए, रास्ते में हमारी बातचीत हल्की-फुल्की हो गई। हम धनबाद के स्थानीय खाने के बारे में बात करने लगे। मैंने कहा कि मुझे लिट्टी-चोखा बहुत मिस होता है दिल्ली में। उसने कहा कि वो मुझे अगले दिन शहर के बेस्ट लिट्टी वाले ठेले पर ले जाएगी। उसने ये ऑफर इतनी नैचुरल तरीके से दिया कि मैं हैरान रह गया। मैंने तुरंत हाँ कह दी।
जब हम पार्किंग में पहुँचे, तो अभिषेक और प्रिया पहले से ही वहाँ खड़े थे। अभिषेक की आँखों में एक शरारत थी। “क्या हाल है दोस्तों? बहुत देर लगा दी?”
रिया ने मुझे देखा और मुस्कुराई। मैंने भी मुस्कुराकर जवाब दिया। उस रात, जब मैं अपने घर वापस लौटा, तो रिया की वो मुस्कान मेरे ज़हन में बसी रही। उसकी आवाज़, उसके हाथों के इशारे, और उस अनजाने स्पर्श की याद मेरे साथ सोने चली गई। मैं जानता था कि ये सिर्फ एक मुलाकात नहीं थी। कुछ और था, कुछ जो अभी शुरू ही हुआ था।
लिट्टी-चोखा और दिलों की बातें
अगले दिन दोपहर को, रिया ने मुझे वह ठेले का पता भेजा। वो एक छोटी सी गली में था, जहाँ धुएँ और मसालों की खुशबू हवा में तैर रही थी। जब मैं पहुँचा, तो रिया पहले से ही वहाँ खड़ी थी। उसने साधारण सी जीन्स और एक हल्के गुलाबी रंग की टी-शर्ट पहनी हुई थी। उसके बाल एक लूज बन में बँधे थे, जिससे उसका चेहरा और भी निखर कर सामने आ रहा था।
“तुम सही वक्त पर पहुँचे,” उसने कहा, उसकी आँखों में एक चमक थी।
“तुम्हारा इंतज़ार करना मुश्किल था,” मैंने कहा, और ये सच था। पूरी सुबह मैं इस मुलाकात का इंतज़ार करता रहा था।
हमने लिट्टी-चोखा ऑर्डर किया और एक साइड वाली छोटी सी दुकान पर बैठ गए। खाने का स्वाद लाजवाब था, पर उससे भी ज़्यादा लाजवाब थी रिया की कंपनी। हम फिर से बातों में खो गए। इस बार बातें और भी पर्सनल हो गईं। उसने बताया कि कैसे उसके पिता चाहते थे कि वो डॉक्टर बने, लेकिन उसने नर्सिंग चुनी। उसने अपनी माँ के साथ रिश्ते के बारे में बताया, जो उसकी सबसे अच्छी दोस्त थीं।
मैंने भी अपने बारे में खुलकर बात की। मैंने बताया कि कैसे मेरे पिता की एक्सीडेंट में अचानक मृत्यु हो गई थी, और कैसे मुझे जल्दी ही परिवार की ज़िम्मेदारी संभालनी पड़ी। ये बातें मैं ज़्यादा लोगों से शेयर नहीं करता था, पर रिया के सामने सब कुछ कहने का मन कर रहा था।
“तुम बहुत स्ट्रॉन्ग हो,” उसने कहा, और उसकी आवाज़ में सच्ची सहानुभूति थी। उसने अपना हाथ बढ़ाया और मेरे हाथ को हल्के से दबाया। ये कोई रोमांटिक जेस्चर नहीं था, बल्कि एक दोस्ताना, सहारा देने वाला स्पर्श था। पर उस स्पर्श ने मेरे अंदर एक तूफान सा खड़ा कर दिया।
खाना खत्म करने के बाद, रिया ने सुझाव दिया कि हम थोड़ा घूमने चलें। हम धनबाद की उन पुरानी गलियों में निकल पड़े, जहाँ हमारे बचपन के दिन बीते थे। हम अपने-अपने स्कूल के किस्से साझा करते रहे। कभी वो हँसती, कभी मैं हँसता। कभी हमारी नज़रें मिलतीं और फिर हम शर्मा कर नीचे देख लेते।
शाम ढलने लगी थी। हम एक पुराने पार्क में पहुँचे, जो अब थोड़ा उजड़ सा गया था। वहाँ एक पुराना झूला था। रिया ने उसकी तरफ इशारा किया, “चलो, झूला झूलते हैं। बचपन की याद ताज़ा करते हैं।”
हम दोनों झूले पर बैठ गए। झूला हिलने लगा। हल्की हवा चल रही थी, और आसपास कोई नहीं था। हमारे कंधे आपस में टकरा रहे थे। मैं उसकी गर्माहट महसूस कर सकता था। उसके बालों से एक हल्की सी खुशबू आ रही थी, शायद शैम्पू की या फिर कोई हल्का परफ्यूम।
“संदीप,” उसने अचानक कहा, अपनी आवाज़ को फुसफुसाहट में बदलते हुए।
“हाँ?” मैंने कहा, उसकी तरफ मुड़ते हुए।
उसने कुछ कहा नहीं। बस मेरी आँखों में देखती रही। उस पल, सब कुछ थम सा गया। झूले की आवाज़, दूर की सड़क पर गुजरती कारों की आवाज़, सब कुछ धुंधला सा हो गया। बस वो थी और मैं था। उसकी आँखों में एक तड़प थी, एक ललक थी, जो मेरी अपनी आँखों में भी परिलक्षित हो रही थी।
मैंने धीरे से अपना हाथ बढ़ाया और उसके चेहरे पर पड़े एक लटके हुए बाल को उसके कान के पीछे सरका दिया। मेरी उंगलियाँ उसके गाल को छू गईं। उसकी त्वचा मुलायम थी, गरम थी। उसने अपनी आँखें बंद कर लीं, और एक हल्की सी सिसकारी उसके होठों से निकली।
“रिया…” मैंने फुसफुसाया।
उसने अपनी आँखें खोलीं। उनमें एक साफ़ सी इजाज़त थी। मैं धीरे-धीरे अपना चेहरा उसके करीब लाया। हमारी साँसें मिलने लगीं। और फिर… दूर से किसी के चिल्लाने की आवाज़ आई। हम दोनों एकदम से अलग हो गए, जैसे करंट लगा हो।
वो आवाज़ किसी बच्चे की थी, जो पार्क के दूसरे छोर पर खेल रहा था। हम दोनों एक दूसरे को देखकर हँस पड़े, पर हँसी में एक शर्मिंदगी और बेचैनी भी थी।
“शायद… शायद हमें यहाँ से जाना चाहिए,” रिया ने कहा, अपने बालों को सहलाते हुए।
“हाँ,” मैंने कहा, मेरा दिल अभी भी जोर-जोर से धड़क रहा था।
वापस चलते हुए, हमारे बीच एक नया तनाव था। वो तनाव जो शारीरिक आकर्षण से पैदा होता है, जब दो लोग जानते हैं कि वो एक-दूसरे को चाहते हैं, पर अभी तक कुछ हुआ नहीं है। हमारी बातचीत कम हो गई थी, पर हर चुप्पी बोल रही थी। हर नज़र एक वादा कर रही थी।
जब मैं उसे उसके घर के पास छोड़ने पहुँचा, तो वो कार से उतरने से पहले रुकी।
“कल… कल शाम को तुम्हारा कुछ प्लान है?” उसने पूछा, सीधे मेरी आँखों में देखते हुए।
“नहीं, कुछ नहीं,” मैंने तुरंत कहा।
“मेरे घर पर कोई नहीं है। मेरे मम्मी-पापा रिश्तेदारों के यहाँ गए हैं। अगर… अगर तुम चाहो तो आ सकते हो,” उसने कहा, उसकी आवाज़ में एक हल्की सी कशमकश थी।
मेरा गला सूख गया। मैं जानता था कि ये सिर्फ एक निमंत्रण नहीं था। ये एक दरवाज़ा था, जो एक नए रिश्ते, एक नई शुरुआत की तरफ खुल रहा था।
“हाँ,” मैंने कहा, अपनी आवाज़ को स्थिर रखने की पूरी कोशिश करते हुए, “मैं आऊँगा।”
उसने मुस्कुराया, एक ऐसी मुस्कान जिसमें एक रहस्य था, एक वादा था। “ठीक है। शाम सात बजे।”
और फिर वो कार से उतर गई और अपने घर की तरफ चली गई। मैं वहीं बैठा रहा, उसके जाने के बाद भी लंबे समय तक, उसकी आखिरी मुस्कान को याद करते हुए। मेरे अंदर एक उत्तेजना थी, एक बेताबी थी, लेकिन साथ ही एक डर भी था। कल क्या होगा? क्या सब कुछ वैसा ही होगा जैसा मैं सोच रहा था?
वो शाम, वो घर, और एक नया अध्याय
अगले दिन पूरा दिन बड़ी बेचैनी से गुज़रा। मैं कुछ ठीक से कर नहीं पा रहा था। मेरे दिमाग में बस एक ही ख्याल था – रिया। शाम सात बजे, मैं स्नान करके तैयार हुआ। साधारण कपड़े पहने – एक काली टी-शर्ट और जीन्स। मैं नहीं चाहता था कि ये बहुत फॉर्मल लगे।
रिया का घर शहर के एक शांत इलाके में था। जब मैं दरवाज़े पर पहुँचा और बेल बजाई, तो मेरा दिल दहाड़ने लगा। दरवाज़ा खुला और रिया खड़ी थी।
उसने साधारण सी, पर बेहद आकर्षक लग रही थी। उसने एक लूज, मुलायम सूती की सलवार कमीज पहनी हुई थी, जो उकेरे हुए शरीर के कर्व्स को ढीले ढंग से ढक रही थी, पर फिर भी उसकी खूबसूरती को छिपा नहीं पा रही थी। उसके बाल खुले हुए थे, और उसने बहुत हल्का सा मेकअप किया हुआ था।
“अंदर आओ,” उसने कहा, एक गर्मजोशी भरी मुस्कान के साथ।
मैं अंदर गया। घर साफ-सुथरा और आरामदायक था। लिविंग रूम में एक सोफा था और एक छोटा सा टीवी। रिया ने कहा कि वो कुछ पीने के लिए लाती है, और मैं सोफे पर बैठ गया।
थोड़ी देर बाद वो दो गिलास लेकर आई। “तुम्हारा फेवरेट?” उसने पूछा।
“जो तुम दो,” मैंने कहा।
हम दोनों सोफे पर बैठ गए। शुरुआती कुछ मिनट थोड़े अजीब से थे। अब कोई अभिषेक नहीं था, कोई प्रिया नहीं थी। बस हम दोनों थे। एक दूसरे के साथ अकेले।
हमने टीवी चालू किया, पर कोई ध्यान नहीं दे रहा था। मेरा पूरा ध्यान रिया पर था। वो कैसे गिलास पकड़ रही थी, कैसे अपने बालों को पीछे सरका रही थी। हर छोटी सी हरकत मेरे लिए मदहोश कर देने वाली थी।
“तुम… तुम ठीक हो?” उसने पूछा, मेरी तरफ देखते हुए।
“हाँ, बस… थोड़ा नर्वस,” मैंने कबूल किया।
वो हँसी, “मैं भी।”
उसने अपना गिलास टेबल पर रखा और थोड़ा मेरी तरफ सरकी। हमारे बीच की दूरी कम हो गई। मैं उसकी गर्माहट महसूस कर सकता था। उसकी साँसों की गति तेज़ लग रही थी।
“संदीप,” उसने फुसफुसाया।
“हाँ, रिया,” मैंने जवाब दिया।
और फिर, कोई शब्द नहीं थे। मैंने धीरे से अपना हाथ बढ़ाया और उसके चेहरे को छुआ। उसने अपनी आँखें बंद कर लीं और मेरे स्पर्श में खो गई। मैंने अपना अंगूठा उसके होठों पर फिराया। वो नरम थे, गरम थे।
फिर मैंने धीरे से अपना सिर झुकाया और उसके होठों को अपने होठों से छुआ। पहला चुंबन कोमल था, एक पूछताछ भरा। पर जब उसने जवाब दिया, जब उसने अपने होठों को मेरे होठों के खिलाफ दबाया, तो वो कोमलता एक तीव्र उत्तेजना में बदल गई।
हमारा चुंबन गहरा होता गया। मेरी जीभ ने उसके होठों के बीच का रास्ता तलाशा और उसने इजाज़त दे दी। हमारी जीभें आपस में लड़ने लगीं। मेरे हाथ उसके बालों में खो गए, उसकी पीठ पर फिरने लगे। उसके हाथ मेरे कंधों पर, फिर मेरे सिर के पीछे थे, मुझे और करीब खींच रहे थे।
काफी देर बाद, जब हम दोनों हाँफने लगे, तो हमारे होठ अलग हुए। हमारी साँसें तेज़ थीं। रिया की आँखों में एक चमक थी, एक ऐसी चमक जो मुझे पूरी तरह से अपनी ओर खींच रही थी।
“मैं… मैं चाहती हूँ…” उसने कहा, पर वाक्य पूरा नहीं कर पाई।
“मैं भी,” मैंने कहा, और ये सच था। मैं उसे चाहता था, पूरी तरह से, बिना किसी शर्त के।
उसने मेरा हाथ पकड़ा और धीरे से खींचा। मैं उठा और उसके पीछे-पीछे चला। वो मुझे अपने बेडरूम में ले गई। कमरा सादा था, एक डबल बेड, एक ड्रेसिंग टेबल। पर उस वक्त मेरी नज़रें सिर्फ उस पर थीं।
बेडरूम में पहुँचते ही, हम फिर से चुंबन में खो गए। इस बार हमारे हाथ और भी बेचैन थे। मेरे हाथ उसकी कमीज के बटन खोलने लगे। एक-एक करके बटन खुलते गए, और उसकी त्वचा का सुनहरा रंग दिखाई देने लगा। जब आखिरी बटन खुला, तो उसने कमीज को अपने कंधों से सरका दिया। उसने नीचे एक साधारण ब्रा पहनी हुई थी, जो उसके सुडौल स्तनों को सहारा दे रही थी।
मैं हैरान रह गया। वो और भी खूबसूरत थी जितना मैंने सोचा था। मैंने अपना सिर झुकाया और अपने होठों को उसकी गर्दन पर रखा। मैंने हल्के से चूसा, और उसने एक आह भरी। उसकी आवाज़ ने मेरे अंदर की आग को और भड़का दिया।
मैंने उसे बेड की तरफ धीरे से धकेला। वो पीछे की तरफ गिरी, और मैं उसके ऊपर आ गया। मैंने उसके कान के पास फुसफुसाया, “तुम बहुत खूबसूरत हो, रिया।”
उसने जवाब नहीं दिया, बस मेरी गर्दन को अपने हाथों से पकड़कर मेरे होठों पर एक जोरदार चुंबन जड़ दिया।
शरीरों का मिलन और आत्माओं का तालमेल
मैंने उसके कान से शुरू करते हुए, अपने चुंबनों की एक श्रृंखला उसके शरीर पर उतारी। उसकी गर्दन, उसके कंधे। मैंने उसकी ब्रा के स्ट्रैप्स को उतार दिया और उसके स्तनों को अपनी नज़रों से निहारा। वो परफेक्ट थे। मैंने अपना मुँह उनमें से एक की ओर ले जाया और उसे अपनी जीभ से सहलाया। उसने एक तीखी सिसकारी भरी और अपनी उंगलियों से मेरे बालों को जकड़ लिया।
फिर मैं नीचे की ओर बढ़ा। मैंने अपने होठों को उसके पेट पर रखा, और फिर हल्के से दाँतों से काटा। एक लव बाइट। उसने चीख़ मारी, पर उस चीख़ में दर्द नहीं, एक अजीब सी खुशी थी।
मैं और नीचे गया। मैंने अपने हाथों से उसकी सलवार और फिर उसके अंदरुनी वस्त्र को धीरे से उतार दिया। और फिर वो पल आया जब वो पूरी तरह से नग्न मेरे सामने थी। उसकी योनी, उसकी सारी खूबसूरती, सब कुछ मेरे सामने था।
मैंने उसकी जाँघों को धीरे से फैलाया। उसकी गर्माहट मुझे महसूस हुई। मैंने अपना सिर उसके पैरों के बीच ले जाया और फिर, एक ड्रामेटिक पल के लिए, मैंने रुका। मैंने अपनी साँसों की गर्म हवा उसकी नमी पर छोड़ी। उसने एक झटका सा महसूस किया, और उसकी पूरी देह में एक सिहरन दौड़ गई।
“संदीप… प्लीज…” उसने गुहार लगाई, उसकी आवाज़ में एक तड़प थी।
पर मैंने जल्दबाज़ी नहीं की। मैंने अपनी जीभ का सिरा निकाला और उसकी योनी के ऊपरी हिस्से पर, उसके भगशेफ के आसपास, धीरे-धीरे चक्कर लगाने शुरू किए। मैं उसे टीज़ कर रहा था, उसकी इच्छा को और भी बढ़ा रहा था। वो बिस्तर पर करवटें बदलने लगी, उसकी साँसें तेज़ हो गईं। उसने मेरे बालों को और जोर से पकड़ लिया।
“ओह गॉड… संदीप… मत रोको…” उसने गिड़गिड़ाया।
और फिर, मैंने उसे वो दिया जो वो चाहती थी। मैंने अपनी जीभ को और गहराई से डाला, उसकी योनी के अंदर की नमी को चखा। फिर मैंने वापस आकर उसके भगशेफ को अपने मुँह में ले लिया और जोर से चूसना शुरू किया। मैं एक लय में चूस रहा था, दबा रहा था, चाट रहा था।
वो चीख़ उठी। एक ऐसी चीख़ जो कमरे की दीवारों से टकराकर वापस लौट आई। उसका शरीर ऐंठ गया, उसकी पीठ बिस्तर से उठ गई। उसने मेरे सिर को अपनी जाँघों के बीच कसकर दबा लिया, और मैंने और जोर लगाया। मैं जानता था कि वो करीब है।
और फिर वो आया। एक लंबी, दम घुटने वाली चीख़ के साथ, उसका शरीर काँप उठा। उसने मेरा नाम पुकारा, बार-बार। मैंने तब तक नहीं रुका जब तक उसके शरीर के ऐंठन बंद नहीं हो गए।
फिर मैं ऊपर की ओर बढ़ा। मैंने अपने कपड़े उतारे। उसकी आँखें मेरे शरीर को निहार रही थीं, उनमें संतुष्टि और फिर से उठती हुई इच्छा थी। मैं उसके ऊपर आया, और उसने अपनी जाँघों को फैलाया। मैंने अपने लिंग को उसकी योनी के प्रवेश द्वार पर रखा, जो अब और भी नम और गर्म थी।
मैंने धीरे से दबाया। एक कर्राहट मेरे होठों से निकली, और एक आह उसके। मैं अंदर तक घुस गया। वो तंग थी, गर्म थी। मैंने एक पल के लिए रुककर उसके चेहरे को देखा। उसकी आँखें बंद थीं, और उसके चेहरे पर एक आनंदमयी भाव था।
फिर मैंने गति शुरू की। धीरे-धीरे पहले, एक कोमल गति। हम दोनों एक-दूसरे के शरीर की लय को समझने की कोशिश कर रहे थे। फिर गति तेज़ हुई। मैंने उसे करवट दिलाई, और हम स्पूनिंग पोज़िशन में आ गए। मैं उसके पीछे से उसमें घुसा हुआ था, और मेरा एक हाथ उसके स्तनों पर था, दूसरा उसकी क्लिटोरिस पर।
मैंने उसके कान के पास फुसफुसाना शुरू किया। “तुम कितनी गर्म हो… कितनी तंग… तुम मुझे पागल कर देती हो…”
उसने जवाब में एक आह भरी और अपनी कमर पीछे की ओर धकेलकर मेरे लिंग को और गहराई से ले लिया।
मैंने उसकी क्लिटोरिस को रगड़ना जारी रखा, उसी लय में जिस लय में मैं अंदर-बाहर कर रहा था। मैं जानता था कि वो फिर से करीब है। उसकी साँसें फिर से तेज़ हो गईं, उसके शरीर में फिर से वो सिहरन दौड़ने लगी।
“मैं… मैं आ रही हूँ…” उसने हाँफते हुए कहा।
“आ जाओ, बेबी… मेरे लिए आ जाओ,” मैंने उसे प्रोत्साहित किया।
और वो आ गई। एक लंबे, दर्दभरे ठहाके के साथ। उसका शरीर मेरे इर्द-गिर्द सिकुड़ गया, उसने मुझे और भी जकड़ लिया। उसकी योनी की मांसपेशियों के सिकुड़ने ने मुझे भी कगार पर पहुँचा दिया।
मैंने अपनी गति और तेज़ कर दी। मैंने उसके कूल्हे पर एक हल्का सा तमाचा जड़ा, जिससे उसने एक चीख़ निकाली। और फिर मैंने खुद को रोक लिया। मैंने तेज़ी से अपना लिंग बाहर निकाला और उसकी पीठ पर, उसके कूल्हों के बीच, अपना वीर्य छोड़ दिया। गर्म तरल उसकी त्वचा पर फैल गया।
हम दोनों हाँफ रहे थे, पसीने से तरबतर। मैं उसके ऊपर गिर गया, और वो मेरे नीचे दब गई। हमारे दिल एक साथ धड़क रहे थे, तेज़ गति से।
चुप्पी का संगीत और एक नई शुरुआत
कुछ मिनटों तक हम वैसे ही पड़े रहे, सिर्फ साँस लेते हुए। फिर मैं उठा और बाथरूम गया। मैं एक गीला तौलिया लेकर आया और उसकी पीठ को साफ़ किया। वो मुस्कुराई, और उस मुस्कुराहट में एक संतुष्टि थी, एक शांति थी।
मैं वापस बिस्तर पर आया और उसे अपनी बाँहों में ले लिया। वो मेरी छाती पर सिर रखकर लेट गई। हम कुछ देर तक चुपचाप लेटे रहे। बाहर से रात की आवाज़ें आ रही थीं – एक दूर से आती ट्रेन की सीटी, कुत्ते के भौंकने की आवाज़।
“वो… वो अद्भुत था,” उसने अंततः कहा, अपनी आवाज़ को थोड़ा कर्कश पाया।
“हाँ,” मैंने कहा, और ये एक छोटा सा शब्द था, पर उसमें सब कुछ समाया हुआ था – आनंद, संतुष्टि, कृतज्ञता।
“तुम कल दिल्ली लौट रहे हो न?” उसने पूछा, और उसकी आवाज़ में एक उदासी झलकी।
“हाँ,” मैंने कहा, “पर इसका मतलब ये नहीं कि ये खत्म हो गया।”
उसने अपना सिर उठाया और मेरी आँखों में देखा। “नहीं, नहीं होगा।”
हमने फिर से चुंबन किया, पर ये चुंबन अलग था। ये कोमल था, वादों से भरा हुआ। ये एक नई शुरुआत का चुंबन था, एक ऐसे रिश्ते का जो अभी बस फूलना शुरू ही हुआ था।
उस रात हम बातें करते रहे। हमने भविष्य के बारे में बात की। हमने मिलने के नए तरीकों के बारे में बात की। हमने प्यार के बारे में बात की, हालाँकि उस शब्द का इस्तेमाल नहीं किया। पर वो हवा में था, हमारे बीच की हर चुप्पी में, हर नज़र में।
जब सुबह हुई, तो मैं उठा और धीरे से तैयार हुआ। रिया सो रही थी, उसके चेहरे पर एक शांत मुस्कान थी। मैंने उसे जगाया नहीं। मैंने एक नोट लिखा और उसके बेडसाइड टेबल पर रख दिया।
“तुम्हारे बिना दिल्ली की यात्रा अधूरी होगी। जल्द मिलते हैं। – संदीप”
मैं चुपचाप कमरे से बाहर निकला और घर से बाहर आया। सुबह का कोहरा अभी भी था, पर अब वो मुझे उदास नहीं कर रहा था। वो मुझे रिया की याद दिला रहा था, उस रात की याद दिला रहा था जब कोहरे ने हमारी दुनिया को बाकी सबसे अलग कर दिया था।
जब मैं दिल्ली के लिए ट्रेन में बैठा, तो मेरे फोन में एक मैसेज आया। रिया का था।
“सफर सुरक्षित रहे। और हाँ… वो रात मैं कभी नहीं भूलूँगी।”
मैं मुस्कुराया और जवाब दिया, “न तो मैं। जल्द मिलेंगे।”
और हम मिले भी। फिर कई बार। धनबाद में, दिल्ली में, रांची में। हमारा रिश्ता बढ़ता गया, गहराता गया। वो रात सिर्फ एक शुरुआत थी, एक ऐसी शुरुआत जिसने दो अलग-अलग दुनियाओं को एक कर दिया।
आज, जब कभी धनबाद का कोहरा मेरी यादों में घुलता है, मैं उस रात को याद करता हूँ। उस चुप्पी को, उस स्पर्श को, उस आवाज़ को। और मुझे एहसास होता है कि कभी-कभी जिंदगी की सबसे खूबसूरत कहानियाँ शुरू होती हैं सबसे साधारण शामों में, सबसे अनजाने इंतज़ारों में। और रिया… रिया मेरी सबसे खूबसूरत कहानी बन गई।
