मेरा नाम ज़ैनब है। और यह कहानी मेरी है। वह कहानी जिसे मैंने कभी लिखने की कल्पना भी नहीं की थी। वह कहानी जिसने मेरी दुनिया, मेरी शादी, और मेरी खुद की पहचान को चकनाचूर कर दिया।
सब कुछ इतना सुंदर शुरू हुआ था। लखनऊ की उन गलियों में, जहाँ हवा में गुलाब की खुशबू और इतिहास की गूँज रहती है। मैं अहमद से मिली थी कॉलेज के एक इवेंट में। वह दूसरे डिपार्टमेंट से था, इंजीनियरिंग का छात्र। लंबा, सुडौल, उसकी आँखों में एक गहराई थी जो मुझे तुरंत अपनी ओर खींच ले गई। उसकी मूँछें पतली, दाढ़ी नेटली ट्रिम की हुई, और वह हमेशा साफ-सुथरे कपड़े पहनता। उसका व्यवहार नर्म था, बातचीत में तहज़ीब झलकती थी। छह महीने की दोस्ती के बाद, उसने शादी का प्रस्ताव रखा। मेरे घरवाले खुश थे। उसका परिवार अच्छा था, हैसियत वाला। उसके पिता एक रिटायर्ड गवर्नमेंट ऑफिसर थे। सब कुछ परफेक्ट लग रहा था।
हमारी शादी बड़ी धूमधाम से हुई। मैं उस दिन सफेद और गोल्डन वर्क वाली एक भारी लहंगा पहने हुई थी। मेरे लंबे काले बालों में गजरे सजे थे। मेरी आँखों में काजल और होठों पर हल्का गुलाबी लिपस्टिक। सब कहते थे कि मैं बहुत सुंदर लग रही हूँ। अहमद की नज़रों में मुझे प्यार और गर्व दोनों दिखाई देते थे। मैंने सोचा, मेरी ज़िंदगी अब एक सुंदर सपने की तरह होगी।
शादी के बाद, हम अहमद के पैतृक घर में रहने आए। यह एक बड़ा, पुराना लखनऊई हवेली जैसा मकान था, हज़रतगंज के पास। बाहर से तो बहुत खूबसूरत था, लेकिन अंदर जाते ही एक अजीब सी ठंडक महसूस होती। अहमद की माँ, आंटी जीनत, एक शांत और थोड़ी डरी.सहमी सी औरत थीं। और फिर थे अहमद के पिता, जिन्हें सब चाचू जान कहते थे। पहली बार जब मैंने उन्हें देखा, मेरे मन में एक अजीब सी चिंता पैदा हुई। वह लंबे नहीं थे, पेट थोड़ा निकला हुआ था। उनके चेहरे पर गहरी झुर्रियाँ थीं, और उनकी आँखें… उनकी आँखें हमेशा चिपचिपी सी लगती थीं। जैसे वह हर चीज़ को चाट रहे हों। उनकी मूँछें और दाढ़ी में सफेद बालों के बीच तंबाकू के दाग दिखाई देते। वह अक्सर एक ही कुर्ता-पायजामा पहने रहते, जिसमें से पुराने पसीने की बू आती।
पहले कुछ दिन ठीक ठाक गुज़रे। फिर मैंने एक पैटर्न नोटिस करना शुरू किया। जब भी मैं लिविंग रूम से गुज़रती, चाचू जान वहाँ बैठे होते। और उनकी नज़रें मेरे पूरे बदन पर घूमती रहतीं। सिर से पैर तक। मैंने शुरू में इसे अनदेखा करने की कोशिश की। शायद बुजुर्ग हैं, ऐसे ही देख लेते हैं। लेकिन यह ‘देखना’ कुछ ज़्यादा ही इंटेंस होता गया।
एक दिन मैं किचन में खड़ी थी, सिंक पर बर्तन धो रही थी। मैंने एक साधारण सलवार कमीज पहनी थी, जो मेरे कर्व्स को ढकती भी थी और उभारती भी। अचानक मैंने महसूस किया कि कोई बहुत करीब खड़ा है। मैंने मुड़कर देखा तो चाचू जान थे। वह मेरे ठीक पीछे, इतने करीब कि उनकी साँसें मेरी गर्दन को छू रही थीं। मेरे शरीर में एक झुरझुरी दौड़ गई।
“बेटा, नमक कहाँ रखा है?” उनकी आवाज़ फिसलती हुई सी लगी।
मैंने एक कदम आगे बढ़ाया और अलमारी की ओर इशारा किया। “वहाँ, चाचू जान।”
लेकिन वह हटे नहीं। उन्होंने नमक निकालने के बहाने फिर से मेरे पास आकर खड़े हो गए। उनका हाथ जानबूझकर मेरी बाँह को छू गया। एक लंबे, धीमे टच की तरह। मैं सिहर गई। मैंने तुरंत किचन छोड़ दिया।
यह घटनाएँ बढ़ती गईं। वह हमेशा कोई बहाना ढूँढ़ लेते। सोफे पर बैठते समय वह हमेशा मेरे पास वाली जगह चुनते, भले ही पूरा सोफा खाली हो। उनका पैर ‘अनजाने में’ मेरे पैर से टकरा जाता। अखबार पढ़ते हुए वह मेरी तरफ देखते रहते, अखबार के ऊपर से। उनकी नज़रें मेरे स्तनों पर, मेरी कमर पर, मेरे होंठों पर टिकी रहतीं। एक दिन जब मैं सीढ़ियाँ चढ़ रही थी, वह ऊपर से आ रहे थे। सीढ़ियाँ संकरी थीं। गुज़रते समय, उन्होंने अपना पूरा शरीर मेरे से रगड़ दिया। मैंने स्पष्ट महसूस किया। मैं वहाँ जमी रह गई, मेरी साँसें अटक गईं। उन्होंने मुड़कर देखा भी नहीं, बस चले गए।
मैं तनाव से भरने लगी। मैं अपने कमरे में बंद रहने लगी। जब भी अहमद ऑफिस से लौटता, मैं उसे अपने पास बैठाती, उसकी बाँहों में छुपना चाहती। लेकिन मैं कैसे शुरू करूँ? कैसे कहूँ कि तुम्हारे पिता मुझे घूरते हैं, मेरे पर्सनल स्पेस में घुस आते हैं?
आखिरकार एक रात, जब अहमद बिस्तर पर आराम कर रहा था, मैंने हिम्मत जुटाई। मैं उसके पास लेट गई और धीरे से कहा, “अहमद… कुछ बात करनी है।”
“हाँ बोलो, ज़ैनब। क्या बात है?” उसने आँखें खोलीं।
“यह… यह चाचू जान के बारे में है।”
उसकी आँखों में एक पल के लिए चिंता तैर गई, फिर गायब हो गई। “क्या हुआ? कुछ कहा क्या उन्होंने?”
“नहीं… ऐसा नहीं है।” मैंने शब्द जुटाए। “वह… वह मुझे बहुत देखते हैं। और कभी-कभी बहुत करीब आ जाते हैं। ऐसा लगता है… जानबूझकर। मुझे अजीब लगता है। असहज महसूस होता है।”
अहमद का चेहरा गंभीर हो गया। वह बैठ गया। “ज़ैनब, तुम क्या कह रही हो? मेरे अब्बू? वह एक रिस्पेक्टेबल आदमी हैं। पूरी लाइफ गवर्नमेंट में ईमानदारी से काम किया है। लोग उन्हें जानते हैं। तुम शायद मिसअंडरस्टैंड कर रही हो। वह बुजुर्ग हैं, शायद तुम्हें बेटी की तरह देखते हैं। क्लोजनेस दिखाते हैं।”
“नहीं अहमद, यह बेटी वाला लुक नहीं है!” मेरी आवाज़ में घबराहट थी। “मैं फील कर सकती हूँ। यह अलग है।”
उसने अपना हाथ मेरे कंधे पर रखा। “सुनो, तुम नए घर में आई हो। एडजस्ट कर रही हो। कभी-कभी चीज़ें गलत लगती हैं। मेरे अब्बू का इरादा बुरा नहीं हो सकता। मैं उन्हें जानता हूँ। तुम ज़्यादा सेंसिटिव हो रही हो। ठीक है न?”
मैं चुप हो गई। उसके विश्वास में कोई दरार नहीं थी। उसकी नज़रों में मेरी चिंता के लिए सहानुभूति नहीं, बल्कि एक हल्की सी झुंझलाहट थी। मैंने और ज़ोर देने का फैसला नहीं किया। शायद मैं ही गलत थी। शायद।
लेकिन चाचू जान का व्यवहार और भी बदतर हो गया। अब वह और भी बोल्ड हो गए। एक दिन जब मैं अकेली ड्राइंग रूम में टीवी देख रही थी, वह आए और मेरे सोफे पर बैठ गए। उनके और मेरे बीच महज़ एक इंच की दूरी रह गई। मैं उठना चाहती थी, लेकिन मैं फ्रीज हो गई। उन्होंने टीवी की ओर देखते हुए कहा, “ज़ैनब बेटा, तुम्हारी साड़ी बहुत सुंदर है। तुम्हारा फिगर तो बहुत अच्छा है। जवानी है न, दिखानी चाहिए।”
मेरा गला सूख गया। मैं बोल नहीं पाई। वह मुस्कुराए, और उनकी नज़र मेरी नीची नेकलाइन पर टिक गई। फिर धीरे से उठकर चले गए, मानो कुछ हुआ ही न हो।
मैं एक कैदी की तरह महसूस करने लगी। मैं ढीले, बैगी कपड़े पहनने लगी। मेकअप करना बंद कर दिया। कोशिश करती कि घर में उनसे टकराऊँ ही नहीं। लेकिन वह हर जगह मौजूद लगते थे।
फिर वह दिन आया। वह दिन जो मेरी ज़िंदगी को दो टुकड़ों में बाँट देगा। अहमद को सुबह-सुबह ही ऑफिस के लिए निकलना था। एक आउटस्टेशन मीटिंग थी। उसने मुझे गुडबाय किस किया, और कहा कि शाम को लेट हो सकता हूँ। मैंने उसे दरवाज़े तक छोड़ा। जैसे ही दरवाज़ा बंद हुआ, मुझे पीछे खड़े होने का एहसास हुआ।
मैंने मुड़कर देखा। चाचू जान वहाँ खड़े थे। उनके चेहरे पर एक अजीब, विजयी सी मुस्कान थी। आंटी जीनत मंदिर में गई हुई थीं। नौकरानी का दिन छुट्टी था। पूरा घर खाली था। सिर्फ मैं और वह।
“ज़ैनब,” उनकी आवाज़ में एक नया, खुरदुरापन था। “आज तुम और मैं कुछ बात करेंगे।”
मेरा दिल जोरों से धड़कने लगा। “क्या… क्या बात, चाचू जान? मैं किचन का काम देखने जा रही हूँ।”
मैंने तेजी से किचन की ओर कदम बढ़ाया। लेकिन उन्होंने मेरा हाथ पकड़ लिया। उनकी पकड़ मजबूत, लोहे जैसी थी। “किचन बाद में। पहले यह बात।”
वह मुझे ड्राइंग रूम की ओर खींचते गए। मैंने अपना हाथ छुड़ाने की कोशिश की, लेकिन वह नहीं छूटा। “चाचू जान! छोड़िए मुझे! यह क्या कर रहे हैं?”
वह मुझे सोफे पर धकेल दिया। मेरी साँसें तेज हो गईं, आँखों में आँसू आ गए। “प्लीज… नहीं…”
“चुप रहो,” उनकी आवाज़ में एक गुस्सा था। “इतनी सुंदर बहू आई है घर में, और इतना शर्मीला बर्ताव? नहीं चलेगा। तुम्हें सीखना होगा कि इस घर में कैसे रहना है।”
उन्होंने मेरे करीब आकर खड़े हो गए। उनकी नज़रें मेरे डर से भरे चेहरे पर चिपकी हुई थीं। “तुम्हारे ये स्तन… इतने भरे हुए। तुम्हारी यह कमर… अहमद बहुत लकी है। लेकिन उसे पता नहीं कि असली चीज़ कैसे संभाली जाती है।”
मैं रोने लगी। “प्लीज… मैं अहमद को कॉल करती हूँ…”
उन्होंने तेजी से मेरा मोबाइल छीनकर दूर फेंक दिया। “आज कोई नहीं आने वाला। तुम और मैं। बस।”
और फिर उन्होंने मुझ पर हमला किया। उनके हाथ मेरी सलवार की कमरबंद पर गए। मैंने जोर से धक्का दिया, चिल्लाया। लेकिन उनकी ताकत मेरे से कहीं ज़्यादा थी। उन्होंने मेरे मुँह पर अपना हाथ रख दिया। मेरी आवाज़ दब गई। मैंने हाथ-पैर मारे, लेकिन वह मुझे दबोचे हुए थे। उनके शरीर की बदबू, तंबाकू और पुराने पसीने की गंध मेरे नथुनों में भर गई। मैं सचमुच घुटने लगी।
उन्होंने मेरी सलवार नीचे खींची। मेरे अंदर एक जंगल सी आग लग गई। शर्म, डर, गुस्सा, बेबसी… सब कुछ। मैं प्रतिरोध करती रही, लेकिन मेरी ताकत जवाब दे गई। एक उम्रदराज, बदसूरत आदमी का वजन मुझ पर था, और मैं उसे हटा नहीं पा रही थी। आँसू मेरे गालों पर बहते रहे।
फिर वह पल आया। उन्होंने अपना पायजामा खोला। मैंने अपनी आँखें बंद कर लीं। मैं वहाँ नहीं थी। मैं कहीं और थी। लखनऊ की उन गलियों में, अहमद के साथ, हँसते हुए। लेकिन मेरे शरीर को दर्द ने वापस खींच लिया। एक कर्कश, फटा हुआ दर्द। मैं चीखना चाहती थी, लेकिन उनके हाथ ने मेरा मुँह दबा रखा था। उनकी साँसें तेज, गरारे करती हुई मेरे कान में पड़ रही थीं।
वह मुझे चोद रहे थे। जबरदस्ती। बिना किसी लगाव के, बिना किसी इज्जत के। सिर्फ एक वस्तु की तरह। उनकी हर थ्रस्ट मेरे अंदर एक नया घाव कर रही थी। मेरी चूत में जबरन घुसा हुआ उनका लंड मुझे टुकड़े-टुकड़े कर रहा था। मैंने अपने नाखून उनकी पीठ में गड़ा दिए, लेकिन उन्होंने रुकने की बजाय और तेज हरकत की। उनका पसीना मेरे चेहरे पर टपक रहा था। वह कराह रहे थे, गंदी गालियाँ निकाल रहे थे। “क्या टाइट चूत है… अरे… तेरे जैसी जवान औरत का मज़ा ही कुछ और है…”
मैं बेहोश होने की कगार पर थी। दर्द, अपमान और सब कुछ खो देने की भावना ने मुझे लगभग पंगु बना दिया। मेरा शरीर सुन्न हो गया। मैं सिर्फ महसूस कर सकती थी कि वह अंदर-बाहर हो रहा है, मेरी देह को नोच रहा है।
अचानक, उनकी हरकतें और तेज हो गईं। उन्होंने मेरे मुँह से हाथ हटा दिया और मेरे स्तन को जोर से दबाया। मैं चीख पड़ी। “नहीं! बस करो! प्लीज!”
लेकिन मेरी चीख ने उन्हें और उत्तेजित कर दिया। उन्होंने मेरे कपड़े फाड़ डाले। मेरे स्तन बाहर आ गए। उन्होंने उन्हें मसलना शुरू कर दिया, फिर मुँह से चूसना। मैं मन ही मन अल्लाह से दुआ करने लगी कि यह खत्म हो जाए, कि मैं मर जाऊँ।
फिर वह चिल्लाया। एक गहरी, जानवरों जैसी आवाज़। उसने अपना लंड मेरी चूत के अंदर ही और गहराई से धकेला, और मैं महसूस कर सकती थी कि उसका गर्म वीर्य मेरे अंदर फूट रहा है। एक घिनौनी, चिपचिपी गर्माहट। मेरा पेट मिचलाने लगा।
वह मुझ पर लेटा रहा, हाँफता रहा। फिर धीरे से उठा। उसने अपना पायजामा सम्भाला और मेरी तरफ देखा। मेरे शरीर पर नील पड़ रहे थे, कपड़े फटे हुए थे, आँखें सूनी थीं।
“अब चुपचाप रहना,” उसने कहा, उसकी आवाज़ फिर से सामान्य, नीरस हो गई थी। “किसी को कुछ पता नहीं चलना चाहिए। तुम्हारी और तुम्हारे पति की इज्जत का सवाल है। अगर एक शब्द भी निकला, तो सबको बता दूँगा कि तुमने मुझे लुभाया, तुम ही चाहती थी। देख लेना कौन विश्वास करता है।”
और वह चला गया। मैं सोफे पर पड़ी रही, टूटी हुई, गंदी महसूस करती हुई। मेरे अंदर उसका वीर्य बह रहा था। मैं उठी, लड़खड़ाते हुए बाथरूम की ओर चली। मैंने गरम पानी चलाया और खुद को रगड़ना शुरू कर दिया। मेरी त्वचा लाल हो गई, लेकिन मैं उस गंदगी को धो नहीं पा रही थी। मैं फर्श पर बैठकर रोने लगी। लंबे, दर्द भरे रुदन।
शाम को अहमद लौटा। वह थका हुआ लग रहा था। मैंने अपने आप को बिस्तर में समेट रखा था। मैंने सबसे ढीले कपड़े पहने थे, जो मेरे शरीर को पूरी तरह ढकते थे।
“क्या हुआ ज़ैनब? बुखार है क्या?” उसने मेरे माथे पर हाथ रखा।
मैं उसकी आँखों में देख नहीं पा रही थी। मैंने सिर हिलाया। “नहीं… बस… सिर दर्द है। थकान है।”
उसने मुझे चूमा। उसके होंठ मेरे होंठों पर थे, और मेरे मन में एक तूफान उठा। कुछ घंटे पहले उसके पिता का मुँह मेरी गर्दन पर था। मैंने मुड़कर अपना चेहरा छुपा लिया।
“ठीक है, आराम करो। मैं खाना लेकर आता हूँ,” वह कहकर चला गया।
उस रात मैं सो नहीं पाई। हर पल उस दृश्य की याद आती। हर आहट पर मेरा दिल धड़कने लगता। मैंने फैसला किया कि मैं चुप रहूँगी। उसकी धमकी काम कर गई थी। मेरी अपनी इज्जत, मेरे पति का विश्वास… सब कुछ खतरे में था।
लेकिन शरीर ने साथ नहीं दिया। एक हफ्ते बाद, मुझे उल्टियाँ होने लगीं। मैंने प्रेगनेंसी टेस्ट किया। पॉजिटिव। मेरी दुनिया एक बार फिर उलट गई। यह बच्चा… किसका था? उस रात के बाद अहमद के साथ भी मेरे संबंध हुए थे। लेकिन मेरा दिल जानता था। मेरा शरीर जानता था। यह बच्चा उस राक्षस का था।
मैं और नहीं छुपा सकती थी। एक रात, जब अहमद मुझे प्यार से अपनी बाँहों में ले रहा था, मैं फूट पड़ी। सारी कहानी, डर, धमकी, बलात्कार… सब कुछ। मैं हिचकियाँ लेते हुए, रोते हुए बता रही थी।
अहमद का चेहरा पहले तो अविश्वास से भरा था। फिर गुस्से से लाल हो गया। फिर सफेद पड़ गया। वह बिस्तर से उठा और कमरे में चक्कर लगाने लगा। उसकी आँखों में आँसू थे। गुस्सा था। बेबसी थी।
“तुम… तुम सच कह रही हो?” उसकी आवाज़ काँप रही थी।
“हाँ, अहमद। हर शब्द सच। मैं प्रेगनेंट हूँ। और मुझे डर है… यह बच्चा…”
उसने अपना सिर दीवार पर जोर से मारा। एक बार, दो बार। मैं उठी और उसे रोका। “नहीं! ऐसा मत करो!”
अगली सुबह, तूफान टूट पड़ा। अहमद ने अपने पिता को ड्राइंग रूम में बुलाया। आंटी जीनत भी वहाँ थीं। मैं काँपती हुई एक कुर्सी पर बैठी थी। अहमद ने सीधे पूछा, “अब्बू, ज़ैनब पर तुमने जोरदस्ती की है। सच बताओ।”
चाचू जान का चेहरा एक पल के लिए हैरान हुआ, फिर उस पर एक ठंडी, शैतानी मुस्कान आ गई। “क्या बकवास है? इस औरत ने तुम्हारे दिमाग में क्या भर दिया है? वह मुझ पर आरोप लगा रही है? मैंने तो उसे हमेशा बेटी की तरह देखा। शायद उसे किसी और से प्यार हो गया है, और अब मुझ पर दोष मढ़ रही है।”
“झूठ!” मैं चीख पड़ी। मेरे आँसू फिर से बहने लगे। “तुमने मुझे रेप किया! उस दिन जब अहमद ऑफिस गया था!”
आंटी जीनत का चेहरा पीला पड़ गया। “यह क्या बातें हो रही हैं? ऐसा नहीं हो सकता…”
“देखो जीनत,” चाचू जान ने अपनी पत्नी की ओर रुख किया। “यह नई लड़कियाँ होती हैं। शहर की पढ़ी-लिखी। इनका दिमाग फिल्मों जैसा होता है। मैं एक बुजुर्ग आदमी हूँ। मैं ऐसा कैसे कर सकता हूँ?”
अहमद ने अपने पिता की ओर कदम बढ़ाया। उसकी आँखों में एक ऐसा जुनून था जो मैंने पहले कभी नहीं देखा था। “अब्बू, मैं ज़ैनब को जानता हूँ। वह झूठ नहीं बोल सकती। और तुम… तुम्हारे व्यवहार में मैंने भी कुछ अजीब बातें देखी हैं। तुम हमेशा उसके आस-पास रहते हो। तुम्हारी नज़रें… मैंने अनदेखा किया क्योंकि मैं तुम पर विश्वास करना चाहता था। लेकिन अब नहीं।”
झगड़ा बढ़ता गया। आवाज़ें ऊँची होती गईं। चाचू जान ने मुझे गालियाँ देनी शुरू कर दीं। “वेश्या! चरित्रहीन! तू ही मुझे लुभाती थी!”
अचानक अहमद ने अपने पिता के गले पर हाथ बढ़ाया। उसे दीवार से दबोच दिया। “तुम्हारा मुँह बंद करो! मेरी बीवी के बारे में एक शब्द और!”
आंटी जीनत चिल्लाई। मैं अहमद को पीछे खींचने लगी। “अहमद! नहीं! ऐसा मत करो!”
अहमद ने हाथ छोड़ दिया। चाचू जान हाँफने लगा। कमरे में सन्नाटा छा गया।
उसी पल, मैंने फैसला किया। मैंने सबकी ओर देखा। अपने ससुर के घृणित चेहरे पर। अपनी सास के भयभीत चेहरे पर। और अपने पति के टूटे हुए, गुस्से से भरे चेहरे पर।
मैंने कहा, मेरी आवाज़ अब स्पष्ट और ठोस थी। “मैं यहाँ एक पल और नहीं रह सकती। मैं इस घर को छोड़ रही हूँ।”
अहमद ने मेरी ओर देखा। “ज़ैनब… कहाँ जाओगी?”
“मैं अपने मायके जाऊँगी। और फिर… मैं नहीं जानती। लेकिन मैं तुम्हारी बीवी के रूप में नहीं लौट सकती। न इस घर में, न तुम्हारे साथ।”
आंटी जीनत रो पड़ीं। “बेटा… माफ़ कर दो… हम…”
“माफ़ी नहीं हो सकती आंटी,” मैंने कहा। “यह जो हुआ, उसे माफ़ नहीं किया जा सकता।”
मैं अपने कमरे में गई और एक छोटा सूटकेस भरा। बस ज़रूरी कपड़े, कुछ दस्तावेज़। अहमद दरवाज़े पर खड़ा था। उसकी आँखों में एक असहाय पीड़ा थी।
“ज़ैनब… मैं… मुझे माफ़ कर दो। मैंने तुम पर विश्वास नहीं किया। मैं तुम्हारा पति था, और मैंने तुम्हें सुरक्षा नहीं दी।”
मेरे आँसू फिर से आ गए। “तुम भी एक पीड़ित हो अहमद। तुम्हारा विश्वास टूट गया है। लेकिन मैं… मैं अब और नहीं रह सकती। हर कोने में उसकी याद है। हर साँस में उसकी बदबू। मुझे जाना होगा।”
मैंने सूटकेस उठाया और बाहर निकलने लगी। चाचू जान अभी भी ड्राइंग रूम में खड़ा था, लेकिन अब उसके चेहरे पर अहंकार नहीं, एक खोखली हार थी। पूरे घर की इज्जत धूल में मिल चुकी थी।
“तुम्हारे खिलाफ एफआईआर दर्ज कराऊँगी,” मैंने उसकी ओर मुड़कर कहा। “चाहे समाज कुछ भी कहे।”
मैं बाहर निकली। लखनऊ की सुबह की हवा में अभी भी गुलाब की खुशबू थी। लेकिन अब वह खुशबू मुझे बीती हुई एक सुंदर याद की तरह लगी, जो कभी वापस नहीं आएगी।
मैंने ऑटो रोका और अपने मायके का पता बताया। जैसे ही ऑटो चला, मैंने पीछे मुड़कर देखा। वह हवेली, जो एक सपने का घर था, अब एक कोल्ड, साइलेंट प्रिजन लग रही थी।
मैं जानती थी कि आगे का रास्ता आसान नहीं होगा। पुलिस, कानून, समाज की टिप्पणियाँ, गर्भ में पल रहा वह बच्चा… सब कुछ एक लंबी लड़ाई थी। लेकिन पहली बार, उस रात के बाद पहली बार, मैंने अपने अंदर एक किरण महसूस की। डर की नहीं। बल्कि एक ठंडे, दृढ़ संकल्प की। मैं ज़ैनब थी। और मैं जीतूँगी।
