परीक्षा में पास करने के बदले प्रोफेसर द्वारा शारीरिक संबंध बनाने की मांग।

मेरा नाम मीरा जोशी है और यह कहानी उस दिन से शुरू होती है जब मेरी दुनिया उलट गई। फाइनल ईयर की परीक्षाएं खत्म हुई थीं, एक महीने की छुट्टी बिताकर हम सब रिजल्ट का इंतज़ार कर रहे थे। मैंने बी.ए. के अपने आखिरी सेमेस्टर में पूरी मेहनत की थी। सुबह से लेकर रात तक पुस्तकालय में बैठकर पढ़ाई, नोट्स बनाना, ग्रुप स्टडी… सब कुछ। खासकर ‘आधुनिक भारतीय इतिहास’ जो प्रोफेसर अविनाश कांबले लेते थे, उसमें मैंने खास ध्यान दिया था। वह विषय कठिन था और प्रोफेसर कांबले की प्रतिष्ठा बहुत सख्त और निर्मम परीक्षक के रूप में थी। लेकिन मैं आश्वस्त थी। मेरे टर्म पेपर बेहतरीन आए थे, प्रेजेंटेशन भी उन्होंने सराहा था।

रिजल्ट आने वाला था और मैं अपने हॉस्टल रूम में लैपटॉप के सामने बैठी, दिल तेज़ी से धड़क रहा था। जैसे ही पेज रिफ्रेश हुआ, मैंने अपना रोल नंबर डाला। ग्रेड कॉलम देखा… और सांस रुक गई। बाकी सभी विषयों में ‘ए’ था, लेकिन ‘आधुनिक भारतीय इतिहास’ के आगे लाल अक्षरों में ‘एफ’ लिखा हुआ था। फेल। मेरी आँखें उस एक शब्द पर चिपक गईं। यह गलती हो सकती है, ऑनलाइन गड़बड़… कुछ भी। मैंने पेज को बार-बार रिफ्रेश किया, लेकिन वही नतीजा। एक ठंडी सिहरन मेरी रीढ़ से होकर गुज़री। मेरा करियर, मेरी मेहनत, मेरे माता-पिता की आशाएं… सब इस एक ‘एफ’ पर टिकी थीं। बिना इस विषय में पास हुए मेरी डिग्री अधूरी रह जाती।

मैं स्तब्ध थी। आँसू नहीं आए, गुस्सा नहीं आया… बस एक गहरी, खाली सुन्नता। मैं उठी, कमरे में टहलने लगी। नहीं, यह हो ही नहीं सकता। मेरा पेपर बेहतरीन था। मुझे यकीन था। मैंने तय किया कि मुझे प्रोफेसर कांबले से मिलकर अपने मार्क्स की समीक्षा करवानी होगी। यही प्रक्रिया है। शायद कोई तकनीकी गलती हुई हो।

अगले दिन सुबह, मैंने उन्हें ईमेल किया। उनका जवाब संक्षिप्त और औपचारिक था: “दोपहर तीन बजे मेरे केबिन में आ जाइए।” पुणे विश्वविद्यालय का इतिहास विभाग एक पुरानी, गंभीर दिखने वाली इमारत में है। प्रोफेसर कांबले का केबिन दूसरी मंजिल पर, गलियारे के अंत में था। दरवाज़े पर उनका नाम पीतल की पट्टिका पर खुदा हुआ था। मैंने दरवाज़ा खटखटाया।

“अंदर आइए।” आवाज़ सख्त थी।

मैं अंदर गई। केबिन बड़ा नहीं था, लेकिन किताबों से भरा हुआ था। हवा में पुरानी किताबों और धूल की गंध थी। प्रोफेसर अविनाश कांबले अपने डेस्क पर बैठे थे, चश्मे के पीछे से मेरी ओर देख रहे थे। वह चालीस के आसपास के रहेंगे, लेकिन उनके चेहरे पर एक थकी हुई, कड़वाहट भरी झुर्रियाँ थीं। उनके बाल पतले हो रहे थे, और उनकी पोशाक – एक सादी सफेद कमीज और ग्रे पैंट – उनके अलग-थलग, निराश व्यक्तित्व को दर्शाती थी। वह आकर्षक नहीं थे, बल्कि उनकी उपस्थिति में एक दबाव था, एक ऐसा अहंकार जो उनकी आँखों की ठंडक से टपकता था।

“बैठिए, मीरा,” उन्होंने कहा, मेरे प्रवेश पर कोई खास प्रतिक्रिया दिए बिना।

मैंने उनके सामने रखी कुर्सी पर बैठी। “सर, मैं अपने मार्क्स के बारे में… आधुनिक भारतीय इतिहास के बारे में बात करना चाहती हूँ। मुझे लगता है कि कोई गलती हुई है। मैं फेल नहीं हो सकती।”

उन्होंने एक फाइल निकाली, जिस पर मेरा रोल नंबर लिखा था। “कोई गलती नहीं हुई है, मीरा। आपका उत्तर पुस्तिका पूरी तरह से अपर्याप्त थी। आपने मुख्य तथ्यों को नज़रअंदाज़ किया, विश्लेषण सतही था।”

“लेकिन सर, मेरे टर्म पेपर और प्रेजेंटेशन—”

“टर्म पेपर और प्रेजेंटेशन अलग चीजें हैं,” उन्होंने मेरी बात काट दी। उनकी आवाज़ में एक खास तीखापन था। “फाइनल परीक्षा ही वह जगह है जहाँ आपको अपनी योग्यता साबित करनी होती है। और आपने ऐसा नहीं किया।”

मैंने अपनी मुट्ठी बाँध ली। नाखून हथेली में घुस रहे थे। “क्या मैं अपनी उत्तर पुस्तिका देख सकती हूँ? मैं समझना चाहती हूँ कि कहाँ कमी रह गई।”

वह कुछ पल चुप रहे, मेरे चेहरे का अध्ययन करते हुए। फिर वह धीरे से मुस्कुराए, लेकिन यह मुस्कान उनकी आँखों तक नहीं पहुँची। “देख सकती हैं। लेकिन यह कुछ नहीं बदलेगा। ग्रेड फाइनल है।”

“तो मुझे पूरा सेमेस्टर दोबारा देना होगा?” मेरी आवाज़ काँप रही थी। “मेरी प्लेसमेंट हो चुकी है, सर। एक अच्छी कंपनी में। अगर मेरी डिग्री नहीं मिली तो…”

“हाँ, यह एक समस्या है,” उन्होंने कहा, अपनी कुर्सी पर पीछे झुकते हुए। उनकी नज़र मेरे चेहरे से होते हुए मेरे शरीर पर घूमने लगी। मैंने उस दिन साधारण जींस और एक फुल-स्लीव टी-शर्ट पहनी थी, लेकिन उनकी नज़र ऐसे थी जैसे वह कपड़ों के पार देख रहे हों। मुझे एक अजीब सी असहजता महसूस हुई।

“समस्याओं का हमेशा कोई न कोई समाधान होता है, मीरा,” उन्होंने धीमी, खिंचाव भरी आवाज़ में कहा।

“समाधान? क्या समाधान?” मैंने पूछा, एक आशा की किरण दिल में उठते हुए।

वह फिर से चुप रहे। केबिन में सन्नाटा था, सिर्फ पंखे की घूर्णन की आवाज़। फिर वह आगे झुके, अपनी कोहनियाँ डेस्क पर टिकाते हुए। “तुम एक बहुत ही सुंदर लड़की हो, मीरा। बुद्धिमान भी। लेकिन कभी-कभी बुद्धि से ज़्यादा… व्यावहारिकता काम आती है।”

मेरी समझ में कुछ नहीं आ रहा था। “सर?”

“मैं तुम्हारा ग्रेड बदल सकता हूँ। ‘एफ’ की जगह ‘बी’ या शायद ‘ए’ भी दे सकता हूँ। एक आंतरिक समीक्षा करवा सकता हूँ। लेकिन इसके लिए… कुछ तो चाहिए।”

“कुछ चाहिए?” मैंने धीरे से दोहराया। और तभी, उनकी आँखों में छिपे इरादे को देखकर, मुझे सब समझ में आ गया। एक झटके सा लगा, जैसे पेट पर मुक्का पड़ा हो। मेरे कानों में खनखनाहट सी होने लगी।

“एकान्त… intimacy,” उन्होंने सीधे शब्दों में कहा। “तुम और मैं। यहाँ और अभी। बदले में, तुम पास। तुम्हारा करियर बच जाएगा।”

मैं स्तब्ध रह गई। मेरे मुँह से आवाज़ नहीं निकल रही थी। यह वह बात नहीं थी जिसकी मैंने कल्पना की थी। यह भ्रष्टाचार, रिश्वत… लेकिन इतना सीधा, इतना घिनौना? मेरी नज़र उनके चेहरे पर जमी रही, जो अब पूरी तरह से एक लालची, शक्ति से मदमस्त शिकारी की तरह दिख रहा था। उनके होंठों के कोने फड़क रहे थे।

“तुम… तुम ऐसा नहीं कर सकते,” मैंने फुसफुसाते हुए कहा, मेरी आवाज़ हिल रही थी।

“ओह, मैं कर सकता हूँ,” उन्होंने कहा, उनकी आवाज़ में अब कोई छिपाव नहीं था, बस एक ठंडी निश्चितता। “और तुम जानती हो कि मैं कर सकता हूँ। देखो, मीरा। जीवन सौदेबाजी है। तुम्हारे पास कुछ है जो मुझे चाहिए। मेरे पास कुछ है जो तुम्हें चाहिए। यह इतना सरल है।”

मैं उठ खड़ी हुई, कुर्सी पीछे सरक गई। “यह गलत है। यह अनैतिक है। मैं… मैं शिकायत करूँगी।”

वह हँसे, एक खोखली, बेसुरी हँसी। “किससे? किस आधार पर? मेरे खिलाफ तुम्हारा कोई सबूत नहीं है। तुम्हारा ‘एफ’ ग्रेड पूरी तरह से औपचारिक है। तुम शिकायत करोगी, और तुम न केवल इस विश्वविद्यालय से, बल्कि हर विश्वविद्यालय से बाहर हो जाओगी। तुम्हारा नाम काली सूची में डाल दिया जाएगा। कौन एक फेल छात्रा की बात मानेगा जो अपने प्रोफेसर पर झूठे आरोप लगा रही है?”

उनकी हर बात मेरे दिल में एक खंजर की तरह घुस रही थी। वह सही थे। यह मेरे खिलाफ था। मेरा करियर, मेरी मेहनत, मेरे माता-पिता का सपना… सब कुछ इस आदमी की लालसा पर टिका था। एक गहरा सदमा मुझे जकड़ रहा था, लेकिन उसके साथ ही एक धधकती हुई गुस्से की लहर भी। मैंने अपने आप को संभाला।

“मुझे जाने दीजिए,” मैंने कहा, मेरी आवाज़ अब ठोस थी, हालाँकि अंदर से मैं बिखर रही थी।

“ज़रूर,” उन्होंने कहा, हाथ के इशारे से दरवाज़े की ओर इशारा करते हुए। “लेकिन याद रखना, यह प्रस्ताव हमेशा के लिए नहीं है। रिजल्ट फाइनल होने में दो दिन बाकी हैं। उसके बाद, कुछ नहीं बदला जा सकता। तुम्हारे पास सोचने के लिए चौबीस घंटे हैं।”

मैं बिना पीछे मुड़े देखे केबिन से निकल आई। गलियारे की हवा ठंडी लगी। मैं सीधे छात्रावार की ओर चल पड़ी, लेकिन कदम लड़खड़ा रहे थे। मेरे दिमाग में तूफान मचा हुआ था। वह विकल्प… उस घिनौने प्रस्ताव और अपने पूरे भविष्य के विनाश के बीच।

मैं अपने कमरे में पहुँची और दरवाज़ा बंद करके खुद को दीवार से सटा लिया। आँसू अब छलक पड़े। गुस्सा, अपमान, डर… सब कुछ एक साथ उमड़ पड़ा। मैंने सोचा अपने माता-पिता के बारे में, जो एक छोटे से शहर से थे, जिन्होंने मेरी पढ़ाई के लिए हर कठिनाई झेली थी। मैंने सोचा उस प्लेसमेंट के बारे में, जो मुझे मिली थी, एक प्रतिष्ठित कंपनी में। सब कुछ धूमिल होता दिख रहा था।

पूरी रात मैं जागती रही। एक तरफ, मेरी नैतिकता, मेरा स्वाभिमान चीख-चीखकर मना कर रहा था। दूसरी तरफ, एक ठंडी, व्यावहारिक आवाज़ मेरे दिमाग में गूँज रही थी – “बस एक बार। एक छोटी सी कीमत। फिर सब कुछ ठीक हो जाएगा। तुम्हारा जीवन बच जाएगा।” लेकिन क्या यह सचमुच ‘बस एक बार’ होगा? क्या वह मुझे बाद में भी नहीं दबोचेगा? क्या मैं खुद को कभी माफ़ कर पाऊँगी?

अगले दिन सुबह, मैं एक निर्णय पर पहुँच चुकी थी। लेकिन वह निर्णय वह नहीं था जो प्रोफेसर कांबले ने सोचा होगा। गुस्से ने सदमे और डर को जीत लिया था। लेकिन यह एक ठंडा, नियोजित गुस्सा था। मैं उनकी शर्तों पर नहीं, बल्कि अपनी शर्तों पर लड़ूँगी।

मैंने उन्हें एक संक्षिप्त ईमेल लिखा: “मैं आपका प्रस्ताव स्वीकार करती हूँ। आज रात आठ बजे, आपके केबिन में। कृपया यह सुनिश्चित करें कि कोई न हो।”

उनका जवाब तुरंत आया: “समझ गया।”

पूरा दिन मैं एक अजीब शांति में बिताया। मैंने अपने सबसे अच्छे कपड़े पहने – एक काले रंग की बॉडीकॉन ड्रेस जो मेरे curves को उभारती थी, ऊँची एड़ी के सैंडल। मैंने अपने बालों को खुला छोड़ा, हल्का मेकअप किया। मैं खुद को एक हथियार की तरह तैयार कर रही थी। मेरे अंदर एक खतरनाक निश्चय था। वह मुझे एक शिकार समझता था। मैं उसे दिखाऊँगी कि शिकार कैसे शिकारी बन सकता है।

रात आठ बजे, विभाग की इमारत सुनसान थी। सिर्फ रात के रक्षक का कमरा रोशनी दिखा रहा था। मैं सीधे दूसरी मंजिल पर गई। प्रोफेसर कांबले का केबिन बंद था। मैंने दरवाज़ा खटखटाया।

दरवाज़ा खुला और वह वहाँ खड़ा था, साधारण कपड़ों में, लेकिन उसकी आँखों में एक ज्वलंत लालसा थी जो पूरे चेहरे को रोशन कर रही थी। उसने मुझे ऊपर से नीचे तक देखा, और मैंने उसके गले का एक पुलक देखा।

“अंदर आओ,” उसने कहा, आवाज़ में एक खरखराहट थी।

मैं अंदर गई। उसने दरवाज़ा बंद किया और ताला लगा दिया। केबिन में सिर्फ एक टेबल लैंप जल रहा था, जिससे नरम, अर्ध-अंधेरी रोशनी फैल रही थी। हवा में उसके कोलोन की तेज़ गंध थी।

“तुम… तुम सुंदर लग रही हो,” उसने कहा, एक कदम आगे बढ़ते हुए।

मैंने कोई जवाब नहीं दिया। मैं डेस्क के पास खड़ी रही, अपनी पीठ उसकी ओर करके। मैंने अपने पर्स को डेस्क पर रख दिया।

“शर्मा रही हो?” उसने पूछा, उसकी आवाज़ करीब आ रही थी। मैं उसकी सांस अपनी गर्दन पर महसूस कर सकती थी। “चिंता मत करो। यह जल्दी में नहीं होगा। हमें… आनंद लेना चाहिए।”

उसने अपना हाथ मेरे कंधे पर रखा। उसका स्पर्श जलन पैदा कर रहा था। मैंने साँस रोक ली।

“पहले… ग्रेड,” मैंने कहा, मेरी आवाज़ स्थिर थी। “पहले आप मुझे दिखाएँ कि आपने इसे बदल दिया है।”

वह हँसा। “विश्वास नहीं है? ठीक है।” वह अपने कंप्यूटर की ओर मुड़ा, स्क्रीन चालू की। “देखो। मैंने पहले ही इंटरनल रिव्यू का अनुरोध कर दिया है। तुम्हारा ग्रेड ‘ए’ में बदल जाएगा। आधिकारिक रूप से कल सुबह तक।”

मैंने स्क्रीन पर देखा। वहाँ एक फॉर्म था, उसके डिजिटल हस्ताक्षर के साथ। यह वास्तविक लग रहा था। मेरा दिल जोरों से धड़क रहा था। अब वह समय था।

उसने मेरी ओर मुड़कर मुझे देखा, उसकी आँखों में विजय की चमक। “अब… मेरी बारी।”

उसने अपना हाथ फिर से मेरे कंधे पर रखा, और फिर नीचे सरकाते हुए मेरी पीठ पर। उसकी उंगलियाँ मेरे स्पाइन के साथ नीचे की ओर चलीं। मैंने अपनी आँखें बंद कर लीं, अपने आप को उस स्पर्श के लिए तैयार किया जो आने वाला था।

“तुम्हारी त्वचा बहुत मुलायम है,” उसने फुसफुसाया। उसने अपना दूसरा हाथ आगे बढ़ाया और मेरे पेट पर रख दिया, मुझे अपनी ओर खींचते हुए। मेरी पीठ अब उसकी छाती से सटी हुई थी। मैं उसकी सांसों की गर्मी और उसके शरीर की कठोरता महसूस कर सकती थी।

उसने अपना सिर झुकाया और अपने होंठ मेरी गर्दन पर रख दिए। एक ठंडा चुंबन। फिर उसकी जीभ ने मेरी त्वचा को चाटा। मैंने अपने आप को कठोर कर लिया, अपनी मुट्ठियाँ बाँध लीं।

“आराम करो, मीरा,” उसने कहा, उसके हाथ मेरे पेट से ऊपर सरकते हुए मेरे स्तनों तक पहुँचे। उसने उन्हें अपनी हथेलियों से ढँक लिया, धीरे से दबाया। “तुम्हारे चूचे… इतने कड़े हैं। तुम उत्तेजित हो, है ना?”

मैं चुप रही। उसने मेरे स्तनों को मसलना शुरू कर दिया, उंगलियों से निपल्स को दबाते और घुमाते हुए। एक अजीब सी उत्तेजना मेरे शरीर में फैलने लगी, मेरी नफरत के बावजूद। मेरा शरीर प्रतिक्रिया दे रहा था, और मुझे उस पर गुस्सा आ रहा था।

उसने मुझे धीरे से घुमाया, अब मेरा सामना उससे था। उसकी आँखें चमक रही थीं। उसने अपना हाथ मेरे जबड़े के नीचे रखा, मेरा चेहरा ऊपर उठाया। “मुझे चूमो,” उसने आदेश दिया।

मैंने उसकी आँखों में देखा। और फिर, मैंने वह किया जो मैंने योजना बनाई थी। मैंने एक नरम, आज्ञाकारी मुस्कान बनाई, और अपने होंठ उसकी ओर बढ़ाए। उसने तुरंत जवाब दिया, उसके होंठ मेरे होंठों से जुड़ गए, जबरदस्ती अपनी जीभ मेरे मुँह में घुसेड़ते हुए। यह चुंबन आक्रामक, दावेदारी भरा था। मैंने उसे जवाब दिया, अपनी जीभ उसकी जीभ से लड़ते हुए। मैंने अपने हाथ उसकी पीठ पर रखे, उसे और करीब खींचा।

मेरी प्रतिक्रिया से वह और उत्तेजित हो गया। उसने अपने हाथों से मेरे स्तनों को फिर से पकड़ा, ज़ोर से दबाया। “तुम्हारे स्तन मुझे पागल कर देते हैं,” उसने कराहते हुए कहा, अपना मुँह मेरी गर्दन पर दबाते हुए। उसने मेरे ड्रेस का स्ट्रैप नीचे खिसकाया, और फिर दूसरा। ड्रेस का ऊपरी हिस्सा मेरे कमर तक लटक गया। उसने मेरे ब्रा को भी नीचे धकेल दिया, और मेरे स्तन बाहर आ गए।

उसने एक लंबी सांस ली, उन्हें देखते हुए। फिर उसने अपना मुँह नीचे किया और एक निपल को अपने मुँह में ले लिया। उसने जोर से चूसा, दांतों से काटा। एक तीखा दर्द, मिश्रित एक गहरी, शारीरिक सनसनी। मैंने एक आह भरी, अनैच्छिक रूप से। उसने दूसरे स्तन के साथ भी ऐसा ही किया, अपने हाथों से मेरे नितंबों को पकड़ते हुए, उन्हें ज़ोर से दबाते हुए।

“मैं तुम्हें चोदना चाहता हूँ, मीरा,” उसने मेरे कान में गुर्राते हुए कहा। “तुम्हें पता है न? तुम्हें पता है कि तुम मेरी हो?”

मैंने अपनी आँखें बंद कर लीं। “हाँ,” मैंने फुसफुसाया। “मैं तुम्हारी हूँ। बस… बिस्तर पर। यहाँ डेस्क पर नहीं।”

उसने मुझे देखा, एक संदिग्ध चमक उसकी आँखों में थी। फिर उसने मुस्कुराया। “ठीक है।” केबिन के एक कोने में एक छोटा सा सोफा था, जिसे अक्सर विस्तारित किया जा सकता था। उसने मुझे वहाँ की ओर धकेला। “लेट जाओ।”

मैं सोफे पर लेट गई। उसने तेज़ी से अपनी पैंट और अंडरवियर उतार दी। उसका लंड पहले से ही कड़ा और तनावपूर्ण था। वह मेरे ऊपर आ गया, अपने घुटनों के बल मेरी जांघों के बीच। उसने मेरी ड्रेस को पूरी तरह से नीचे खींच दिया, और मेरी अंडरवियर भी फाड़ डाली। अब मैं पूरी तरह नग्न थी, उसकी नज़रों के सामने।

“फैलाओ,” उसने आदेश दिया, मेरी जांघों को पकड़कर।

मैंने अपने पैर फैलाए। वह अपने हाथ से अपने लंड को पकड़ा और उसे मेरी योनि के खिलने पर रगड़ने लगा। मैं गीली थी, मेरे शरीर की विश्वासघाती प्रतिक्रिया के कारण। उसने एक गहरी सांस ली।

“तैयार हो?” उसने पूछा।

मैंने सिर हिलाया। और फिर, वह अंदर घुस गया। एक तीखा, भरने वाला दर्द, क्योंकि वह बिना किसी और तैयारी के जोर से अंदर धंस गया। मैंने एक चीख निकाली, जो उसके मुँह में दब गई क्योंकि उसने फिर से मेरे होंठों पर अपना मुँह रख दिया।

वह तेज़ी से चलने लगा, एक लयबद्ध, आक्रामक गति। सोफा उसके वजन के नीचे चरचरा रहा था। उसकी सांसें भारी थीं, और वह मेरे कान में गंदी बातें फुसफुसा रहा था। “हाँ… ऐसे ही… तुम्हारी चूत तो मेरे लिए बनी है… मैं तुम्हें हमेशा चोदता रहूँगा…”

मैंने अपने हाथ उसकी पीठ पर रखे, अपने नाखूनों को उसकी त्वचा में घोंपते हुए। मैं उसके साथ तालमेल बिठाने लगी, अपनी कूल्हों को उसकी गति के साथ उठाते हुए। यह उसे और उत्तेजित कर रहा था। उसकी गति और तेज़ हो गई।

“मैं… मैं निकलने वाला हूँ,” उसने कराहा।

“अंदर,” मैंने फुसफुसाया, उसके कान के पास। “मेरे अंदर निकलो। मुझे अपना वीर्य दो।”

यह उसके लिए अंतिम उत्तेजना थी। उसने एक गहरी गुर्राहट निकाली और मुझमें एक तीव्र झटके के साथ स्खलन कर दिया। मैं उसकी गर्मी महसूस कर सकती थी। वह मेरे ऊपर ढेर हो गया, सांस फूल रही थी।

कुछ पलों तक वह वैसे ही पड़ा रहा। फिर उसने अपना सिर उठाया, एक संतुष्ट, थका हुआ मुस्कान उसके चेहरे पर थी। “शाबाश,” उसने कहा। “तुमने अच्छा किया। तुम्हारा ग्रेड कल ‘ए’ हो जाएगा।”

मैंने मुस्कुराया, एक मीठा, आज्ञाकारी मुस्कान। “धन्यवाद, सर।”

उसने खुद को मुझसे अलग किया और अपने कपड़े पहनने लगा। मैं भी उठी, धीरे-धीरे अपने कपड़े इकट्ठे किए। मैंने अपनी ड्रेस फिर से पहनी, टूटी हुई अंडरवियर को अपने पर्स में रख लिया।

“तुम जा सकती हो,” उसने कहा, अब व्यवसायिक स्वर में। “याद रखना, यह हमारे बीच का रहस्य है।”

“बिल्कुल,” मैंने कहा। मैंने अपना पर्स उठाया, और उसके अंदर, मेरे फोन का रिकॉर्ड बटन दबा हुआ था। पूरी बातचीत, उसका प्रस्ताव, उसकी गंदी बातें, सब कुछ… सब कुछ रिकॉर्ड हो चुका था। मैंने केबिन से बाहर कदम रखा, बिना पीछे मुड़े देखे।

अगले दिन, मैंने सीधे विश्वविद्यालय के कुलपति के कार्यालय का रुख किया, अपने साथ ऑडियो रिकॉर्डिंग की एक प्रति और प्रोफेसर कांबले के कंप्यूटर स्क्रीन की एक छिपकर ली गई तस्वीर लेकर, जिसमें मेरा ग्रेड बदलता दिख रहा था। मैंने एक औपचारिक शिकायत दर्ज कराई।

एक सप्ताह के भीतर, अविनाश कांबले को निलंबित कर दिया गया। एक महीने के भीतर, उनकी नौकरी चली गई और उन पर यौन उत्पीड़न और भ्रष्टाचार के मामले दर्ज हुए। मेरा ग्रेड स्थायी रूप से ‘ए’ में बदल दिया गया, एक नए प्रोफेसर द्वारा निष्पक्ष समीक्षा के बाद।

मैंने स्नातक की उपाधि प्राप्त की, और मेरी प्लेस्मेंट सुरक्षित रही। लेकिन उस रात की यादें मेरे साथ चिपकी रहीं। नफरत और विजय की यादें। मैंने खुद को एक कीमत पर बचाया था, लेकिन यह कीमत मेरी नैतिकता नहीं, बल्कि एक भ्रष्ट आदमी का भविष्य थी। कभी-कभी, रात को सोते समय, मैं उसके हाथों के स्पर्श को महसूस करती हूँ, उसकी गुर्राहट सुनती हूँ। और फिर मैं उस रिकॉर्डिंग को सुनती हूँ, और उसकी आवाज़ में डर सुनती हूँ जब उसे पता चला कि उसका करियर खत्म हो गया है। और मैं मुस्कुराती हूँ।

जीवन सौदेबाजी है। और इस सौदे में, मैं हारी नहीं।