अधूरी यात्रा, अनजान आदमी और मंदाकिनी के किनारे खोया हुआ कामुक सपना

मेरा नाम विराजिका है। मेरी शादी को सात साल हो चुके थे। मैं अपने पति के साथ कानपुर में रहती थी, लेकिन उस साल सावन में मुझे कुछ दिनों के लिए चित्रकूट जाना पड़ा। मेरे पति की नौकरी की व्यस्तता के कारण वह मेरे साथ नहीं आ सके। मेरे लिए यह यात्रा बस कुछ दिनों की शांति पाने का बहाना थी, लेकिन जो हुआ, वह कुछ और ही था। मेरी ज़िंदगी का वो पन्ना, जिस पर मैंने कभी कल्पना भी नहीं की थी।

चित्रकूट पहुँचने के बाद मैंने एक छोटा-सा गेस्टहाउस लिया। तीसरे दिन शाम को मैं मंदाकिनी के किनारे बैठी थी। तभी मेरी नजर एक आदमी पर पड़ी, जो कुछ दूरी पर अकेला खड़ा नदी को देख रहा था। उसने हल्के भूरे रंग का कुर्ता पहना था और हाथ में पुरानी किताब थी। वह लंबा था, उसके कंधे चौड़े थे और आँखें गहरी, जैसे किसी कवि की। वह मेरी ओर लगातार नहीं देख रहा था, लेकिन जब भी मेरी नजर उसकी तरफ जाती, हमारी आँखें अचानक मिल जातीं। वह मुस्कुराता नहीं था, बस देखता रहता। मेरे अंदर एक अजीब सी झुरझुरी होने लगी।

कुछ देर बाद वह मेरे पास से गुजरते हुए रुक गया। “यहाँ पहली बार आई हैं?” उसने पूछा। उसकी आवाज़ में एक गहराई थी, जो सीधे मेरे कानों में उतर गई। मैंने सिर हिलाया। “हाँ।” “मैं भी अकेला आया हूँ।” बात इतनी साधारण थी, लेकिन उसके बोलने के तरीके में कुछ ऐसा था जिसने मुझे असहज करने के बजाय उत्सुक कर दिया। मैंने अपने आप को सँभाला। मैंने एक शादीशुदा औरत थी, लेकिन उस पल मेरी नज़रें उसके होंठों पर टिक गईं, जो धीरे से हिल रहे थे।

उसका नाम ऋत्विज था। वह ललितपुर में रहता था और अपने काम से संबंधित यात्रा के बीच चित्रकूट आया था। बातचीत धीरे-धीरे आगे बढ़ी। हमें पता चला कि हम दोनों शादीशुदा थे। यह जानने के बाद भी हमारे बीच की सहजता खत्म नहीं हुई। उल्टा, एक गुप्त रोमांच का अहसास हुआ। मैंने उसके हाथ देखे—लंबी उँगलियाँ, नाखून साफ। मेरे मन में ख्याल आया कि वे उँगलियाँ कैसी होंगी अगर वो मेरे शरीर पर चलें। मैंने अपने आप को झटका दिया। ये ख्याल कहाँ से आ रहे थे?

अगले दिन हम फिर उसी घाट पर मिले। इस बार मुझे लगा कि मैं वहाँ संयोग से नहीं आई थी। ऋत्विज ने पूछा, “कल रात आपने मेरे बारे में सोचा था?” मैंने तुरंत उसकी ओर देखा। सवाल सीधा था और शायद जरूरत से ज्यादा व्यक्तिगत भी। मेरे गाल गरम हो गए। मैंने मुस्कुराकर कहा, “शायद।” उसकी आँखों में एक हल्की चमक आई। “मैंने भी सोचा था,” उसने कहा। “आपके बालों के बारे में, जो हवा में लहरा रहे थे।” उसकी बात सुनकर मेरे शरीर में एक सिहरन दौड़ गई। उसके बाद हमारी बातचीत में एक अनकहा तनाव आ गया। वह मेरे बहुत करीब नहीं आता था, लेकिन उसकी मौजूदगी मुझे लगातार महसूस होती थी। जब वह बोलता, मैं उसके चेहरे की तरफ देखने लगती। जब वह चुप होता, तब भी मेरा ध्यान उसी पर रहता।

तीसरे दिन बारिश शुरू हो गई। हम दोनों मंदिर के पास बने पुराने बरामदे में खड़े थे। बाहर तेज बारिश थी और भीतर अजीब-सी खामोशी। ऋत्विज ने धीरे से कहा, “अगर हम दोनों अकेले होते, बिना किसी रिश्ते के… तो क्या आप मुझे जानना चाहतीं?” मैंने उत्तर देने में कुछ पल लगाए। मेरा दिल तेज़ी से धड़क रहा था। “शायद इसलिए तो यह सवाल खतरनाक है।” वह मुस्कुराया। उसकी नज़रें मेरे होंठों पर टिक गईं। मैंने महसूस किया कि मेरे स्तन भारी हो रहे हैं, मेरे निप्पल सख्त हो गए थे। मैंने अपनी साड़ी के पल्लू को थोड़ा सा खींचा, लेकिन उसकी नज़रें वहीं रुकी रहीं। “तुम्हारी आँखें बहुत कुछ कहती हैं,” उसने फुसफुसाया। मैं चुप रही। मैं जानती थी कि अगर मैं बोली, तो शायद वो शब्द निकल ही जाएँ जो नहीं निकलने चाहिए।

उस शाम हमने एक-दूसरे को छुआ तक नहीं। लेकिन जब मैं अपने कमरे में लौटी, मुझे पहली बार महसूस हुआ कि किसी अजनबी की केवल नजरें भी इंसान के भीतर कितना गहरा हलचल पैदा कर सकती हैं। मैंने अपने कपड़े उतारे और शीशे के सामने खड़ी हो गई। मैंने अपने स्तनों को देखा, मेरे निप्पल अभी भी सख्त थे। मैंने उन्हें हल्के से सहलाया और एक ठंडी साँस ली। मेरे मन में बस एक ही ख्याल था—ऋत्विज। उसके हाथ, उसकी आँखें, उसकी आवाज़।

अगली सुबह मैं चित्रकूट छोड़कर चली गई। हमने कोई वादा नहीं किया। कोई नंबर नहीं लिया। लेकिन आज भी कभी सावन की बारिश होती है, तो मुझे मंदाकिनी का किनारा और वह अनजान आदमी याद आता है—जिससे मेरा कोई रिश्ता नहीं था, फिर भी कुछ घंटों के लिए वह मेरी कल्पनाओं का सबसे करीब का व्यक्ति बन गया था।

पर कहानी यहीं खत्म नहीं होती। दो महीने बाद, एक कार्यक्रम में संयोग से हम फिर मिले। दिल्ली के एक होटल में एक सेमिनार था। मैं अपने पति के साथ गई थी, और ऋत्विज अकेला था। जब हमारी नज़रें मिलीं, तो सब कुछ वापस लौट आया—वही तनाव, वही खिंचाव। शाम को मेरे पति को काम से बाहर जाना पड़ा। ऋत्विज ने मुझे मेरे कमरे तक छोड़ने की पेशकश की। लिफ्ट में हम अकेले थे। हवा में बिजली कड़क रही थी। उसने मेरी ओर देखा और बोला, “मैं रुक नहीं सकता।” और फिर सब कुछ तेज़ी से बदल गया।

हम मेरे कमरे में थे। दरवाज़ा बंद होते ही उसने मुझे दीवार से लगा दिया। उसके होंठ मेरे होंठों पर थे, जैसे सात साल की भूख एक साथ निकल रही हो। यह चुंबन कोमल नहीं था, यह हिंसक था, जैसे दोनों एक-दूसरे को निगल जाना चाहते हों। उसके हाथ मेरे बालों में थे, मेरी कमर पर। मैंने उसकी शर्ट के बटन खोल दिए। उसकी छाती पर बाल थे, और वह गरम था। उसने मेरी साड़ी खोली और मेरे स्तनों को बाहर निकाला। उसने उन्हें देखा, जैसे कोई कलाकार अपनी कृति को देख रहा हो। “तुम्हारे मम्मे बहुत सुंदर हैं,” उसने कहा और फिर उसने उन्हें मुँह में ले लिया। उसकी जीभ मेरे निप्पल पर चल रही थी, और मैं कराह उठी। मेरे शरीर में आग लग गई थी। मैंने उसके पैंट का बटन खोला और उसके लिंग को बाहर निकाला। वह पहले से ही कड़ा और उत्तेजित था। मैंने घुटनों के बल बैठकर उसे अपने मुँह में ले लिया। वह आश्चर्य से कराह उठा। “विराज… ओह…” मैंने उसे गहराई से चूसा, मेरी जीभ उसके सिर के नीचे घूम रही थी। उसने मेरे बाल पकड़े और धीरे से मेरे मुँह में अपना लंड धकेलना शुरू किया। “तुम्हारा मुँह बहुत गर्म है,” वह कराहा। मैंने उसे और तेज़ी से चूसा, मेरी लार उसके ऊपर बह रही थी। वह कराहता रहा, और फिर अचानक उसने मुझे खींचकर ऊपर उठा लिया। “बस, मैं और नहीं रोक सकता।”

उसने मुझे बिस्तर पर लिटा दिया। वह मेरे ऊपर था, उसकी आँखों में एक जंगली चमक थी। “मैं तुम्हारे अंदर जाना चाहता हूँ,” उसने कहा। मैंने सिर हिलाया। उसने मेरी योनि को महसूस किया, वह पहले से ही गीली और तैयार थी। उसने अपना लिंग मेरे प्रवेश द्वार पर रखा और धीरे से अंदर धकेलना शुरू किया। एक लम्बी कराह मेरे मुँह से निकली। वह बड़ा और मोटा था, और उसने मुझे पूरी तरह भर दिया। उसने धीरे-धीरे चलना शुरू किया, हर धक्के के साथ गहराई तक जाते हुए। “तुम कितनी तंग हो,” वह कराहा। मैंने उसकी पीठ पर अपने नाखून गड़ा दिए। हमारा संभोग कोमल नहीं था, यह क्रूर और जरूरी था, जैसे हम दोनों इस पल के लिए जी रहे थे। वह मेरे अंदर गहराई से धँस रहा था, और मैं उसकी हर गति के साथ कराहती जा रही थी। फिर उसने मुझे पलट दिया और मुझे काउगर्ल की स्थिति में बैठा दिया। “मैं तुम्हें ऊपर से देखना चाहता हूँ,” उसने कहा। मैं उसके ऊपर बैठ गई और धीरे-धीरे उसके लिंग पर नीचे बैठने लगी। यह और भी गहरा था। मैंने ऊपर-नीचे होना शुरू किया, मेरे स्तन हवा में झूल रहे थे। उसने उन्हें पकड़ा और दबाया। “तुम्हारे चूचे मुझे पागल कर रहे हैं,” उसने कहा। मैं तेज़ी से चलने लगी, मेरी योनि उसके लिंग को चूस रही थी। वह कराह उठा, “मैं नहीं रोक पाऊँगा।” फिर उसने मुझे फिर से पलट दिया और मिशनरी स्थिति में आ गया। उसने मेरे पैरों को अपने कंधों पर रख लिया और तेज़ी से धकेलना शुरू किया। यह और भी गहरा और तीव्र था। मैं चीखने लगी, “हाँ! हाँ! और गहरे!” वह मेरे अंदर जमकर चोद रहा था, हर धक्के के साथ मेरी चूत में घुसता जा रहा था। मेरे शरीर में एक ज्वाला फैल गई, और मैं चरमसुख पर पहुँच गई। मेरी योनि सिकुड़ने लगी, और मैं जोर से कराही। उसने एक आखिरी जोरदार धक्का दिया और अपना वीर्य मेरे अंदर स्खलित कर दिया। वह गर्म और गहरा था। वह मेरे ऊपर गिर गया, हाँफते हुए।

हम कुछ देर तक वैसे ही पड़े रहे, उसका लिंग अभी भी मेरे अंदर था। उसने मेरे कान में फुसफुसाया, “यह सिर्फ शारीरिक नहीं था।” मैं जानती थी। यह कुछ और था—एक ऐसा जुनून जो सात सालों में कभी नहीं मिला था। हमने फिर कभी एक-दूसरे से बात नहीं की। लेकिन वह रात मेरी यादों में हमेशा के लिए दर्ज हो गई। कभी-कभी मैं सोचती हूँ, क्या ऐसा फिर कभी हो सकता है? शायद नहीं। लेकिन उसकी याद, उसका स्पर्श, उसकी गर्माहट… वह मेरे अंदर हमेशा जिंदा रहेगी। एक ऐसा रहस्य जो मैं हमेशा अपने साथ लेकर चलूँगी।