मेरा नाम सोनी ओरांव है और मैं रांची में रहती हूँ। यह शहर अपनी ठंडी हवाओं और हरे-भरे पेड़ों के लिए जाना जाता है, लेकिन मेरी दुनिया थोड़ी अलग है। मैं एक प्रोफेशनल डॉमिनेट्रिक्स हूँ। मेरा काम लोगों की गहरी इच्छाओं और उनके अंदर छिपे नियंत्रण के खेल को समझना है। मेरा स्टूडियो सदर क्षेत्र के एक पुराने बंगले के ऊपरी माले में है। बाहर से देखने में यह एक साधारण ऑफिस लगता है, लेकिन अंदर का माहौल पूरी तरह से प्राइवेट और कंट्रोल्ड है। दीवारों पर गहरे बैंगनी रंग की पेंट है, लाइटिंग मद्धम और गरम है, और हवा में हल्की सी खुशबू तैरती रहती है। यहाँ का हर सामान, हर टूल, सब कुछ सोच-समझकर रखा गया है।
आज मेरा आखिरी क्लाइंट डीपक मुंडा आने वाला था। डीपक मेरे पुराने क्लाइंट्स में से एक है। वह लगभग दो साल से आ रहा है। उसकी प्रोफाइल कुछ अलग है। वह एक सॉफ्टवेयर इंजीनियर है, देखने में बिल्कुल साधारण, शांत किस्म का लड़का। उसकी आँखों में एक अजीब सी गहराई और चेहरे पर हमेशा एक सोच-विचार की लकीर रहती है। ऑफिस की दुनिया के सख्त अनुशासन और दबाव के बाद, वह यहाँ आकर थोड़ी राहत, थोड़ा आत्मसमर्पण ढूँढता है। हमारे सेशन सख्त नियमों पर चलते थे, लेकिन उन नियमों के पीछे एक अटूट विश्वास और समझदारी का रिश्ता बन चुका था।
डीपक आया। उसने साधारण जींस और एक नीली टी-शर्ट पहन रखी थी। उसके बाल थोड़े बिखरे हुए थे, जैसे ऑफिस से सीधा यहाँ आ गया हो। “गुड इवनिंग, मिस्टर मुंडा,” मैंने अपना ठंडा, पेशेवर स्वर बनाए रखा। उसने सिर हिलाया, “गुड इवनिंग, मैडम सोनी।” उसकी आवाज़ में हमेशा की तरह एक सम्मानजनक कड़कपन था। मैंने उसे लाउंज में बैठने को कहा। वहाँ हमारी थोड़ी स्मॉल टॉक हुई। वह बता रहा था कि उसकी प्रोजेक्ट डेडलाइन कितनी तनावपूर्ण रही है। मैं सुन रही थी, लेकिन मेरी नज़र उसके हाथों पर थी, जो बार-बार अपनी जींस की थैली को सहला रहे थे। उसकी यह बेचैनी मेरे लिए नई नहीं थी, लेकिन आज यह कुछ ज़्यादा ही लग रही थी।
हम सेशन रूम में गए। कमरा हमेशा की तरह तैयार था। मैंने अपने लेदर ग्लव्स पहने। डीपक ने खुद को पैडेड टेबल पर लेटा दिया। मैंने उसकी कलाइयों और टखनों को रिस्ट्रेंट्स से बाँधना शुरू किया। यह रस्मी सा प्रोसेस हमेशा एक गहरी शांति लाता है। चमड़े के फीते कसने की आवाज़, उसकी साँसों का धीमा होना… यह सब एक तरह की मेडिटेशन जैसा था। आज, जब मैंने उसकी कलाई को पकड़ा, तो मैंने महसूस किया कि उसकी नब्ज़ थोड़ी तेज चल रही है। मेरी उँगलियाँ उसकी त्वचा पर रुक गईं। मैंने देखा, उसकी बाजू पर एक नई, छोटी सी खरोंच का निशान था। शायद किसी तनाव भरे दिन की निशानी। बिना कुछ कहे, मैंने अपना हाथ हटा लिया और रिस्ट्रेंट कस दी। लेकिन उस छोटे से स्पर्श ने हवा में कुछ बदल दिया था। एक रोमांच सा महसूस हुआ, जो पेशेवर दूरी को पार कर गया था।
सेशन शुरू हुआ। मेरी आवाज़ आदेश दे रही थी, मेरे कदम कमरे में गूँज रहे थे। डीपक आँखें बंद किए हुए था, अपनी दुनिया में खोया हुआ। मैं उसके चेहरे के पास झुकी, मेरी साँसें उसके गालों को छू रही थीं। “तुम आज बहुत बेचैन लग रहे हो, मिस्टर मुंडा,” मैंने फुसफुसाया। उसने आँखें खोलीं। उसकी नज़रें सीधी मेरी आँखों से टकराईं। उस लम्बे आँख मिलान में कोई डर नहीं, कोई चुनौती नहीं थी। बस एक गहरी, अकथनीय ललक थी। मैं पहली बार उलझन में पड़ गई। मैंने पीछे हटते हुए कहा, “फोकस करो। अपनी साँसों पर ध्यान दो।” लेकिन मेरे अपने शब्द मुझे खोखले लग रहे थे।
सेशन अपने चरम पर पहुँचा और फिर समाप्त हो गया। डीपक अभी भी बँधा हुआ था, उसकी साँसें भारी थीं, शरीर से पसीना बह रहा था। सामान्य तौर पर, यहीं से डीब्रीफिंग शुरू होती है। लेकिन आज कुछ अलग हो रहा था। मेरे अंदर एक तड़प उठ रही थी, एक कशिश जो मेरे पेशेवर व्यवहार की सारी दीवारों को तोड़ने पर आमादा थी। मैंने उसके पास खड़े होकर, उसकी ओर देखा। उसकी आँखें अब खुली थीं और वे मुझसे कुछ पूछ रही थीं, कुछ ऐसा जिसे शब्दों में बाँधा नहीं जा सकता था। कमरे की गरम हवा में एक वासना का तूफान सा मँडरा रहा था। मेरा गला सूख गया था, मेरा दिल जोरों से धड़क रहा था। यह सिर्फ उसकी उत्तेजना नहीं थी; यह मेरी अपनी कामेच्छा थी, जो सतह पर आकर साँस ले रही थी। मैंने अपने ग्लव्स उतारे। चमड़े के उतरने की आवाज़ ने सन्नाटे को तोड़ा। फिर, बिना एक शब्द कहे, मैं उसके सामने घुटनों के बल बैठ गई।
मेरे इस एक्शन ने डीपक की आँखों में हैरानी भरी एक चमक ला दी। मैंने धीरे से उसकी कलाइयों के रिस्ट्रेंट्स की बकल खोली। मेरे नंगे हाथों का स्पर्श उसकी त्वचा पर पड़ा और एक सिहरन उसके पूरे बदन में दौड़ गई। मेरा हाथ उसकी जाँघों पर होता हुआ ऊपर गया, जहाँ उसकी पैंट एक स्पष्ट उभार दिखा रही थी। मैंने धीरे से ज़िप खोली और बटन खोल दिया। उसने एक गहरी आह भरी। जब मैंने उसे बाहर निकाला, तो वह पहले से ही कड़ा और गरम था। मैंने उसे अपनी मुट्ठी में लिया और धीरे-धीरे सहलाना शुरू किया। मेरी उँगलियाँ उसकी नसों के उभार को महसूस कर रही थीं, उसकी गर्माहट को अपने भीतर समा रही थीं। फिर, मैंने झुककर उसे अपने मुँह में ले लिया। यह कोई पेशेवर एक्ट नहीं था; यह एक दीवानगी थी। मैं उसे गहराई से ले जा रही थी, मेरी जीभ उसके हर हिस्से का स्वाद ले रही थी। उसके हाथ, अब आज़ाद होकर, मेरे बालों में चले गए, लेकिन जबरदस्ती नहीं, बल्कि एक कृतज्ञता भरे आलिंगन की तरह। उसकी कराहटें कमरे में गूँज रही थीं, और हर आवाज़ मेरे भीतर की आग को और भड़का रही थी।
थोड़ी देर बाद, मैंने रुककर सिर उठाया। मेरी आँखों से पूछताछ हो रही थी। उसने बस इतना कहा, “सोनी… प्लीज।” और यह निवेदन ही मेरे लिए पर्याप्त अनुमति थी। मैंने खड़े होकर अपने कॉर्सेट के पीछे के हुक खोलने शुरू किए। डीपक ने मेरे हाथ बढ़ाए और धीरे से मेरे हाथों को हटाकर खुद हुक खोल दिए। कपड़ा ढीला हुआ और मेरे स्तन बाहर आ गए। उसके हाथ तुरंत उन पर पहुँच गए, पहले हल्के से मसलते हुए, फिर दबाते हुए। उसने मेरे निपल्स को अपनी उँगलियों के बीच निचोड़ा, एक ऐसा दर्द जो सीधा मेरी योनी तक जाता हुआ महसूस हुआ। मैंने अपना सिर पीछे झुकाया और एक सिसकी भरी। मैंने उसका हाथ पकड़ा और उसे पैडेड टेबल की ओर ले चली। मैं उस पर लेट गई और उसका सिर अपनी जाँघों के बीच ले जाकर दबा दिया। “अब तुम करो,” मैंने हाँफते हुए कहा।
डीपक ने बिना किसी हिचकिचाहट के आज्ञा मानी। उसकी जीभ ने मेरे भीतर का रास्ता ढूँढ लिया। वह कोई अनाड़ी नहीं था; उसके हर चाटने, हर लेहन में एक ऐसी मिठास और लगन थी कि मेरे शरीर में बिजली-सी दौड़ गई। मैंने उसके बालों को मजबूती से पकड़ लिया, उसे और गहराई में धकेलते हुए। उसने एक हाथ से मेरी चूची को मरोड़ा और दूसरी उँगलियाँ मेरे भीतर घुसा दीं। वह ठुकाई कर रहा था, रगड़ रहा था, और मैं उसकी हर गति पर पिघल रही थी। मेरी साँसें तेज हो गईं, फुसफुसाहट और कर्राहट के बीच का फर्क मिटने लगा। मेरे पूरे शरीर में एक मदहोशी छा गई, एक तीव्र उत्तेजना जो बढ़ती ही जा रही थी। और फिर वह क्षण आया – एक ज़ोरदार कंपन जिसने मेरे शरीर के हर अंग को झकझोर दिया। मैं चीखी, लेकिन आवाज़ मेरे गले में ही अटक गई। मैं उसके मुँह पर टूट पड़ी, ऐंठते हुए, हाँफते हुए।
जब मैं सामान्य हुई, तो मैंने डीपक को उठाया। उसका चेहरा गीला और मेरी कामुकता से चमक रहा था। मैंने उसे टेबल से उतारा और उसे घुटनों के बल बिठा दिया। फिर, मैं उस पर ऊपर से चढ़ गई, रिवर्स काउगर्ल की पोजीशन में। मैंने उसे अंदर लेते हुए, धीरे-धीरे नीचे की ओर बढ़ी। उसकी कराह एक गहरी खुशी में बदल गई। अब नियंत्रण पूरी तरह से मेरे हाथ में था। मैंने अपनी गति तय की, ऊपर-नीचे होते हुए, मेरे शरीयत की हर मांसपेशी काम कर रही थी। मैंने अपनी आँखें बंद कर लीं और अपने भीतर के उस आकर्षण को महसूस किया जो हर बार और गहरा होता जा रहा था। मैंने गति बढ़ाई, मेरी चुदाई और तेज और जोरदार होती गई। डीपक के हाथ मेरी कमर पर थे, मुझे संभाले हुए, मेरी हर चाल के साथ तालमेल बिठाते हुए। मैं फिर से उस चरम के करीब पहुँच रही थी। यह पहले से भी ज़्यादा तीखा और मसालेदार अनुभव था। और फिर, एक और विस्फोट – मेरा शरीर फिर से ऐंठा, एक लम्बी, दर्दभरी खुशी की लहर में बहते हुए।
इस बार, मैंने खुद को उससे अलग किया। मैं मुड़ी और फिर से उसके सामने घुटनों के बल बैठ गई। मैंने उसे फिर से अपने मुँह में लिया, लेकिन इस बार मेरा उद्देश्य स्पष्ट था। मेरी गति दृढ़ और लयबद्ध थी। मेरा एक हाथ उसके अंडकोष को सहला रहा था, दूसरा उसकी जाँघ पर मजबूती से पकड़ बनाए हुए था। डीपक का सिर पीछे की ओर झुका हुआ था, उसकी गर्दन की नसें तनी हुई थीं। उसकी हाफने की आवाज़ें तेज हो रही थीं। मैंने उसे और गहराई से लिया, मेरा गला उसकी पूरी लम्बाई को समेटे हुए। और फिर वह क्षण आया – उसके शरीर में एक तेज ऐंठन हुई, उसकी उँगलियाँ मेरे बालों में और कसकर चिपक गईं, और एक गर्म धारा मेरे गले में उतर गई। मैंने सब कुछ निगल लिया, उसे खाली होने तक चूसती रही।
कुछ देर तक हम वैसे ही पड़े रहे, सिर्फ हमारी भारी साँसों की आवाज़ कमरे में गूँज रही थी। हवा में सेक्स और पसीने की गंध थी। आखिरकार, मैं उठी और अपने कॉर्सेट को ठीक करने लगी। डीपक भी उठ बैठा, उसकी नज़रें फर्श पर गड़ी हुई थीं। सन्नाटा अजीब सा लग रहा था। फिर उसने धीरे से कहा, “सोनी… यह… यह पेशेवर नहीं था।” मैंने मुस्कुराते हुए कहा, “नहीं, डीपक। यह पेशेवर नहीं था। शायद यह कुछ और था।” मैंने उसकी ओर देखा। उसकी आँखों में अब वह बेताबी या ललक नहीं थी। बस एक शांत संतुष्टि थी, और शायद एक सवाल। मैंने उसकी ओर हाथ बढ़ाया और उसके गाल को हल्के से सहलाया। “तुम जा सकते हो। अगली बार… हम बात करेंगे।” उसने मेरा हाथ अपने हाथ में ले लिया और एक पल के लिए दबाया। फिर वह उठा, अपने कपड़े समेटे और बिना कुछ कहे चला गया।
मैं अकेली कमरे में खड़ी रही, टूटी हुई रिस्ट्रेंट्स और बिखरे हुए तकियों को देखते हुए। मेरे होंठों पर अभी भी उसका स्वाद था, मेरे शरीर में अभी भी उसकी गर्मी का अहसास था। यह सिर्फ एक सेशन नहीं रहा था। यह एक सीमा का उल्लंघन था, एक नियम का टूटना था। लेकिन इस टूटन में एक अजीब सी सच्चाई थी। रांची की रात बाहर ठंडी हो रही थी, लेकिन इस कमरे के भीतर, दो लोगों के बीच एक नया, अनकहा रिश्ता अपनी पहली साँस ले रहा था। मैंने खिड़की की ओर देखा। शहर की लाइटें टिमटिमा रही थीं। मैंने एक गहरी साँस ली। मुझे नहीं पता था कि आगे क्या होगा, लेकिन आज की रात ने एक बात तो साफ कर दी थी – कभी-कभी, नियंत्रण छोड़ने में ही सबसे बड़ी शक्ति छिपी होती है। और कभी-कभी, पेशेवर दूरी के पीछे छिपी वासना, एक ऐसा रास्ता खोल देती है, जिसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती।
