पड़ोस की खिड़की से शुरू हुई चाहत, आंटी के करीब आते ही बदल गई रात

मेरा नाम अमन श्रीवास्तव है। मैं चौबीस साल का हूँ, लखनऊ यूनिवर्सिटी में एमएससी कर रहा हूँ और पार्ट-टाइम ट्यूशन पढ़ाकर कुछ पैसे कमा लेता हूँ। मैं अलीगंज में एक किराए के दो-बेडरूम के छोटे से घर में रहता हूँ। मेरे घर के ठीक सामने एक मामूली दो-मंजिला घर है, जहाँ तिवारी परिवार रहता है। मैंने उन्हें पहले ज्यादा नोटिस नहीं किया था, सिवाय इसके कि उस घर की गृहिणी, नेहा तिवारी, अक्सर छज्जे पर खड़ी दिख जाती थी।

पहली बार उससे बात तब हुई जब वह सड़क पर अपने दस साल के बेटे आदित्य के साथ खड़ी थी और उनका इंटरनेट कनेक्शन ठीक नहीं हो रहा था। मैं बस से उतरकर घर की तरफ जा रहा था।

“भैया, एक मिनट?” उसकी आवाज मीठी और थोड़ी हिचकिचाहट भरी थी। मैं मुड़ा। वह सलवार-कुर्ते में थी, एक हल्के गुलाबी रंग का दुपट्टा कंधे पर लिपटा हुआ। उसकी उम्र मुझसे कहीं ज्यादा, शायद मिड-थर्टीज में होगी, लेकिन उसके चेहरे पर एक ताजगी और आकर्षण था। उसकी लंबाई लगभग मेरे कंधे तक थी, लेकिन उसका फिगर… वाह। उसका सलवार कुर्ता उसके शरीर के कर्व्स को बखूबी दिखा रहा था। उसके बूब्स बहुत भरे हुए थे, कपड़े पर उभर आए थे। और जब वह मुझसे बात करने के लिए थोड़ा आगे झुकी, तो मैंने अनजाने में ही उसकी नज़रों का पीछा किया।

“हां आंटी? कुछ कहा?” मैंने पूछा।

“अरे, आंटी मत कहो ना,” वह हंसी, उसकी आंखें चमक उठीं। “मैं नेहा हूं। देखो, ये हमारा नेटवर्क है ना, ये लैपटॉप पर चल ही नहीं रहा। आदित्य का ऑनलाइन क्लास है। तुम थोड़ा देख सकते हो?”

मैं मान गया। उसके घर के अंदर का पहला अहसास गर्मजोशी भरा था। एक मध्यमवर्गीय लिविंग रूम, जो बच्चे के स्टडी टेबल से भी सजा था। उसने मुझे सोफे पर बैठाया और खुद मेरे पास, बिल्कुल करीब बैठ गई, ताकि लैपटॉप की स्क्रीन देख सके। उसके शरीर की गर्माहट और हल्की सी खुशबू – नारियल के तेल और इलायची जैसी – मेरे दिमाग में घूम गई। मैंने कनेक्शन ठीक किया, लेकिन मेरा ध्यान उस पर था। जब मैं कीबोर्ड पर हाथ फेर रहा था, तो उसकी बांह मेरी बांह से छू गई। वह हटी नहीं। मैंने भी नहीं हटाया।

“तुम तो एकदम एक्सपर्ट हो,” उसने कहा, उसकी नज़रें मेरे हाथों पर टिकी थीं।

“ऐसे ही, आंटी… मतलब, नेहा,” मैंने कहा और उसकी ओर देखा। उसकी आंखों में एक चंचल चमक थी।

उस दिन के बाद, हमारी मुलाकातें बढ़ने लगीं। वह अक्सर कोई न कोई बहाना ढूंढ लेती। कभी मोबाइल में कोई सेटिंग ठीक करवानी होती, कभी ऑनलाइन बिल भरवाना होता। हर बार वह मेरे बेहद करीब बैठती, उसके भरे हुए बूब्स कभी मेरी बांह से दब जाते, कभी पीठ से टकरा जाते। एक दिन तो वह मेरे सामने झुकी हुई थी, लैपटॉप की स्क्रीन दिखा रही थी, और उसकी नीची नेकलाइन से उसकी गहरी क्लीवेज का नज़ारा साफ दिख रहा था। मेरी सांसें थम सी गईं। मैंने देखा कि उसने मेरी नज़रें पकड़ ली हैं और वह शरमा कर सीधी नहीं हुई, बल्कि थोड़ी और देर झुकी रही, एक हल्की सी मुस्कान उसके होंठों पर तैर गई।

फिर वह दिन आया जब उसने और उसके पति राजेश ने मुझे आदित्य का रेगुलर ट्यूशन पढ़ाने के लिए कहा। राजेश एक प्राइवेट कंपनी में काम करते थे, शांत किस्म के इंसान। उन्होंने अच्छी फीस ऑफर की। मैं राजी हो गया। अब मैं हर दोपहर तीन बजे उनके घर पहुंच जाता। आदित्य को पढ़ाता, और नेहा हमेशा की तरह पास ही बैठी रहती, कभी चाय लेकर, कभी स्नैक्स लेकर।

एक दोपहर, आदित्य अपने कमरे में सो रहा था, ट्यूशन खत्म हो चुका था। नेहा लिविंग रूम में सोफे पर बैठी थी, मोबाइल चला रही थी। मैं किताबें समेट रहा था।

“अमन,” उसने आवाज दी। उसकी आवाज में एक नरमी थी। “ये देखो, रिया सक्सेना… पड़ोस वाली लड़की… उसने कहीं पर एक डांस कॉम्पिटिशन में हिस्सा लिया था। उसकी वीडियोज़ मेरे पास पेनड्राइव में हैं। दिखाऊं?”

मैं उसके पास बैठ गया। उसने पेनड्राइव लगाई। वीडियो चला। लेकिन मेरा ध्यान स्क्रीन पर नहीं, उस पर था। वह मेरे इतने करीब थी कि उसके जांघ का हिस्सा मेरे जांघ से छू रहा था। उसकी सांसों की गर्मी मेरे गाल को छू रही थी। मैंने हिम्मत करके अपना हाथ सोफे के पीछे रख दिया, जिससे मेरी बांह उसके कंधे के पीछे आ गई। वह सहजता से थोड़ी और पास सरक गई, अपना सिर हल्का सा मेरे कंधे के पास टिका दिया।

“कैसा लगा डांस?” उसने फुसफुसाते हुए पूछा।

“डांस… ठीक था,” मैंने कहा, मेरी आवाज भारी हो गई थी। “लेकिन जो चीज़ मुझे अभी ज्यादा खींच रही है, वो तुम हो।”

वह चुप रही। उसकी आंखें मेरी आंखों में घुस गईं, चुनौती भरी, इजाज़त भरी। मैंने धीरे से अपना हाथ आगे बढ़ाया और उसकी कमर पर रख दिया। उसके कुर्ते का पतला कपड़ा उसकी गर्म त्वचा के बिल्कुल करीब था। उसने एक गहरी सांस ली, उसके बूब्स ऊपर-नीचे हुए। उसने कोई एतराज नहीं किया। बल्कि, उसने अपना हाथ उठाया और मेरी जांघ पर, बहुत ही हल्के से, रख दिया।

यहीं से सबकी शुरुआत हुई। अब हर ट्यूशन के बाद का समय हमारे लिए होता था। आदित्य के कमरे में जाते ही, नेहा और मैं एक दूसरे के और करीब आने लगे। बातचीत कम, इशारे ज्यादा। वह जानबूझकर मेरे सामने झुकती, मेरे हाथ से चाय का कप लेते वक्त उसकी उंगलियां मेरी उंगलियों को छू जातीं। मैं उसे जाते वक्त, दरवाजे तक छोड़ने का बहाना करता और रुककर, बहुत ‘अनजाने में’, उसकी कमर पर हाथ फेर देता। एक बार तो मेरा हाथ नीचे सरककर उसकी गोल, भरी हुई गांड पर जा पहुंचा। उसने तेजी से मुड़कर मेरी तरफ देखा, उसकी आंखें चौंधिया गई थीं, लेकिन उसने मेरा हाथ हटाया नहीं। बस, एक लाली उसके गालों पर फैल गई।

“तुम बहुत बदतमीज होते जा रहे हो, अमन,” उसने फुसफुसाया, लेकिन उसकी आवाज में डांट नहीं, एक उत्साह था।

“तुम्हारी वजह से,” मैंने कहा और उसके करीब हुआ। हमारे चेहरे बस एक इंच की दूरी पर थे। मैंने उसके होंठों की तरफ देखा। वह अपनी जीभ से अपने निचले होंठ को नम करती रही। फिर अचानक, आदित्य के कमरे से आवाज आई। वह एक झटके में दूर हो गई, अपने बाल संवारती हुई।

तनाव असहनीय हो रहा था। आखिरकार, वह दिन आ ही गया। राजेश साहब को काम से बाहर जाना था, दो दिन के लिए। आदित्य की स्कूल की पिकनिक थी। पूरा दिन घर खाली था।

उस सुबह, मैंने उसे मैसेज किया: “आज पढ़ाई?”

उसका जवाब तुरंत आया: “आ जाओ। दरवाजा खुला रखूंगी।”

मेरा दिल धड़क रहा था। मैं उसके घर पहुंचा। दरवाजा वाकई बंद नहीं था। अंदर जाते ही वह लिविंग रूम में खड़ी मिली। उसने आज एक फिटिंग वाली नेवी ब्लू कुर्ती और सफेद चूड़ीदार पहनी हुई थी, जो उके कर्व्स को और भी ज्यादा उभार रही थी। उसके बाल खुले थे।

कोई बात नहीं हुई। बस नज़रें मिलीं। मैंने दरवाजा बंद किया और उसकी तरफ बढ़ा। वह एक कदम पीछे हटी, पीठ सोफे से टकरा गई। मैंने उसके चेहरे को अपने हाथों में लिया और उसके होंठों को अपने होंठों से दबा दिया। वह एक आह भरकर ढीली पड़ गई। यह कोमल किस नहीं था। यह भूख थी, महीनों की इच्छा की अभिव्यक्ति। उसने मेरी गर्दन पकड़ ली और जवाब दिया, उसकी जीभ मेरी जीभ से लड़ने लगी।

हाथ स्वतंत्र हो गए। मेरा एक हाथ उसकी कमर पर दबाव बनाता हुआ उसकी गांड तक पहुंचा, उसे अपनी ओर खींचा। दूसरा हाथ उसकी कुर्ती के बटनों पर गया। उसने मेरा हाथ रोका नहीं। बटन खुलते गए। उसने ब्रा नहीं पहनी थी। जैसे ही कुर्ती खुली, उसके भारी, गोल, सुडौल बूब्स बाहर आ गए। उनके काले सिरे उभरे हुए थे। मैंने अपना मुंह वहां डाल दिया। उसने सिर पीछे कर लिया, एक गहरी कराह निकली। “अमन… ओह, हां…”

मैंने एक चूची को मुंह में लेकर चूसा, दांतों से हल्का सा काटा। उसने मेरे बालों में हाथ फंसा दिए। “दूसरी वाली भी… जल्दी,” वह हांफी। मैंने किया। मेरा एक हाथ उसकी चूड़ीदार की कमर में घुसा, अंदर जाकर उसकी गर्म, नम चूत को ढूंढ लिया। उसने अपनी जांघें खोल दीं। मैंने एक उंगली अंदर डाली। वह तुरंत गीली थी, गर्म और तंग। उसने मेरे कान में कराहते हुए कहा, “और… और डाल।”

मैंने दो उंगलियां डाल दीं, अंदर-बाहर करने लगा। उसकी सांसें तेज हो गईं, उसका शरीर ऐंठने लगा। “बस… बस अब मत… मुझे तेरा लंड चाहिए,” वह बड़बड़ाई।

मैंने उसे सोफे पर लिटा दिया, उसकी चूड़ीदार और पैंटी नीचे खींच दी। वह पूरी तरह नग्न थी, उसका शरीर एक दिव्य मूर्ति की तरह लेटा था। मैंने अपने कपड़े उतारे। जब मैं उस पर आया, तो उसने मेरा लंड अपने हाथ में ले लिया, उसे सहलाया, फिर अपने मुंह में डाल लिया। उसका अनुभव साफ झलक रहा था। वह धीरे-धीरे, फिर तेजी से चूसने लगी, अपनी जीभ से सिरे को घुमाती हुई। मैं कराह उठा। “नेहा… मैं नहीं रुक पाऊंगा…”

उसने छोड़ दिया, मुस्कुराई। “मत रुको। पहली बार अंदर ही निकाल देना।”

वह सोफे पर पीठ के बल लेट गई, अपने घुटने मोड़कर, पैर फैला दिए। मैं उसके बीच में आ गया। मैंने अपने लंड का सिरा उसकी चूत के गीले द्वार पर रखा। उसकी आंखें मेरी आंखों में चिपकी हुई थीं, उसमें डर नहीं, बल्कि एक तीव्र ललक थी। मैंने धक्का दिया।

“आह! हां… ओह भगवान…” उसकी आंखें झपकीं। वह बहुत तंग थी, गर्म और आकर्षक। मैंने धीरे-धीरे पूरा अंदर डाला। फिर मैंने गति पकड़नी शुरू की। धीरे-धीरे पहले, फिर तेज। हर धक्के के साथ वह कराह उठती, उसके बूब्स हवा में हिलते। मैंने उसकी गांड को अपने हाथों से पकड़कर उसे और गहराई से अपने में खींचा। उसकी कराहें तेज हो गईं। “हां! ऐसे ही! जोर से मार! मेरी चूत तोड़ दो!”

उसके शब्दों ने मुझे पागल कर दिया। मैंने उसे पलट दिया, उसकी गांड हवा में उठा दी। इस पोजीशन में मैं और गहराई तक जा सका। मैं एक जानवर की तरह उस पर चढ़ा था, उसकी गांड पर जोरदार थप्पड़ मारते हुए। वह चिल्ला रही थी, मुंह सोफे में दबाए हुए। “हां! हां! हां! मैं आ रही हूं! अमन, मैं आ रही हूं!”

उसका शरीर एक जोरदार ऐंठन के साथ कांप उठा। उसकी चूत मेरे लंड के इर्द-गिर्द सिकुड़ने लगी। यह मेरे लिए बहुत ज्यादा था। मैंने एक आखिरी, गहरा धक्का दिया और अपना सारा माल उसकी चूत के अंदर गिरा दिया, गर्माहट उसके भीतर फैलाते हुए। मैं उस पर गिर पड़ा, हम दोनों हांफ रहे थे, पसीने से लथपथ।

कई मिनट तक बस सांसें चलती रहीं। फिर उसने मुड़कर मेरी तरफ देखा, उसके बाल चेहरे पर चिपके हुए थे। उसने एक थकी हुई, संतुष्ट मुस्कान दी। “वाह… ये तो… बहुत दिनों बाद हुआ।”

मैं उसके पास लेट गया, उसे अपनी बांहों में भर लिया। “मतलब?”

“राजेश… वो बहुत व्यस्त रहते हैं। और… इतना पैशन तो कभी था ही नहीं,” उसने कहा, उसकी आवाज में एक उदासी थी। फिर उसने मेरी तरफ देखा। “लेकिन तुम… तुमने तो आग लगा दी।”

उस दिन के बाद, यह हमारा रूटीन बन गया। जब भी मौका मिलता, हम मिलते। कभी उसके घर, कभी मेरे घर। हमारा सेक्स धीरे-धीरे और भी एक्सपेरिमेंटल होता गया। वह बहुत उत्सुक थी, नई-नई चीज़ें ट्राई करना चाहती थी। एक बार तो उसने मुझे बाथरूम में जाकर चूसा, जबकि आदित्य बाहर टीवी देख रहा था। दूसरी बार, मैंने उसे रसोई की किचन काउंटर पर चोदा, उसकी चीखें दबाने के लिए मुंह में रुमाल ठूंस दिया।

लेकिन यह सिर्फ सेक्स नहीं था। धीरे-धीरे भावनाएं भी जुड़ने लगीं। वह मुझे अपनी बातें बताने लगी, अपनी उदासी, अपने सपनों के बारे में, जो शादी के बाद अधूरे रह गए थे। मैं उसे अपने कॉलेज के किस्से सुनाता। हम एक दूसरे के लिए चाय बनाते। वह मेरे लिए खाना पकाकर लाती। एक दोपहर, सेक्स के बाद, जब मैं उसके बालों में उंगलियां फेर रहा था, तो उसने अचानक कहा, “तुम्हारी वजह से मैं फिर से जीवित महसूस कर रही हूं, अमन।”

उसकी बात ने मेरे दिल को छू लिया। मैं जानता था कि यह रिश्ता जटिल था, खतरनाक था। लेकिन अब वापसी का कोई रास्ता नहीं था। हम एक दूसरे के आदी हो चुके थे – उसकी गर्माहट के, उसके प्यार के, उस पैशन के जिसने हमारी रोजमर्रा की जिंदगी को एक गुप्त, रोमांचक साहसिक कार्य में बदल दिया था।

एक शाम, जब मैं उसके घर से निकल रहा था, तो हम दरवाजे पर खड़े थे। उसने मेरा हाथ पकड़ लिया। “कल राजेश की शिफ्ट मॉर्निंग है। आदित्य स्कूल जाएगा… सुबह दस बजे आ जाना,” उसने कहा, उसकी आंखों में वही चंचल चमक थी जो पहले दिन थी।

मैंने मुस्कुराते हुए सिर हिलाया। “जरूर आऊंगा। तब तक के लिए।”

वह मुस्कुराई और अंदर चली गई। मैं सड़क पार करके अपने घर की तरफ चल पड़ा, मन में कल की सुबह का इंतज़ार और उस गर्म, नम चूत का एहसास, जो मेरा इंतज़ार कर रही थी। यह गलत था। यह खतरनाक था। लेकिन इस पल, इस वक्त, इससे ज्यादा सही कुछ भी नहीं लगता था।