भीड़ के बीच एक गुप्त समझौता। मेरे शरीर में एक ऐसी आग जल उठी थी जो सालों से बुझी पड़ी थी।

मेरी ज़िंदगी देहरादून की उसी पुरानी कोठी में सिमटकर रह गई थी। रोज़ सुबह उठना, अरविंद के लिए चाय बनाना, उसका टिफिन तैयार करना, और फिर पूरा दिन चारदीवारी में बीत जाना। अरविंद अच्छा इंसान था, शायद बहुत अच्छा। लेकिन उसकी अच्छाई में एक ऐसी उबाऊ सुरक्षा थी जो मुझे धीरे-धीरे मार रही थी। हमारे बीच सब कुछ एक रूटीन बन चुका था, यहाँ तक कि हफ्ते में एक बार वाला सम्भोग भी। वह एक चेकलिस्ट की तरह था – बिस्तर पर जाना, कपड़े उतारना, दस मिनट की कवायद, और फिर सो जाना। कोई बातचीत नहीं, कोई कशिश नहीं, बस एक कर्तव्य।

उस दिन बारिश हो रही थी, और मेरा दिमाग एक अजीब सी बेचैनी से भरा हुआ था। अरविंद ऑफिस चला गया था। मैंने अचानक फैसला किया – बस स्टैंड जाऊँगी। कहीं भी चली जाऊँगी। बस बाहर निकलने की ज़रूरत थी। मैंने एक साधारण सी सलवार सूट पहना, बाल खुले छोड़े, और बैग उठाकर निकल पड़ी।

बस स्टैंड पर भीड़ थी। मसूरी जाने वाली बस आई तो लोग टूट पड़े। मैं भी उस भीड़ में समा गई। धक्का-मुक्की में मैं बस के बीचों-बीच जा खड़ी हुई। चारों तरफ लोग सटे हुए थे। बस चली तो एक झटका लगा और मैं पीछे की तरफ गिरते-गिरते बची। मेरी पीठ किसी के सीने से टकराई। एक पल के लिए मैंने सोचा माफी माँगूँगी, लेकिन फिर कुछ अलग हुआ।

उस शख्स की गर्मी मेरी पीठ के पार महसूस हो रही थी। बस का एक और मोड़ आया और मैं फिर उसके शरीर से दब गई। एक अनजाना सा रोमांच मेरे शरीर में दौड़ गया। सालों बाद मुझे एहसास हुआ कि मैं एक औरत हूँ, जिसका शरीर जीवित है। मैंने जानबूझकर अपना वज़न पीछे डाला, उसके शरीर पर। एक हल्की सी सिहरन मेरी रीढ़ में उतर गई।

फिर मैंने धीरे-धीरे हिलना शुरू किया। बस के झटकों का बहाना था, लेकिन मेरे हिलने का तरीका अलग था। मैं अपने नितंबों को उसके आगे के हिस्से पर रगड़ रही थी। पहले तो मैंने सोचा वह हट जाएगा, लेकिन उसने हटने की बजाय और करीब आकर मुझे दबा दिया। उसकी साँसें मेरे कान से टकरा रही थीं। मैंने अपनी आँखें बंद कर लीं। मेरा दिल जोर-जोर से धड़क रहा था।

कुछ देर बाद बस रुकी और भीड़ थोड़ी कम हुई। मैं आगे बढ़कर एक सीट के पास खड़ी हो गई। अब मेरे सामने एक दूसरा आदमी था – उम्र में थोड़ा कम, शायद कॉलेज स्टूडेंट। उसकी नज़रें मुझपर टिकी हुई थीं। मैंने शरारत से मुस्कुरा दिया। बस का अगला झटका आया तो मैं आगे की तरफ गिरी और उसने मुझे संभाला। उसके हाथ मेरी कमर पर थे। मैंने जानबूझकर उसके हाथों पर दबाव डाला, उसे महसूस करने दिया कि मैं उसकी छू से परेशान नहीं हूँ। उसके चेहरे पर हैरानी और उत्तेजना का मिलाजुला भाव था। मैंने कुछ पल उसके सामने ही खड़े होकर, अपने स्तनों को हल्का सा आगे करके, उसे देखा। फिर मैं हट गई।

तीसरा अनुभव सबसे तीखा था। बस के पिछले हिस्से में एक आदमी खड़ा था – लंबा, गठीला शरीर, चेहरे पर एक अलग तरह का आत्मविश्वास। जब मैं उसके पास से गुज़री तो उसने जानबूझकर अपना पैर आगे कर दिया। मैं संतुलन खोकर उसकी तरफ गिरी। उसने मुझे पकड़ा, लेकिन उसका पकड़ने का तरीका अलग था। उसकी एक बाँह मेरी कमर पर थी और दूसरी मेरे नितंबों के पास। मैंने महसूस किया – वह बहुत बड़ा था। उसकी उत्तेजना मेरी जांघ के पीछे साफ महसूस हो रही थी। मेरा मुँह सूख गया।

मैंने उसकी आँखों में देखा। उसमें एक ऐसी बेशर्मी थी जो डराती नहीं, बल्कि आकर्षित करती थी। “माफ कीजिए,” मैंने फुसफुसाया, लेकिन हिलने की कोशिश नहीं की।

“कोई बात नहीं,” उसकी आवाज़ गहरी और दबी हुई थी। “बस तो ऐसे ही चलती है।”

हम कुछ पल उसी अवस्था में खड़े रहे। वह धीरे-धीरे हिल रहा था, और मैं उसके हिलने का जवाब दे रही थी। यह कोई दुर्घटना नहीं रह गई थी। यह एक सचेत नृत्य था, भीड़ के बीच एक गुप्त समझौता। मेरे शरीर में एक ऐसी आग जल उठी थी जो सालों से बुझी पड़ी थी।

“तुम्हारा नाम क्या है?” मैंने साहस जुटाकर पूछा।

“राज,” उसने कहा, उसकी साँसें तेज़ थीं। “और तुम?”

“अनन्या,” मैंने झूठ बोला। मेरे होठों पर एक शरारती मुस्कान थी। “तुम्हारा नंबर? शायद… बाद में बात करें।”

उसने बिना हिचकिचाहट के अपना नंबर मेरे फोन में डाल दिया। बस अगले स्टॉप पर रुकी तो मैं उतर गई। मेरे पैर काँप रहे थे। मेरे अंदर एक अजीब सी ऊर्जा भर गई थी। घर लौटते हुए पूरे रास्ते मैं उसी के बारे में सोचती रही – उसकी मज़बूत बाँहें, उसकी गहरी आवाज़, और वह दबाव जो उसने मुझपर डाला था।

उस रात अरविंद जब सो गया, तो मैं बाथरूम में जाकर बैठ गई। मेरा दिल धड़क रहा था। मैंने राज का नंबर डायल किया।

“हैलो?” उसकी आवाज़ फोन में और भी सेक्सी लग रही थी।

“मैं हूँ… अनन्या। बस वाली,” मैंने कहा।

“ओह! मैं सोच रहा था कि कॉल आएगी या नहीं।” उसकी आवाज़ में मुस्कुराहट थी। “तुम घर पहुँच गईं ठीक से?”

“हाँ… तुम्हारी वजह से पूरे रास्ते काँपती रही।”

“क्यों? डर गई थीं?”

“नहीं… एक अलग तरह का कंपकंपी था। तुमने महसूस किया था ना?”

“हाँ,” उसने धीरे से कहा। “तुम्हारी गांड मेरे लंड पर कैसे रगड़ रही थी, वो मैं भूल नहीं सकता। तुम्हारा शरीर आग की तरह गर्म था।”

मेरे शरीर में बिजली दौड़ गई। मैंने कभी इस तरह की बातें नहीं सुनी थीं। अरविंद तो बिस्तर पर भी फॉर्मल भाषा इस्तेमाल करता था।

“तुम्हें पता है, तुम जब गिरी थीं मेरे ऊपर, तो मेरा खड़ा हो गया था तुरंत,” राज ने कहा। “तुम्हारे बालों की खुशबू… तुम्हारे शरीर का दबाव… मैं तभी से सोच रहा हूँ कि तुम्हारे कपड़ों के अंदर क्या छुपा है।”

“तुम खुद तो बहुत बड़े हो,” मैंने हिम्मत जुटाकर कहा। “मैंने महसूस किया था।”

“उसे तुम्हारे अंदर महसूस करना चाहते हो?”

मेरी साँस रुक सी गई। “हाँ,” मैंने फुसफुसाया।

“कैसे? बताओ। मैं सुनना चाहता हूँ।”

मैंने आँखें बंद कर लीं। “मैं चाहती हूँ कि तुम मुझे दीवार के साथ दबा दो… मेरे कपड़े फाड़ दो… और जबरदस्ती अंदर घुस जाओ। मैं चिल्लाऊँगी, लेकिन तुम रुकोगे नहीं…”

“और फिर?”

“फिर तुम मुझे जमीन पर पटक दोगे… मेरी चूत को जबरदस्त चाटोगे… मुझे पागल कर दोगे… और फिर अपना बड़ा लंड मेरे अंदर ठूँसोगे…”

मैं हैरान थी कि मेरे मुँह से ये शब्द निकल रहे थे। यह कोई और थी, मैं नहीं। राज की हँसी सुनाई दी। “तुम तो सच्ची रंडी हो। पहले दिखावा नहीं हुआ।”

“तुम्हारे सामने दिखावा करने की ज़रूरत नहीं।”

ऐसे ही कई रातें बीतीं। हर रात, अरविंद के सोने के बाद, मैं बाथरूम में बैठकर राज से डर्टी टॉक करती। हर बार बातचीत और गर्म होती जाती। मैं उसे बताती कि मैं क्या-क्या करवाना चाहती हूँ, और वह मुझे बताता कि वह मेरे साथ क्या-क्या करेगा। मेरा शरीर एक तरावट महसूस कर रहा था जो सालों से सूखा पड़ा था।

एक हफ्ते बाद, बातचीत के दौरान राज ने कहा, “मैं तुमसे मिलना चाहता हूँ। असल में। सिर्फ फोन पर बात करके संतुष्टि नहीं हो रही।”

मेरा दिल जोर से धड़का। “कहाँ?”

“तुम्हारे घर। दिन में। जब तुम्हारा पति ऑफिस में हो।”

यह खतरनाक था। पागलपन था। लेकिन उसी पल मैंने हाँ कह दी। “कल। सुबह ग्यारह बजे।”

अगले दिन सुबह से मैं एक अजीब सी बेचैनी में थी। मैंने अरविंद को ऑफिस भेजा, फिर घर की सफाई शुरू कर दी – हालाँकि घर पहले से ही साफ था। मैंने एक हल्के गुलाबी रंग की साड़ी पहनी, बिना ब्लाउज के, सिर्फ पेटीकोट और चोली के साथ। मेरे स्तन चोली में कसकर बंधे हुए थे। मैंने हल्का मेकअप किया और अपने बाल खुले छोड़ दिए।

ग्यारह बजे दरवाज़े की घंटी बजी। मेरे पैर जमीन से उखड़ गए। मैंने दरवाज़ा खोला।

राज वहाँ खड़ा था – उसकी ऊँचाई दरवाज़े के फ्रेम को भर रही थी। उसने जीन्स और एक काली टी-शर्ट पहनी हुई थी, जो उसके मज़बूत शरीर के हर उभार को दिखा रही थी। उसकी आँखों में वही बेशर्म चमक थी जो बस में देखी थी।

“अंदर आओ,” मैंने दबी आवाज़ में कहा।

उसने अंदर कदम रखा और मैंने दरवाज़ा बंद किया। जैसे ही दरवाज़ा बंद हुआ, वातावरण बदल गया। हवा में तनाव घुल गया।

“तुम साड़ी में बहुत खूबसूरत लग रही हो,” उसने कहा, उसकी नज़रें मेरे शरीर पर घूम रही थीं।

“धन्यवाद,” मैंने कहा, लेकिन मेरी आवाज़ काँप रही थी।

वह करीब आया। मैं उसकी गर्मी महसूस कर सकती थी। “डर रही हो?”

“नहीं… बस… नर्वस हूँ।”

“मत हो। तुम्हें पता है हम दोनों क्या चाहते हैं।” उसने अपना हाथ उठाया और मेरे गाल को छुआ। उसकी उँगलियाँ खुरदरी थीं, मज़बूत। “तुम्हारी त्वचा बहुत नर्म है।”

मैंने आँखें बंद कर लीं। “राज…”

“श्श्श… बोलो मत।” उसने अपना हाथ मेरी गर्दन पर सरकाया, फिर मेरे कंधे पर। उसकी उँगलियाँ मेरी चोली के पट्टे को छू रही थीं।

फिर उसने अचानक मुझे खींचकर अपने सीने से लगा लिया। उसका चुम्बन आक्रामक था, भूखा। उसके होंठ मेरे होंठों को कुचल रहे थे, उसकी जीभ मेरे मुँह के अंदर घुस गई। मैंने विरोध करने की कोशिश की, लेकिन मेरा शरीर उसके प्रति प्रतिक्रिया दे रहा था। मेरे हाथ उसकी पीठ पर चले गए, उसके मज़बूत मांसपेशियों को महसूस किया।

वह मुझे धीरे-धीरे दीवार की तरफ धकेलता गया। मेरी पीठ दीवार से टकराई। उसने मेरे होंठ छोड़े और मेरी गर्दन पर चुम्बन करने लगा। उसके दाँत मेरी त्वचा को काट रहे थे, दर्दनाक और मादक।

“राज… ऐसे मत… निशान पड़ जाएगा…”

“चुप रहो,” उसने गुर्राया। उसने अपना एक घुटना मेरी जांघों के बीच दबा दिया और मैं कराह उठी। “तुम्हें यही चाहिए था ना? जबरदस्ती?”

“हाँ… ओह भगवान… हाँ…”

उसने मेरी साड़ी का पल्लू खींचा। कपड़ा फटने की आवाज़ आई। उसने मेरी चोली के हुक खोल दिए। मेरे स्तन बाहर आ गए। उसने उन्हें देखा, फिर जोर से मेरे एक स्तन को मुँह में ले लिया। उसने काटा, चूसा, और मैं चिल्ला उठी। दर्द था, लेकिन उस दर्द के साथ एक ऐसी तीव्र उत्तेजना थी जो मैंने कभी महसूस नहीं की थी।

“तुम्हारे मम्मे बहुत सेक्सी हैं,” उसने कहा, दूसरे स्तन को निचोड़ते हुए। “तुम्हारा पति इनकी कदर नहीं करता।”

“उसके बारे में बात मत करो,” मैंने कराहते हुए कहा।

उसने मुझे जमीन पर पटक दिया। मेरी पीठ फर्श से टकराई। फिर वह मेरे ऊपर आ गया, उसके हाथों ने मेरी साड़ी और पेटीकोट को फाड़ दिया। कुछ ही पलों में मैं पूरी तरह नग्न थी, फर्श पर पड़ी हुई, और वह मेरे ऊपर खड़ा मुझे देख रहा था।

“तुम्हारी चूत गीली है,” उसने कहा, अपनी उँगली मेरे अंदर डालते हुए। मैं चीख उठी। “बहुत गीली। तुम सच में बहुत प्यासी हो।”

“कृपया… राज… अब मत रोको…”

उसने अपने कपड़े उतारे। उसका शरीर वाकई प्रभावशाली था – चौड़ी छाती, कमर पतली, और निचले हिस्से में… वह वाकई बहुत बड़ा था। मैंने आँखें फैला लीं।

“डर गई?” उसने मुस्कुराते हुए पूछा।

“नहीं… बस… हैरान हूँ।”

वह मेरे पास लेटा और अपना सिर मेरी जांघों के बीच ले गया। फिर उसने मेरी योनी को चाटना शुरू किया। मैं चिल्ला उठी। उसकी जीभ बहुत कुशल थी, बहुत आक्रामक। वह मेरे भीतरी हिस्सों को चाट रहा था, चूस रहा था, काट रहा था। मेरा शरीर ऐंठने लगा। मैं उसके बालों को पकड़े हुए थी, उसे और दबाव के साथ अपनी तरफ खींच रही थी।

“राज… मैं… मैं आने वाली हूँ…”

“नहीं,” उसने अपना सिर उठाया। “अभी नहीं।”

फिर वह ऊपर आया और अपने लंड को मेरे सामने लाया। “इसे चूसो।”

मैंने बैठकर उसे अपने मुँह में लिया। वह बहुत बड़ा था, मेरा मुँह भर गया। मैंने उसे चूसना शुरू किया, अपनी जीभ से उसके सिरे को लपेटा। उसने कराहना शुरू किया।

“हाँ… ऐसे ही… और गहरा…”

मैंने और गहराई तक लिया, मेरी आँखों में आँसू आ गए। उसने मेरे बाल पकड़े और मेरे सिर को आगे-पीछे धकेलना शुरू किया। “तुम अच्छा मुख मैथुन करती हो। तुम्हारा पति तुम्हारी इस ताकत को नहीं जानता।”

फिर उसने मुझे रोका। “अब बस। मैं तुम्हारे अंदर जाना चाहता हूँ।”

उसने मुझे पलट दिया। “गधे के बल हो जाओ।”

मैंने हाँफते हुए उसकी बात मानी। मैं अपने घुटनों और हाथों के बल हो गई। उसने मेरे नितंबों को जोर से पकड़ा। “तुम्हारी गांड भी बहुत सेक्सी है।”

फिर मैंने महसूस किया – उसका लंड मेरे प्रवेश द्वार पर दबाव डाल रहा था। वह बहुत बड़ा था। मैंने कराहा। “धीरे से… कृपया…”

“नहीं,” उसने कहा, और जोर से अंदर घुस गया।

मैं चीख उठी। दर्द था, लेकिन उसके साथ एक अविश्वसनीय भराव था। वह पूरी तरह से अंदर था। उसने एक पल रुका, फिर बाहर निकला और फिर अंदर गया। इस बार दर्द कम था, आनंद ज़्यादा।

“हाँ… ऐसे ही… ओह भगवान…” मैं हाँफ रही थी।

उसने तेज़ी से पेलना शुरू किया। हर धक्के के साथ मेरा शरीर आगे की तरफ झटका खाता। उसके हाथ मेरी कमर पर थे, मुझे और पीछे की तरफ खींच रहे थे। मेरे स्तन हवा में झूल रहे थे।

“तुम्हारी चूत बहुत तंग है,” वह कराह रहा था। “बहुत गर्म… ओह… मैं ज़्यादा देर नहीं टिक पाऊँगा…”

“मत रुको… कृपया… और तेज़…”

उसने और तेज़ी से पेलना शुरू किया। फर्श पर हमारे शरीरों के टकराने की आवाज़ गूँज रही थी। मेरा शरीर एक ऐसे आनंद की कगार पर पहुँच रहा था जो मैंने कभी नहीं जाना था। मेरी चीखें बेकाबू हो गईं।

“राज… मैं आ रही हूँ… ओह भगवान… मैं आ रही हूँ!”

मेरा शरीर ऐंठ गया। एक जबरदस्त झटके ने मुझे जकड़ लिया। मैं चिल्लाई, रोई, हाँफी। उसने भी एक जोरदार कराह निकाली और मैंने महसूस किया कि वह गर्म तरल मेरे अंदर छोड़ रहा है। उसने कई बार झटके दिए, फिर ढेर होकर मेरे ऊपर गिर पड़ा।

कुछ मिनट तक हम दोनों साँस लेने की कोशिश करते रहे। फिर वह मेरे अंदर से निकला और पास ही लेट गया। हवा में सेक्स और पसीने की गंध थी।

मैं उलटी होकर लेट गई, मेरी आँखें छत की तरफ थीं। मेरा शरीर अभी भी काँप रहा था। मैंने कभी ऐसा कुछ महसूस नहीं किया था।

राज ने अपना हाथ मेरे पेट पर रखा। “ठीक हो?”

मैंने सिर हिलाया। “हाँ… बहुत ठीक।”

“तुम्हारा पति कभी तुम्हें ऐसा महसूस नहीं करवा पाया, है ना?”

मैं चुप रही। जवाब स्पष्ट था।

वह बैठ गया। “मुझे जाना चाहिए।”

“तुम वापस आओगे?” मैंने पूछा, अपनी आवाज़ में एक बेचैनी के साथ।

उसने मुस्कुराया। “हाँ। अगले हफ्ते। उसी दिन, उसी समय।”

वह उठा, कपड़े पहने, और चला गया। मैं फर्श पर ही पड़ी रही, नग्न, उसके वीर्य से सनी हुई। मेरा शरीर अभी भी उसके स्पर्श को महसूस कर रहा था।

जब अरविंद शाम को घर लौटा, तो मैं सामान्य दिखने की कोशिश कर रही थी। लेकिन मेरे अंदर कुछ बदल चुका था। उस रात जब उसने मुझे छुआ, तो मैंने मना कर दिया। उसकी छू अब बेमानी लग रही थी।

मैं अगले हफ्ते का इंतज़ार करने लगी। राज का इंतज़ार। उस आग का इंतज़ार जो मेरे भीतर जल उठी थी। देहरादून की उबाऊ ज़िंदगी में अब एक रहस्य था, एक गुप्त जीवन। और मैं जानती थी कि यह सिर्फ शुरुआत थी।