ग्वालियर की चिलचिलाती गर्मी का मौसम था। मई का आखिरी सप्ताह, और हवा में तपिश घुली हुई थी, जैसे कोई भट्टी चल रही हो। मेरा नाम मनीष तोमर है। मैं यहीं का रहने वाला हूँ, और उस दिन मैं अपने दफ्तर से छुट्टी लेकर जल्दी निकल आया था। एयर कंडीशनर की ठंडक से बाहर निकलते ही धूप ने ऐसा थपेड़ा मारा कि शरीर का हर रोमांच खड़ा हो गया। मैंने अपनी सफेद पोलो शर्ट के कॉलर को ढीला किया और सीधा शहर के उस नए कैफे की तरफ चल पड़ा, जिसके बारे में सब बातें कर रहे थे – ‘द ब्रू क्रू’।
मैं वहाँ अक्सर नहीं जाता था, लेकिन उस दिन बस दिमाग में यही आया। अंदर घुसते ही एसी की बर्फीली हवा ने एक सुकून भरी सिसकी ली। जगह हल्की अंधेरी थी, लैंप की मद्धम रोशनी में कुछ कपल्स बैठे थे, और एक कोने में एक लड़की अकेले बैठी लैपटॉप पर कुछ टाइप कर रही थी। उसकी तरफ मेरी नज़र पड़ी, और फिर वहीं अटक गई।
वह रिद्धि थी। रिद्धि सिंधिया। नाम सुनने में ही राजपूतानी गौरव की गूँज सी आती थी, लेकिन उसका अंदाज़ बिल्कुल आज की जेनरेशन वाला था। उसने हल्के गुलाबी रंग का एक स्ट्रेपलेस टॉप पहना हुआ था, जिससे उसके कंधे और कोलारबोन पूरी तरह दिख रहे थे। उसकी त्वचा सांवली और चिकनी थी, जैसे किसी ने मख्खन लगा रखा हो। उसके लंबे, घने काले बाल एक साइड में बह रहे थे, और जब वह स्क्रीन पर ध्यान लगाती, तो कभी-कभी अपनी उंगलियों से उन्हें कान के पीछे कर लेती। उसकी आँखें बड़ी और काजल लगाए हुए थीं, जो किसी गहरी सोच में डूबी हुई लग रही थीं। उसने नीचे डेनिम की शॉर्ट्स पहनी थी, जो उसकी लंबी, सुडौल टांगों को पूरा एक्सपोज़ कर रही थी।
मैं उसे देखता रह गया। एक अजीब सी खिंचाव महसूस हुई। मैंने काउंटर पर जाकर एक कॉफी ऑर्डर की और उसके पास वाली टेबल पर बैठ गया। बैठते ही उसने सिर उठाया। हमारी नज़रें मिलीं। उसकी आँखों में एक पल के लिए हैरानी थी, फिर एक हल्की सी मुस्कान उसके होठों पर तैर गई। मैंने भी मुस्कुराकर जवाब दिया। शायद यहीं से सब शुरू हुआ।
अगले कुछ दिनों में, ‘द ब्रू क्रू’ हमारी मुलाक़ात की जगह बन गया। पता चला कि रिद्धि दिल्ली यूनिवर्सिटी से पढ़कर आई थी और अब ग्वालियर में एक डिज़ाइन फर्म में काम करती थी। वह बेहद बुद्धिमान थी, लेकिन उसके अंदाज़ में एक शरारत भी थी। जब वह बात करती, तो कभी-कभी अपनी उंगलियों से टेबल को टैप करती, या फिर बातों के दौरान मेरी आँखों में देखकर एक सेकंड ज़्यादा ठहर जाती। उसका यह लुक इतना तीखा होता था कि मेरे शरीर में एक सिहरन सी दौड़ जाती।
एक दिन बारिश हो रही थी। हम कैफे में बैठे थे, और बाहर मूसलाधार पानी गिर रहा था। बिजली कड़क रही थी। रिद्धि ने अपनी कॉफी का आखिरी घूँट पिया और बोली, “आज तो यहाँ से निकलना मुश्किल लग रहा है।”
“हम थोड़ी देर और बैठ सकते हैं,” मैंने कहा।
वह चुपचाप मुस्कुराई। फिर अचानक बोली, “तुम्हारी शर्ट का रंग आज मुझे बहुत अच्छा लग रहा है। नीला तुम पर सूट करता है।”
उसकी यह सीधी तारीफ सुनकर मैं थोड़ा झेंप गया। “शुक्रिया,” मैंने कहा, आवाज़ में एक हल्का कंपन महसूस करते हुए।
वह उठी और मेरे पास आकर खड़ी हो गई। उसके शरीर से हल्की सी खुशबू आ रही थी – वनीला और कुछ मसालेदार, शायद सैंडलवुड की। उसने अपना हाथ बढ़ाया और मेरी शर्ट के कॉलर पर पड़े एक छोटे से धागे को सावधानी से हटाया। उसका स्पर्श हल्का था, लेकिन जहाँ उसकी उंगलियाँ मेरी त्वचा से छुईं, वहाँ एक बिजली सी दौड़ गई। मैं साँस रोके उसे देखता रहा। उसने मेरी आँखों में देखा, और फिर धीरे से मुस्कुराकर अपनी सीट पर वापस चली गई। उस पल की नज़दीकी ने हवा में एक तनाव पैदा कर दिया था, एक ऐसी कशिश जो शब्दों से परे थी।
धीरे-धीरे हमारी बातचीत फोन कॉल्स और लेट-नाइट टेक्स्ट मैसेजेस तक पहुँच गई। वह मुझे ‘मनी’ कहकर बुलाती, और मैं उसे ‘रिद्ध’। एक शाम, उसने मुझे अपने अपार्टमेंट पर आने के लिए कहा। वह लक्ष्मी नगर में रहती थी, एक छोटा सा, साफ-सुथरा फ्लैट। जब मैं पहुँचा, तो उसने दरवाज़ा खोला। उसने एक साधारण सी कॉटन की ड्रेस पहनी हुई थी, जो उसके शरीर के कर्व्स को बखूबी उभार रही थी। उसके बाल गीले थे, जैसे अभी नहा कर आई हो।
“अंदर आओ,” उसने कहा, आवाज़ में एक मधुरता थी।
अंदर का माहौल सुगंधित था। उसने दो गिलास जूस निकाला, और हम सोफे पर बैठ गए। बातें होने लगीं – ऑफिस की पॉलिटिक्स, पुराने किस्से, फिर चुप्पी। वह मेरे पास बैठी थी, और हमारे बीच की दूरी महज़ कुछ इंच रह गई थी। मैं उसकी गर्दन की रेखा देख रहा था, उसके होठों के नरम आकार को। उसने अपना हाथ सोफे के पीछे रख दिया था, जिससे उसका शरीर और भी खुलकर सामने आ गया था। उसके स्तनों का उभार उसकी ड्रेस के कपड़े के नीचे साफ दिख रहा था। मेरा गला सूखने लगा। मेरे मन में उसके प्रति एक तीव्र आकर्षण जाग रहा था, एक ललक जो बढ़ती ही जा रही थी।
“मनी,” उसने फुसफुसाते हुए कहा, “तुम चुप क्यों हो गए?”
मैंने उसकी आँखों में देखा। उनमें एक चमक थी, एक ऐसी बेताबी जो मेरी अपनी बेताबी से मेल खा रही थी। मैंने धीरे से अपना हाथ बढ़ाया और उसके गाल को सहलाया। उसकी त्वचा गर्म और मुलायम थी। उसने अपनी आँखें बंद कर लीं, और एक आह भरी। यह आह कोई साधारण आह नहीं थी; इसमें सालों की दबी हुई इच्छाओं का इज़हार था। उसने अपना हाथ मेरे हाथ पर रख दिया, और मैंने महसूस किया कि उसकी उंगलियाँ काँप रही थीं।
मैं धीरे से आगे बढ़ा और उसके होठों को अपने होठों से छुआ। पहला चुम्बन कोमल था, एक पूछताछ की तरह। लेकिन जवाब में उसने अपना मुँह खोल दिया, और वह कोमलता एक आग में बदल गई। हमारी जीभें मिलीं। उसका स्वाद मीठा और तीखा था, जैसे किसी मसालेदार आम का। मेरे हाथ उसकी पीठ पर फिरने लगे, उसके कपड़ों के नीचे के नरम शरीर को महसूस करते हुए। वह मेरे करीब आई, उसका शरीर मेरे शरीर से दब गया। मैं उसकी गर्मी महसूस कर सकता था, उसकी धड़कनों की तेज़ गति।
फिर वह धीरे से पीछे हटी। उसकी आँखों में एक शैतानी चमक थी। “रुको,” उसने कहा, आवाज़ में एक खिलवाड़ भरा अंदाज़। “मैं चाहती हूँ कि तुम देखो।”
वह सोफे से उठी और कमरे के बीचोबीच खड़ी हो गई। उसने मेरी तरफ देखा, उसकी नज़रों में एक आदेश था। “मुझे देखो,” उसने कहा।
फिर उसने धीरे-धीरे अपनी ड्रेस के साइड में लगी ज़िप खोलनी शुरू की। आवाज़ बेहद धीमी थी, लेकिन हवा में गूँज रही थी। जैसे ही ज़िप नीचे खिसली, उसने कपड़े को अपने कंधों से सरकाया। ड्रेस धीरे-धीरे नीचे खिसकने लगी, उसके शरीर के कर्व्स को उजागर करती हुई। पहले उसके कंधे, फिर उसकी कोलारबोन, और फिर उसके स्तनों का ऊपरी हिस्सा। उसने ड्रेस को अपने घुटनों तक आने दिया, और फिर उसे पूरी तरह उतार कर फर्श पर गिरा दिया।
अब वह सिर्फ अपने अंडरवियर में खड़ी थी। उसने अपने हाथों को अपने शरीर पर फिराया, अपने स्तनों के नीचे से शुरू करके अपने पेट तक। उसकी उंगलियाँ उसकी त्वचा पर नाच रही थीं। उसने अपनी आँखें बंद कर लीं, और अपने निप्पल्स को अपने अंगूठे और तर्जनी उंगली के बीच में हल्का सा दबाया। एक मदहोश कर देने वाली आह उसके होठों से निकली। मैं बस देखता रह गया, मेरा शरीर एक दमकती हुई आग में तब्दील हो रहा था। उसकी हरकत में एक ऐसी कामुकता थी जो मुझे पागल कर रही थी।
फिर उसने अपने अंडरवियर के किनारे को पकड़ा और उसे भी धीरे-धीरे नीचे खिसकाया। और फिर वह पूरी तरह नंगी थी। उसका शरीर एक कलाकृति था – सुडौल, कोमल, और बेहद आकर्षक। उसने अपना एक हाथ अपने जघन पर रखा और धीरे-धीरे सहलाना शुरू किया। उसकी उंगलियाँ उसकी योनी की ओर बढ़ीं, और मैं देख सकता था कि वहाँ नमी फैल रही थी, एक चमकदार गीलापन जो उसकी इच्छा की गवाही दे रहा था।
मैं उठा और उसकी तरफ बढ़ा। मेरे कदम भारी थे, मेरा दिल धड़क रहा था। मैं उसके सामने खड़ा हो गया। उसने अपनी आँखें खोलीं। उनमें एक चुनौती थी, लेकिन एक कमजोरी भी। मैंने अपना हाथ उठाया और उसके जघन पर, उसकी योनी के ठीक ऊपर, एक हल्का सा तेज़ थप्पड़ मारा।
“आह!” उसकी आवाज़ में एक चीख सी मिली हुई थी, हैरानी और उत्तेजना से भरी हुई। जहाँ मैंने थप्पड़ मारा था, वहाँ की त्वचा लाल हो गई थी, और नमी और भी ज़्यादा फैल गई थी, उसके भीतरी जांघों पर चमकने लगी।
मैंने अपनी दो उंगलियाँ उसके मुँह के पास ले जाईं। उसने बिना किसी हिचकिचाहट के उन्हें अपने मुँह में ले लिया, अपनी जीभ से चाटा और चूसा। उसके मुँह की गर्मी और नमी ने मेरे शरीर में एक झटका दौड़ा दिया। फिर मैंने उन गीली उंगलियों को नीचे ले जाकर सीधे उसकी योनी के द्वार पर रख दिया। वह गर्म और फूली हुई थी। मैंने धीरे से एक उंगली अंदर डाली। वह तंग और गर्म थी। उसने अपना सिर पीछे की ओर झटका दिया, और एक गहरी सिसकी भरी।
मैंने उंगली को और अंदर धकेला, फिर मुड़ी हुई अवस्था में उसे अंदर-बाहर करना शुरू किया। मेरी दूसरी उंगली भी उसी रास्ते में शामिल हो गई। रिद्धि ने मेरे कंधों को मजबूती से पकड़ लिया, उसकी पकड़ में एक बेताबी थी। उसका शरीर काँप रहा था, उसकी साँसें तेज़ और अनियमित हो गई थीं। “मनी…,” उसने कराहते हुए कहा, उसकी आवाज़ एक फुसफुसाहट से ज़्यादा कुछ नहीं थी।
मैंने उसे धीरे से सोफे पर लेटा दिया, उसकी पीठ नरम कुशनों से टिकी। फिर मैंने उसकी टांगों को उठाया और अपने कंधों पर डाल लिया। यह स्थिति उसे पूरी तरह खोल देने वाली थी। मैंने अपनी पैंट उतारी और अपने लिंग को, जो पहले से ही कठोर और तनाव से भरा हुआ था, उसकी योनी के द्वार पर रखा। उसकी नज़रें मेरी आँखों में जकड़ी हुई थीं, उसमें एक प्रार्थना और एक आदेश का मिश्रण था।
मैंने धीरे से, लेकिन दृढ़ता से, अंदर प्रवेश किया। वह तंग और गर्म थी, एक ऐसी गर्मी जो मेरे पूरे शरीर में फैल गई। मैंने एक गहरी, कोणीय गति में अंदर-बाहर करना शुरू किया, हर धक्के के साथ उसके गर्भाशय ग्रीवा तक पहुँचने की कोशिश करता हुआ। वह चीख़ने लगी, लेकिन उसकी चीखों में दर्द नहीं, बल्कि एक अत्यधिक आनंद था। मैं झुका और उसके मुँह के ऊपर लेट गया। हमारी आँखें मिलीं। फिर मैंने अपना मुँह खोला और एक लार की धार उसके खुले मुँह में गिरा दी। उसने उसे निगल लिया, और फिर मैंने और जोर से धक्का दिया। उसकी आँखें पलक झपकाते हुए बंद हो गईं, और उसने अपनी बाहें मेरी गर्दन के चारों ओर लपेट लीं।
कुछ देर इसी तरह चलने के बाद, मैंने अचानक बाहर निकलना शुरू किया। “नहीं… मत रोको… कृपया,” उसने हांफते हुए कहा, उसकी आवाज़ में एक दर्दनाक बेताबी थी।
मैंने उसे पलट दिया, उसकी पीठ की ओर। वह अपने घुटनों के बल हो गई। मैंने उसके घने काले बालों को अपने हाथ में लपेटा और हल्का सा खींचा, उसकी गर्दन को पीछे की ओर झुकाया। फिर मैंने फिर से प्रवेश किया, इस बार कुत्ते की मुद्रा में। यह कोण अलग था, और गहरा। उसने एक तेज़ चीख़ भरी। मैंने एक हाथ से उसके बाल खींचे रखे, और दूसरे हाथ से उसके नितंबों पर, मेरे हर धक्के के साथ एक जोरदार थप्पड़ मारा। आवाज़ तेज़ और स्पष्ट थी, और हर थप्पड़ के साथ उसका शरीर आगे की ओर झटका खाता, और वह और ज़ोर से कराहती।
मेरी गति तेज़ होती गई। मैं उसकी गर्मी में डूब रहा था, उसकी कराहों की आवाज़ से भर रहा था। फिर, एकबार फिर, मैंने अचानक बाहर निकलना शुरू किया। “नहीं! मत निकलो! अंदर रहो… मैं माँगती हूँ,” उसने रोते हुए कहा, उसकी आवाज़ टूटी हुई थी।
उसकी यह प्रार्थना मेरे लिए अंतिम तिनका थी। मैंने तुरंत वापस अंदर धकेला, और इस बार मैंने रुकने का कोई इरादा नहीं किया। मेरी गति अबाधित और तीव्र थी। मैंने उसके बालों को और जोर से खींचा, और वह चिल्लाई। मैंने महसूस किया कि मेरे भीतर एक विस्फोट होने वाला है। “रिद्धि!” मैं चिल्लाया, और फिर मेरा शरीर एक ऐंठन में काँप उठा। गर्मी की एक लहर मेरे शरीर से निकलकर उसके भीतर समा गई। उसी पल, उसका शरीर भी एक नई ऐंठन में काँप उठा, उसकी योनी मेरे लिंग के चारों ओर सिकुड़ी और फैली। वह जोर से कराही, और फिर उसका शरीर ढीला पड़ गया।
हम दोनों हांफ रहे थे। पसीने से लथपथ। मैंने धीरे से बाहर निकलकर उसके बगल में लेट गया। कमरे में सिर्फ हमारी साँसों की आवाज़ थी। धीरे-धीरे, हमारी साँसें सामान्य होने लगीं।
रिद्धि ने करवट बदली और अपना सिर मेरी छाती पर रख लिया। उसकी उंगलियाँ मेरे सीने पर नाच रही थीं। “वाह,” उसने फुसफुसाया।
मैंने उसके बालों में उंगलियाँ फिराईं। कोई शब्द नहीं थे जो उस पल का वर्णन कर सकते। बस एक गहरी शांति थी, और एक संतुष्टि जो हड्डियों तक उतर गई थी। बाहर से ग्वालियर की रात की आवाज़ें आ रही थीं – दूर से किसी कुत्ते के भौंकने की आवाज़, किसी रिक्शे के हॉर्न की आवाज़। लेकिन यहाँ, इस कमरे में, एक अलग ही दुनिया थी।
“तुम्हें प्यास लगी है?” मैंने पूछा, आवाज़ भारी और संतुष्ट।
उसने सिर हिलाया। मैं उठा और रसोई में गया। दो गिलास ठंडा पानी लेकर आया। उसने बैठकर पानी पिया, और मैं उसे देखता रहा। उसके शरीर पर थप्पड़ के निशान दिख रहे थे, लालिमा लिए हुए। लेकिन उसके चेहरे पर एक शांत मुस्कान थी।
“तुम सब कुछ कंट्रोल करते हो,” उसने कहा, मेरी तरफ देखते हुए।
“और तुम्हें वो पसंद आया,” मैंने जवाब दिया।
वह मुस्कुराई। “शायद।”
हम फिर लेट गए। उसकी गर्मी मेरे शरीर के साथ मिल रही थी। कोई जल्दी नहीं थी। कोई शर्म नहीं थी। बस दो लोग, एक गर्म ग्वालियर की रात में, जो एक दूसरे को एक नए स्तर पर जान चुके थे। मैंने उसे अपने करीब खींच लिया, और उसने अपनी बाँह मेरे ऊपर डाल दी। नींद धीरे-धीरे हम पर हावी हो रही थी, लेकिन उससे पहले, मैंने एक बार फिर उसके होठों को चूमा – कोमलता से, वादे के साथ। और जब मैं सो गया, तो मेरे मन में सिर्फ एक ही नाम गूँज रहा था – रिद्धि।
