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  • त्रिकोण का जाल: धोखा, चाहत और पछतावा

    मैं अपने केबिन की बड़ी सी खिड़की के पास खड़ी बाहर सूरत की भागती-दौड़ती सड़कों को देख रही थी। मेरी सिल्क की साड़ी का पल्लू कंधे से हल्का सा फिसल गया था, पर मेरा ध्यान वहां नहीं था। मेरी पूरी दुनिया इस वक्त मेरे फोन की स्क्रीन पर सिमट गई थी, जहाँ ट्विटर और न्यूज़…

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  • चार लोग, बंद दरवाज़ा और रिश्तों की सीमाएं मिटाती एक रात

    लखनऊ की उस पुरानी हवेली की हवा में एक अजीब सी भारीपन था। वह महक—पुरानी लकड़ी, गीली मिट्टी और सदियों पुराने पत्थरों की नमी—सीधे दिमाग पर असर कर रही थी। हम चारों उस प्राइवेट सुइट में थे, जहाँ छत की नक्काशी इतनी गहरी थी कि लगता था जैसे वह हमें निगल जाएगी। कमरे के बीचों-बीच…

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