मेरा नाम रिशि पाठक है और मैं वाराणसी में रहता हूँ। वो शहर जहाँ गंगा की लहरों और मंदिरों की घंटियों के बीच भी ज़िन्दगी का अपना एक अलग राग बजता है। मेरे लिए वाराणसी सिर्फ एक शहर नहीं, एक एहसास है। और उस एहसास ने एक नया रंग, एक नया स्वाद पाया, उस दिन से, जब मैं श्रुति अग्रवाल से मिला।
वह मुलाकात किसी फिल्मी सीन जैसी थी। गोडोलिया क्रॉसिंग के पास स्थित ‘पुस्तक संसार’ नाम की उस पुरानी सी दुकान में। मैं बनारसी बुनाई के इतिहास पर एक दुर्लभ किताब ढूंढ रहा था। वहीं दूसरी तरफ़ से एक आवाज़ आई, “भैया, ये ‘बनारस का बुनकर’ वाली किताब है क्या?” मैंने देखा, तो सामने एक लड़की खड़ी थी। उसने साधारण सी जीन्स और एक नीली कुर्ती पहन रखी थी, बाल एक साधारण सी पोनीटेल में बंधे हुए। पर उसकी आँखों में एक अजीब सी चमक थी, जैसे किताबों की दुनिया में खोई हुई, पर उसी वक्त मेरी तरफ देखते हुए एकदम स्पष्ट। वह श्रुति थी।
“हाँ, लगता तो यही है,” मैंने कहा, “पर लगता है एक ही कॉपी बची है।”
उसकी माथे पर छोटी सी लकीर आई, “अच्छा? मैं तो काफी दिनों से ढूंढ रही थी इसे।”
उसके निराश स्वर में एक मासूमियत थी। मैंने किताब उठाई और काउंटर की तरफ बढ़ने लगा। तभी उसने कहा, “एक सेकेंड। आप इसे ले तो सकते हैं, लेकिन एक शर्त पर।”
मैं मुड़ा। उसकी आँखों में अब वो चमक एक चंचल, शरारत भरी मुस्कान में बदल चुकी थी। “क्या शर्त?”
“आपको इस किताब पर जो भी नोट्स बनाने हैं, या रिसर्च करनी है, उसे मेरे साथ शेयर करना होगा। डिजिटली। ईमेल या व्हाट्सएप पर।”
मैं हँस पड़ा। ये कोई मोलभाव नहीं, एक कनेक्शन बनाने का बहाना था। “डील,” मैंने कहा और किताब के लिए पैसे निकाले।
उस दिन हमने दुकान के बाहर ही दस मिनट बात की। पता चला वह भी वाराणसी यूनिवर्सिटी में पढ़ती है, टेक्सटाइल डिजाइन में। मेरा काम तो यहाँ के एक हेरिटेज कंज़र्वेशन प्रोजेक्ट से जुड़ा है। नंबर एक्सचेंज हुए, और फिर अगले कुछ दिन ईमेल और मैसेज के ज़रिए किताब के बारे में बातचीत चलती रही। उसके मैसेज में एक खास किस्म की गर्मजोशी थी। वो ‘हेलो’ नहीं, ‘क्या हाल हैं?’ लिखती थी। कभी किसी पैराग्राफ पर सवाल उठाती, तो कभी मेरे विचार पर ‘हmm, interesting point’ लिखकर एक इमोजी लगा देती।
पहली बार अकेले में मिलना हमने ‘ब्लू लट्टे’ कैफे में तय किया। असल में योजना तो लाइब्रेरी की थी, पर उस दिन बारिश हो रही थी। उसने मैसेज किया, ‘लाइब्रेरी का मूड नहीं बन रहा। चाय और पकौड़े वाली जगह बताओ?’ मैंने ब्लू लट्टे का नाम सुझाया। वहाँ पहुँचकर देखा, वह पहले से ही एक कोने वाली सीट पर बैठी थी। इस बार उसने सलवार-कमीज पहनी थी, और बाल खुले हुए थे, जो अभी-अभी बारिश की हल्की-फुल्की बौछारों से थोड़े से गीले थे। उस पर बैठी बूंदें रोशनी में मोतियों की तरह चमक रही थीं।
“तुम्हारे बाल… गीले हैं,” मैंने बैठते हुए कहा।
उसने हाथ से बालों को एक ओर हटाते हुए कहा, “अरे, स्कूटी पर आ रही थी, तभी रिमझिम शुरू हो गई। बस, यही नैचुरल हेयर स्टाइल है अब।”
हमने चाय के प्याले उठाए। बातचीत किताबों से शुरू हुई, फिर अपने-अपने काम पर आई, फिर वाराणसी की उन गलियों पर, जहाँ हम बचपन में खेला करते थे। मैंने देखा कि जब वह किसी बात पर ज़ोर देती, तो अपनी उंगलियों से टेबल को थपथपाने लगती। जब कोई बात उसे पसंद आती, तो उसकी आँखों के कोने ऊपर उठ जाते, एक खिली हुई मुस्कान के साथ। उसकी हंसी संगीत की तरह थी, बिल्कुल साफ और बेफिक्र। उस शाम, उस छोटे से कैफे में, बारिश की फुहारों की आवाज़ के बीच, हम दो अजनबी अब सिर्फ दो लोग नहीं रहे थे। एक दूसरे को जानने लगे थे।
इसके बाद कई और मुलाकातें हुईं। दशाश्वमेघ घाट पर शाम की चाय, सारनाथ के संग्रहालय की सैर, और कभी रिक्शा चलाते हुए बेतरतीब गलियों में घूमना। हर मुलाकात में एक नई चीज़ पता चलती। जैसे उसे मसालेदार चाट पसंद है, पर उस पर इतनी लाल मिर्च डालती है कि मुँह से ‘आह’ निकल पड़े। या फिर वह जब भी किसी बात पर शरमाती, तो अपने कान के पीछे बाल सहलाने लगती। धीरे-धीरे, एक खिंचाव पैदा होने लगा। कभी चलते हुए हमारे हाथ अनजाने में टकरा जाते, और वह तुरंत हटा लेती, एक झिझक भरी मुस्कान के साथ। कभी बात करते हुए नज़रें मिल जातीं, और एक पल के लिए सब कुछ थम सा जाता, जब तक कि दोनों में से कोई हँसकर या किसी और चीज़ की ओर इशारा करके उस माहौल को तोड़ नहीं देता।
एक शनिवार को उसने कहा, “इतनी सर्दी पड़ रही है, और तुम बस किताबों और ईमेल में ही लगे रहते हो? ब्रेक लेना भी ज़रूरी है।”
“तो क्या सुझाव है?” मैंने पूछा।
“मेरे मामा जी का एक छोटा सा कॉटेज है, दशाश्वमेघ से थोड़ा दूर, गाँव की तरफ। शांत, सुनसान। इस वीकेंड वहाँ कोई नहीं है। अगर तुम्हारा प्रोजेक्ट वर्क खत्म हो गया है, तो चलोगे? एक दिन। सिर्फ आराम। किताबें पढ़ेंगे, खाना बनाएंगे… बस।”
उसके आवाज़ में एक उम्मीद थी, और शायद थोड़ी सी नर्वसनेस भी। मैंने हाँ कर दी। मेरा दिल तेज़ी से धड़कने लगा था। ये सिर्फ एक ट्रिप नहीं थी, ये कुछ नया शुरू होने की एक संभावना थी।
कॉटेज वाकई में खूबसूरत और शांत जगह पर था। एक छोटा सा लकड़ी का बंगला, सामने एक छोटा सा लॉन और पीछे घने पेड़। अंदर का माहौल गर्म और आरामदायक था। लकड़ी के फर्नीचर, एक बड़ी सी लाइब्रेरी, और बीचों-बीच एक पुराने ढंग का फायरप्लेस। शाम ढलने लगी थी और ठंड भी बढ़ रही थी। हमने मिलकर खाना बनाया – साधारण दाल-चावल और आलू की सब्ज़ी। खाने के बाद हम फायरप्लेस के पास फ़र्श पर दरी बिछाकर बैठ गए। मैंने अलाव जलाया। लकड़ियाँ चटचटाती हुई जलने लगीं और उसकी लौ से पूरा कमरा एक नारंगी रोशनी से भर गया। लपटों की छायाएँ दीवारों पर नाचने लगीं।
श्रुति एक मोटी स्वेटर पहने हुई थी, और उसने अपने घुटने अपनी बाँहों में घेर रखे थे। “कितनी अच्छी गर्मी है,” उसने आँखें मूंदकर कहा, अलाव की गर्मी अपने चेहरे पर महसूस करते हुए।
“हाँ, बिल्कुल,” मैंने कहा, पर मेरी नज़रें उस पर टिकी थीं। आग की लपटों ने उसके चेहरे को एक मुलायम, सुनहरी चमक दे दी थी। उसकी आँखों की चमक और भी तेज़ लग रही थी।
थोड़ी देर चुप्पी रही, सिर्फ लकड़ियों के चटचटाने और दूर किसी ओलों के टरटराने की आवाज़। फिर उसने कहा, “रिशि, एक बात बताओ… तुमने कभी सोचा था कि हम यहाँ बैठे होंगे, ऐसे?”
मैं मुस्कुराया। “नहीं। पर अब जब सोचता हूँ, तो लगता है शायद मैं इस पल का इंतज़ार ही कर रहा था।”
उसकी नज़रें मेरी आँखों में डूब गईं। वह दूरी जो हमारे बीच थी, वो अब सिर्फ एक फ़ीट की रह गई थी, पर लग रहा था जैसे वो भी पिघल रही है। मैंने धीरे से अपना हाथ बढ़ाया और उसके हाथ को छुआ। उसने मेरा हाथ पलटकर अपनी हथेली में ले लिया, उंगलियाँ आपस में गुथ गईं। उसका स्पर्श गर्म और नरम था। फिर उसने अपना सिर मेरे कंधे पर टिका दिया। उसके बालों से आने वाली हल्की सी खुशबू ने मेरे होश ही उड़ा दिए। मैंने अपना सिर उसके सिर के पास झुकाया।
फिर, बिना कुछ सोचे, मैंने उसकी ठुड्डी को हलके से पकड़ा और उसके मुँह की तरफ देखा। उसकी आँखों में कोई इनकार नहीं था, बस एक गहरी, शांत ललक। मैंने धीरे से अपने होंठ उसके होंठों पर रख दिए। पहला चुंबन कोमल था, एक पूछताछ की तरह। उसने जवाब दिया, अपने होंठों को मेरे होंठों के साथ चलाते हुए। यह कोई उतावला, जल्दबाज़ी वाला चुंबन नहीं था। यह धीरे-धीरे गहरा होता गया। हमारी साँसें आपस में मिलने लगीं। मेरा एक हाथ उसके गाल पर था, दूसरा उसकी पीठ पर, उसे मेरे करीब खींचते हुए।
कुछ देर बाद, जब हमारे होंठ अलग हुए, तो वह हाँफ रही थी, उसकी आँखें अभी भी बंद थीं। मैंने उसके माथे को चूमा। फिर उसने अपनी आँखें खोलीं और मेरी तरफ देखा, उस नज़ारे में एक ऐसी आग थी जो फायरप्लेस की आग से कहीं ज़्यादा तेज़ थी। उसने मेरी गर्दन पकड़ी और मुझे फिर से चूमना शुरू कर दिया। इस बार चुंबन में ज़्यादा ज़रूरत थी, ज़्यादा तड़प। मेरे हाथ उसकी पीठ से होते हुए उसकी तरफ बढ़े। मैंने उसके स्वेटर के नीचे, उसकी कमीज को महसूस किया, और फिर उसकी गर्म त्वचा को। वह एक आह भरते हुए मेरे और करीब आ गई।
मैंने हिचकिचाते हुए अपना हाथ आगे बढ़ाया और उसके सीने को छुआ। उसने मेरे होंठों से अपने होंठ हटाते हुए एक गहरी साँस ली, पर उसने मेरा हाथ रोका नहीं। मैंने धीरे से उसके स्तन को महसूस किया, कपड़े के पार ही। वह मुलायम और भरा हुआ था। उसने अपना सिर पीछे झुकाया और उसकी आँखें चमक उठीं। मैंने धीरे से अपना हाथ नीचे की तरफ सरकाया, उसकी पेट की सपाट सतह को पार करते हुए, और फिर उसकी जीन्स के बटन तक पहुँच गया। मैंने रुककर उसकी आँखों में देखा, एक अनुमति माँगते हुए। उसने बस अपनी पलकें झपकाई, एक सहमति।
मैंने धीरे से बटन खोला और ज़िप नीचे की। मेरा हाथ उसके अंदर घुसा और मैंने उसकी चिकनी सतह वाली पैंटी के ऊपरी हिस्से को महसूस किया। वहाँ पहले से ही एक गर्मी और नमी थी। मैंने अपनी उंगलियों से उसके ऊपर वाले हिस्से को, उसके मांस के नरम उभार को रगड़ना शुरू किया। वह मेरे कंधे में अपना माथा गड़ाए हुए थी, और उसकी साँसें तेज़ और गहरी हो गई थीं। उसकी एक मदहोश सी कराह निकली, “आह… रिशि…”। मेरी उंगलियों के नीचे का कपड़ा धीरे-धीरे और गीला होता जा रहा था, उसकी तड़प का सबूत।
फिर उसने अचानक अपना हाथ आगे बढ़ाया और मेरी शर्ट के बटन खोलने शुरू कर दिए। उसके हाथ काँप रहे थे, पर उसमें एक दृढ़ता थी। एक-एक करके बटन खुले। उसने मेरी शर्ट को कंधों से उतारकर फेंक दिया। उसकी नज़रें मेरे सीने पर टिक गईं। फिर उसने अपने हाथ मेरी पैंट की कमर पर रखे। मैंने उठकर उसे नीचे करने में मदद की। मेरी बॉक्सर्स भी नीचे सरक गईं। ठंडी हवा का एक झोंका आया, पर उसकी नज़रों की गर्मी ने उसे नगण्य कर दिया।
वह अपनी जगह से हिली और मेरे सामने घुटनों के बल बैठ गई। उसने मुझे एकटक देखा, उसकी आँखों में कौतुहल और ललक का एक अद्भुत मेल था। फिर उसने धीरे से अपना हाथ आगे बढ़ाया और मुझे पकड़ लिया। उसका स्पर्श इतना नाज़ुक और फिर भी दृढ़ था कि मेरी साँस अटक गई। उसने अपना सिर झुकाया, और पल भर की ठहराहट के बाद, उसने अपने गर्म, नरम होंठ मुझ पर रख दिए।
उस पल की तीव्रता ने मेरे शरीर में बिजली सी दौड़ा दी। उसने धीरे-धीरे गति पकड़ी, अपना सिर आगे-पीछे करते हुए, एक लयबद्ध तरीके से। उसके एक हाथ ने मेरी जांघ को थाम रखा था, जबकि दूसरा नीचे की तरफ सहारा दे रहा था। उसकी जीभ के हल्के से घूमने और चूसने की क्रिया ने मुझे पागल कर दिया। मैंने अपनी उंगलियों से उसके बालों में घुसाकर उसे सहलाया, उसके प्रयास की प्रशंसा करते हुए। मेरी कर्राहटें और आहें कमरे की खामोशी में गूंजने लगीं। “श्रुति… ओह भगवान…”
कुछ मिनट बाद, वह रुकी और पीछे हटी। उसके होंठ चमक रहे थे और आँखों में एक शैतानी सी चमक थी। उसने मेरे हाथ पकड़े और खुद को पीछे की ओर, फ़र्श पर लेटाते हुए खींचा। “अब मेरी बारी,” उसने फुसफुसाया।
मैं उसके ऊपर आया। मैंने उसकी जीन्स और पैंटी को धीरे से उतारा। आग की रोशनी में वह एक सपने जैसी लग रही थी। मैंने उसकी टाँगों को अलग किया और अपने घुटनों के बल उसके पैरों के बीच में बैठ गया। मैंने पहले उसकी जांघों के आंतरिक हिस्से को चूमा, जहाँ की त्वचा बेहद नाज़ुक थी। वह सिहर उठी। फिर मैंने अपना रास्ता बनाया। मैंने अपनी जीभ से उसके निचले हिस्से से शुरुआत की और धीरे-धीरे ऊपर की ओर बढ़ा, उसके सबसे संवेदनशील हिस्से तक पहुँचने से पहले। जैसे ही मेरी जीभ ने उसे छुआ, वह चीख़ उठी, और उसके हाथ तेज़ी से मेरे बालों में घुस गए। मैंने अपनी जीभ का फुर्तीला इस्तेमाल करते हुए, उस छोटे से उभार पर ध्यान केंद्रित किया, कभी चूसते हुए, कभी तेज़ी से फिराते हुए। उसकी साँसें हिचकियों में बदल गईं, उसकी देह फर्श पर तड़प रही थी, और उसकी आहें और कराहें एक मधुर संगीत की तरह थीं जो मुझे और उत्तेजित कर रही थीं। उसकी नमी मेरे मुँह में फैल रही थी, और उसकी गर्मी मुझे अपनी ओर खींच रही थी।
अचानक उसने मुझे ऊपर खींचा। “अब… अभी,” वह हाँफती हुई बोली। उसने मेरे मुँह को अपने ऊपर खींचा और मुझे एक गहरा चुंबन दिया। उस चुंबन में उसकी अपनी स्वाद की झलक थी, और यह विचित्र रूप से और भी अधिक कामुक था। फिर उसने अपना हाथ नीचे किया और मुझे पकड़ा, मुझे धीरे से अपनी ओर मार्गदर्शन किया। एक पल के लिए मैंने रुका, उसकी आँखों में देखा। उसमें कोई शक नहीं था, सिर्फ एक शुद्ध, अटूट इच्छा। मैंने धीरे से आगे बढ़ते हुए, अपने आप को उसके अंदर डालना शुरू किया।
वह गर्म और तंग थी, और मेरे प्रवेश करते ही उसने एक लंबी, कर्कश आह भरी। मैं पूरी तरह से अंदर घुस गया और रुक गया, दोनों हमारी साँसें रुकी हुई थीं, इस पल के भारीपन को महसूस करते हुए। फिर मैंने धीरे-धीरे चलना शुरू किया, एक लयबद्ध गति से। उसने अपनी टाँगें मेरी कमर के चारों ओर लपेट लीं, मुझे और गहराई तक खींचते हुए। उसकी एड़ियाँ मेरी पीठ को दबा रही थीं। हमारी गति धीरे-धीरे तेज़ होती गई। फ़र्श पर दरी हमारे नीचे सरक रही थी, और आग की लपटों ने हमारे जुड़े हुए शरीरों पर एक उन्मत्त नृत्य किया।
उसका सिर पीछे की ओर झुका हुआ था, और उसके गले से निकलने वाली आहें अब लगातार और तीव्र होती जा रही थीं। “रिशि… वहीं… ठीक वहीं,” वह फुसफुसाई। मैंने अपना हाथ उसकी गर्दन के नीचे रखा और उसे चूमा, हमारी साँसें और लार मिल रही थीं। मैंने अपनी गति को और भी तेज़ कर दिया, हर धक्के के साथ उसे मेरे करीब खींचते हुए। तभी मैंने उसके शरीर में एक कंपन महसूस किया। उसकी आँखें चौंधिया गईं, उसका मुँह खुला रह गया एक अवाक् चीख के लिए जो कभी बाहर नहीं आई। उसके शरीर ने मेरे चारों ओर ऐंठन महसूस की, उसकी आंतरिक मांसपेशियाँ तेज़ी से सिकुड़ रही थीं और मुझे जकड़ रही थीं। वह ऐसी तीव्रता से चरमोत्कर्ष पर पहुँची कि उसकी आँखों में आँसू आ गए।
उसकी चरम सीमा की लहरों ने मुझे भी कगार पर पहुँचा दिया। मैंने अपनी गति जारी रखी, उसकी संवेदनशीलता के माध्यम से धक्का देते हुए, जब तक कि मेरे अपने शरीर में एक ज्वालामुखी फट नहीं गया। एक गहरी, गर्जन करने वाली कराह मेरे गले से निकली, और मैंने खुद को उसमें पूरी तरह से डुबो दिया, मेरी देह का हर तंतु सिहर उठा जब उसके अंदर मेरा सारा ताप निकल गया। मैं उस पर गिर पड़ा, हमारी साँसें एक दूसरे से टकरा रही थीं, हमारे शरीर चिपके हुए, नम और गर्म।
कुछ देर तक हम वैसे ही पड़े रहे, सिर्फ साँस लेते हुए। आग की लपटें अब धीमी होकर अंगारों में बदल गई थीं। मैंने अपना वजन उससे हटाया और उसे अपनी बाँहों में समेट लिया, एक कंबल हम दोनों पर ओढ़ा दिया। वह मेरी छाती से चिपकी हुई थी, उसकी उंगलियाँ हल्के से मेरे सीने पर खेल रही थीं।
“वाह,” उसने आख़िरकार फुसफुसाया, उसकी आवाज़ थकी हुई और संतुष्ट।
“हाँ,” मैंने कहा, उसके बालों को चूमते हुए। “बिल्कुल वाह।”
थोड़ी देर चुप्पी रही। फिर उसने कहा, “तुम्हें पता है, वो किताब… ‘बनारस का बुनकर’…”
“हाँ?”
“वो तुम्हारे लिए मेरी सबसे पसंदीदा किताब बन गई है,” उसने कहा और मुझे और करीब खींच लिया।
मैं मुस्कुराया। ठंडी हवा खिड़की से अंदर आ रही थी, पर हम एक-दूसरे की गर्मी में लिपटे हुए थे। फायरप्लेस का कोयला अब भी टिमटिमा रहा था, ठीक उसी तरह जैसे मेरे अंदर की खुशी। वह खामोशी अब सहज थी, आरामदायक। आने वाले कल के बारे में कोई बात नहीं हुई, कोई शपथ नहीं ली गई। बस इस पल थे, और यह पल ही सब कुछ था। श्रुति की नियमित साँसों ने बताया कि वह सो गई है। मैंने उसे देखा, उसके चेहरे पर शांति और संतुष्टि थी, और मैं जानता था कि वाराणसी की यादों में अब एक नया, सबसे कीमती पन्ना जुड़ गया है।
