जब जुबली पार्क में टकराई उसकी नज़र मेरी आँखों से

मैं, रयांश महतो, सुबह की ठंडी हवा में अपनी साँसों का धुआँ बनते हुए देख रहा था। जुबली पार्क की वह पुरानी पगडंडी, जहाँ से शहर का विशाल म्यूज़िकल फव्वारा दिखाई देता है, मेरा नियमित रास्ता था। यह वही समय था जब सूरज की पहली किरणें लाल रंग के गुलाबों पर पड़ती थीं और हवा में अभी भी रात की सिसकी बसी होती थी। मैं हमेशा की तरह दौड़ रहा था, मेरे हेडफोन में एक मस्त इंडी-पॉप ट्रैक बज रहा था, और मेरा ध्यान सिर्फ अपनी साँसों और कदमों की आवाज़ पर था। फिर, अचानक, मेरी नज़र एक शख्स पर पड़ी।

वह एक लड़की थी, उस दिन की धूप में कुछ इस तरह दौड़ रही थी जैसे वह हवा के साथ प्रतियोगिता कर रही हो। उसने गहरे नीले रंग की ट्रैकपैंट और एक सफेद जर्सी पहन रखी थी। पर वह जर्सी… उस पर जमशेदपुर एफ.सी. का लोगो साफ़ दिख रहा था। मेरा दिल एक अजीब सी धड़कन के साथ धक से रह गया। इस छोटे से शहर में, जहाँ लोग क्रिकेट के दीवाने हैं, कोई और वह भी एक लड़की, मेरे पसंदीदा फुटबॉल क्लब की जर्सी पहने हुई थी। उसकी चाल में एक लय थी, और उसके बाल, जो एक ढीली-सी पोनीटेल में बंधे थे, उसकी हर गति के साथ लहरा रहे थे। उसका रंग गेहुँआ था, और जब वह मुड़कर कुछ देखने के लिए रुकी, तो मुझे उसकी आँखें दिखीं – बड़ी, गहरी और एक अजीब सी शांति से भरी हुई, जो किसी तालाब की सतह जैसी लग रही थीं।

अगले कुछ दिनों तक, वह मेरे लिए बस पार्क की एक सुंदर दृश्यावली बनकर रही। मैंने कोशिश की कि उसे देखकर अपनी दौड़ न तोड़ूं, न ही उस पर ज़्यादा नज़र रखूं। पर एक तरह का आकर्षण था जो धीरे-धीरे बढ़ रहा था। फिर वह दिन आया जब हादसे से कुछ हुआ। वह मेरी तरफ आ रही थी, और मैं उसकी तरफ। हम दोनों ही शायद अपने-अपने हेडफोन में डूबे हुए थे। एक तेज़ मोड़ पर, हम आमने-सामने आ गए। वह तेज़ी से मुड़ी और मैंने भी रुकने की कोशिश की। नतीजा यह हुआ कि हमारे कंधे आपस में टकरा गए। वह संतुलन खोकर गिरने ही वाली थी कि मैंने बिना सोचे अपना हाथ बढ़ाकर उसे सहारा दे दिया। मेरी उंगलियाँ उसके बाजू पर पड़ीं, और उसकी त्वचा का स्पर्श… गर्म और नर्म। वह झटके से सहारा पाकर चौंक गई, और उसकी आँखें मेरी आँखों से मिल गईं। वह सिहरन जो उस पल मेरे शरीर में दौड़ गई, उसे शब्दों में बयान कर पाना मुश्किल है।

“ओह! माफ़ कीजिएगा!” मैंने अपना हाथ हटाते हुए कहा, आवाज़ में एक अजीब सी घबराहट थी।

“नहीं, मेरी ही गलती थी। मैंने आपको देखा ही नहीं,” उसने कहा, एक हल्की सी मुस्कान उसके होठों पर तैर गई। उसकी आवाज़ में एक मधुरता थी, जैसे बारिश के बाद की ताज़ा हवा।

फिर मेरी नज़र फिर से उसकी जर्सी पर गई। मैं रोक नहीं पाया। “यह जमशेदपुर एफ.सी. वाली जर्सी है न?”

उसकी आँखों में एक चमक आ गई, जैसे कोई राहगीर दूर देश में अपनी भाषा सुन ले। “हाँ! आपने पहचान ली? लोग तो अक्सर पूछते हैं कि यह कौन सी टीम है।”

उस पल से बातचीत का दरवाज़ा खुल गया। हमने फुटबॉल की बात की, आने वाले मैच की चर्चा की। उसका नाम इप्शिता तुडू था, और वह एक कॉलेज में पढ़ती थी। हमारी बातचीत इतनी आसान और प्रवाहमयी थी कि लगा नहीं कि हम अभी-अभी मिले हैं। हम दोनों ही दौड़ना भूल गए और म्यूज़िकल फव्वारे के पास बने एक बेंच पर बैठकर बातें करने लगे। उसकी हँसी की आवाज़, उसके हाथों के हाव-भाव, जब वह किसी बात पर जोर देती थी… सब कुछ मुझे दीवाना बनाता जा रहा था।

उस दिन के बाद, हमारी मुलाकातें ‘संयोग’ से ‘इरादतन’ होने लगी। हम लगभग एक ही समय पर पार्क पहुँचते, दौड़ लगाते, और फिर किसी बेंच पर बैठकर घंटों बातें करते। मैंने ध्यान से देखा कि वह कैसी है। उसकी मुस्कान उसके पूरे चेहरे को रोशनी से भर देती थी। उसके होंठ गुलाब की पंखुड़ियों जैसे नर्म और गरम लगते। जब वह किसी बात पर गंभीर होती, तो उसकी भौंहों के बीच एक सुंदर सी लकीर पड़ जाती। उसकी बाँहें लंबी और सुडौल थीं, और जब वह बात करते हुए हवा में हाथ हिलाती, तो लगता जैसे वह अपने शब्दों को आकार दे रही हो।

एक दिन बारिश होने लगी, और हम दोनों पार्क के एक पुराने शेड की तरफ भागे। वहाँ जगह छोटी थी, और हमारे कंधे आपस में छू रहे थे। बारिश की बूंदों की आवाज़ और जमीन से उठती मिट्टी की खुशबू के बीच, एक अजीब सी बेचैनी हवा में तैर रही थी। मैंने देखा कि उसके कपड़े पानी से थोड़े गीले हो गए थे, और उसकी जर्सी उसके शरीर से चिपक गई थी, उसके स्तनों के आकार को उभार रही थी। मैंने जल्दी से नज़र हटा ली, पर दिल की धड़कनें तेज़ हो गई थीं। उसने शायद मेरी नज़रों का एहसास किया, क्योंकि उसने अपने आप को सहलाते हुए अपने बाजू पर हाथ फेरा। “ठंडी हवा लग रही है,” उसने फुसफुसाते हुए कहा। मैंने सिर्फ हल्के से सिर हिलाया, शब्द मेरे गले में अटक गए थे।

हमारे बीच का तनाव एक सुखद खिंचाव की तरह था। कभी बातचीत के दौरान हमारी उंगलियाँ अनजाने में छू जातीं, और एक सिहरन दोनों तरफ दौड़ जाती। कभी मैं उसकी आँखों में देखता और वह तुरंत नज़रें चुरा लेती, पर उसके गालों पर हल्का सा लालापन आ जाता। एक दिन जब हम किसी कैफे में बैठे थे, तो उसने मेरी चाय से एक सिप लेने के लिए अपना हाथ बढ़ाया। उसका हाथ मेरे हाथ के ऊपर से गुजरा, और उस स्पर्श ने मेरे शरीर में एक बिजली सी दौड़ा दी। मैंने देखा कि उसने भी एक सेकंड के लिए साँस रोक ली थी। यह सब छोटे-छोटे पल थे, पर हर पल हमारे बीच की कशिश को और मजबूत करता जा रहा था।

फिर वह मैच वाला दिन आया। जमशेदपुर एफ.सी. की जीत की खुशी में हमने तय किया कि उसके हॉस्टल के पास वाले छोटे से रेस्टोरेंट में डिनर करेंगे। वह रेस्टोरेंट, ‘द ब्रिक ओवन’, एक छोटी सी जगह थी लेकिन खाना बेहतरीन बनाता था। डिनर के बाद, बारिश फिर से शुरू हो गई, इस बार और तेज़। उसने कहा कि हॉस्टल तक मैं उसे छोड़ दूँ। उसका कमरा छोटा, साफ-सुथरा और उसकी तरह ही सादगी से सजा हुआ था। किताबें हर तरफ बिखरी हुई थीं, और एक छोटी सी खिड़की से बारिश की बूंदों की आवाज़ आ रही थी।

वहाँ, उस छोटी सी जगह में, हवा में पहले से कहीं ज़्यादा गहरा तनाव था। शायद यह जगह का असर था, शायद बारिश का, या फिर उन सारे हफ्तों की बातचीत और नज़रों के खेल का जो एक जगह इकट्ठा हो गए थे। हम खड़े थे, बारिश की आवाज़ सुन रहे थे, और फिर कुछ ऐसा हुआ जैसे गुरुत्वाकर्षण ने अपना काम कर दिया हो। मैंने उसकी तरफ देखा, और उसने मेरी तरफ। कोई शब्द नहीं थे, सिर्फ एक गहरी, खींचती हुई चुप्पी। फिर, धीरे से, मैंने अपना हाथ बढ़ाया और उसके गाल को छुआ। उसकी त्वचा मखमल जैसी नर्म थी। उसने अपनी आँखें मूँद लीं, और एक हल्की सी आह उसके होठों से निकली। यह मेरे लिए इजाज़त थी, एक निमंत्रण था।

मैं धीरे से झुका और उसके होंठों को अपने होंठों से छुआ। पहला चुम्बन कोमल था, एक पूछताछ की तरह। पर जैसे ही उसने जवाब दिया, वह कोमलता एक गरम, तीव्र ललक में बदल गई। उसके होंठ मीठे थे, शायद उस डिनर की आइसक्रीम की वजह से, और मैं उनका स्वाद लेने लगा। हमारे होंठ आपस में लिपट गए, एक दूसरे की गर्मी और नर्माहट को तलाशते हुए। मेरे हाथ उसकी पीठ पर गए, उसे मेरे और करीब खींचा। उसका शरीर मेरे शरीर से चिपक गया, और मैं उसकी नर्म curves को महसूस कर सकता था। उसने अपनी बाहें मेरी गर्दन के चारों ओर लपेट दीं, और उसके उंगलियों ने मेरे बालों में उलझते हुए एक रोमांच पैदा किया।

हमारे चुम्बन गहरे और तीखे होते गए, हवा में सिर्फ हमारी साँसों और बारिश की फुहारों की आवाज़ थी। मेरे होंठ उसके होंठों से हटे और उसके जबड़े की रेखा के साथ-साथ चले, फिर उसकी गर्दन पर पहुँचे। मैंने उसकी गर्दन की नर्म त्वचा को चूमा, और उसने अपना सिर पीछे की तरफ झुका लिया, एक मदहोश कर देने वाली कराहट उसके गले से निकली। मेरे हाथ उसकी जर्सी के नीचे फिसले, उसकी पीठ की गर्म त्वचा को महसूस किया। उसने मेरे शर्ट के बटन खोलने शुरू कर दिए, और हर बटन के खुलने पर एक नया उत्तेजना का झोंका मेरे शरीर में दौड़ जाता।

फिर, मैंने धीरे से उसे बिस्तर की तरफ ले जाया। वहाँ कोई जल्दी नहीं थी, सिर्फ एक धीमी, जानबूझकर की जा रही खोज। मैं उसके शरीर पर अपने होंठों को चलाता रहा, उसकी कॉलरबोन से लेकर उसकी छाती तक। मैंने उसकी जर्सी और फिर उसके ब्रा को धीरे से हटाया। उसके स्तन सुंदर और पूर्ण थे, और उनके ऊपर के निप्पल गहरे गुलाबी और कठोर थे। मैंने अपना मुँह उसके एक निप्पल के चारों ओर घुमाया, फिर धीरे से उसे अपने मुँह में ले लिया, चूसना और नरमी से काटना शुरू किया। इप्शिता ने एक तेज़ साँस खींची, उसकी पीठ एक सुंदर मेहराब की तरह झुक गई। “रयांश…” उसने फुसफुसाया, उसकी आवाज़ में एक तड़प और ललक थी जो मेरे अंदर की आग को और भड़का रही थी।

मेरा एक हाथ उसके पेट के सहारे नीचे की ओर सरका, उसकी ट्रैकपैंट के अंदर घुसा। मैंने उसकी जांघ के आंतरिक हिस्से को महसूस किया, वह नर्म और गर्म था। मैंने धीरे से उसकी पैंट और अंडरवियर को नीचे की ओर खींचा। अब वह पूरी तरह से नंगी थी, और मैं उसे देखता रह गया – सुंदर, आत्मविश्वास से भरी, और पूरी तरह से मेरे सामने। मैंने अपने कपड़े उतार फेंके और उसके बगल में लेट गया। मेरा हाथ उसके दोनों पैरों के बीच गया, उसके बाहरी होंठों को सहलाया। वह पहले से ही गीली थी, और उसकी इस उत्तेजना ने मेरे अंदर एक जंगलीपन पैदा कर दिया।

मैंने अपना सिर नीचे किया और अपनी जीभ से उसके योनि के बाहरी हिस्से को टटोला, एक धीमे, गोलाकार मोशन में। इप्शिता का शरीर एक झटके के साथ उछला, और उसने एक मुक्त होती हुई सी आह भरी। उसके हाथ मेरे बालों में उलझ गए, मुझे अपनी ओर दबाते हुए। मैंने अपनी जीभ की गति को तेज़ किया, उसके क्लिटोरिस पर ध्यान केंद्रित किया। उसकी कराहतें और सिसकियाँ हवा में गूँजने लगीं, जो बारिश की आवाज़ के साथ मिलकर एक विचित्र सी सिम्फनी बना रही थीं। फिर, मैंने धीरे से अपनी दो उंगलियाँ अंदर डालीं, एक घुमावदार गति के साथ उसे महसूस किया। वह अंदर से गर्म और तंग थी, और उसके अंदर की मांसपेशियों ने मेरी उंगलियों को जकड़ लिया।

“मत रुको… कृपया,” वह हाँफते हुए बोली, उसकी आँखें एक मदहोशी से भरी हुई थीं।

मैं उठा और उसके ऊपर आया। उसने मेरी कमर पकड़ी और मुझे धीरे से नीचे की ओर खींचा। मैंने अपना लिंग उसकी योनि के प्रवेश द्वार पर रखा, और फिर धीरे से, बिल्कुल धीरे से, अंदर प्रवेश किया। वह दुनिया के सारे आनंद को समेटे हुए एक लंबी, गहरी आह के साथ ऊपर उठी। हम दोनों एक पल के लिए स्थिर रहे, इस जुड़ाव के एहसास में डूबे हुए। फिर, मैंने चलना शुरू किया, एक धीमी, गहरी लय में। वह मेरे नीचे हिलने लगी, उसकी कमर एक प्राकृतिक लय में मेरी गति के साथ तालमेल बिठा रही थी।

कुछ देर बाद, उसने मुझे धकेला और खुद ऊपर आ गई। वह मेरे ऊपर बैठ गई, मेरे लिंग को फिर से अपने अंदर लेते हुए। इस पोजीशन में वह और भी सुंदर लग रही थी, उसके स्तन हवा में हिल रहे थे। उसने ऊपर-नीचे होना शुरू किया, एक ऐसी लय में जो धीरे-धीरे तेज़ होती जा रही थी। मैं बैठ गया और उसके एक स्तन को अपने मुँह में ले लिया, उसे चूसते और निबलाते हुए। उसने अपना सिर पीछे झुका लिया, और उसके मुँह से अब गंदी बातें नहीं, बल्कि मेरे नाम की ही पुकार निकल रही थी – “रयांश, रयांश, रयांश।”

फिर उसने एक तीव्र झटका महसूस किया, और उसकी चाल अनियमित हो गई। मैंने उसे पलटा और उसे हाथों और घुटनों के बल लिटा दिया। इस नई स्थिति में, मैं और गहराई तक पहुँच सकता था। मैंने फिर से प्रवेश किया, और इस बार मेरी गति तेज़ और अधिक दृढ़ थी। मेरे हाथ उसकी कमर पर थे, उसे मेरी ओर खींचते हुए हर थ्रस्ट के साथ। हवा में हमारी साँसों की आवाज़, त्वचा का त्वचा से टकराना, और उसकी मदहोश कर देने वाली कराहतें एक साथ मिल रही थीं। उसकी पीठ के नीचे से मैंने देखा कि उसका चेहरा आनंद से विकृत हो रहा था।

“मैं… मैं आ रही हूँ…” वह चीखी, और उसके शरीर में एक जबरदस्त झटका दौड़ गया। उसकी योनि की मांसपेशियाँ मेरे लिंग के चारों ओर सिकुड़ गईं, एक रिदमिक, दूध निकालने जैसी गति में। यह एहसास इतना तीव्र था कि मेरी अपनी सहनशक्ति टूट गई। मैंने एक गहरी, भारी आह भरी और उसमें गहराई तक प्रवेश करते हुए, अपना वीर्य उसके अंदर छोड़ दिया। एक लंबे, गर्म झोंके के साथ मैं खाली हो गया।

हम वैसे ही पड़े रहे, हाँफते हुए, हमारे शरीर एक-दूसरे से चिपके हुए। धीरे-धीरे हमारी साँसें सामान्य होने लगीं। मैं उसके बगल में लेट गया और उसे अपनी बाँहों में भर लिया। वह मेरी छाती पर अपना सिर रखकर लेटी रही, उसकी उंगलियाँ मेरे सीने पर बेहूदा लकीरें खींच रही थीं। बारिश अब बूंदा-बांदी में बदल गई थी, और खिड़की से आती हुई हवा ठंडी थी, पर हमारे शरीरों की गर्मी ने उसे महसूस नहीं होने दिया।

कुछ देर बाद, उसने आवाज़ लगाई, आवाज़ में एक शरारत थी। “तो… अगले हफ्ते वाला मैच कहाँ देखोगे? यहाँ या पार्क में?”

मैं हँस पड़ा, उसके बालों से होंठ चुराते हुए। “जहाँ तुम कहो, इप्शिता। जहाँ तुम कहो।”

उस रात हम सोए नहीं, बस बातें करते रहे। फुटबॉल की, कॉलेज की, अपने सपनों की। यह वह इंटिमेसी थी जो शारीरिक संबंध से भी आगे की चीज़ थी। जब सुबह की पहली रोशनी खिड़की से अंदर आई, तो वह मेरी बाँहों में सो रही थी, एक शांत मुस्कान उसके चेहरे पर थी। मैंने उसे देखा और महसूस किया कि जुबली पार्क की उस सुबह की दौड़ ने मुझे कहाँ से कहाँ पहुँचा दिया था। यह सिर्फ एक स्टार्ट नहीं था। यह एक नई शुरुआत थी, और मैं उसके हर पल का इंतज़ार करने लगा था।