मेरा नाम मनीष तोमर है और मैं ग्वालियर में रहता हूँ। यह शहर अपनी महलों और किलों के लिए मशहूर है, लेकिन मेरी कहानी किसी पुराने पत्थर की नहीं, बल्कि उस रात की है जब मेरी सांसें और धड़कनें सब कुछ भूल गई थीं। मैं एक आर्किटेक्ट हूँ, तीस की उम्र के आसपास, और मेरी ज़िन्दगी बिल्डिंग्स के ड्रॉइंग और साइट की चक्कर लगाने में ही गुज़र रही थी। फिर वो मिली, रिद्धी सिंधिया।
रिद्धी से मेरी मुलाक़ात एक क्लाइंट मीटिंग में हुई थी। वो एक इंटीरियर डिज़ाइनर थी, और हम दोनों को एक रेस्तराँ के री-मॉडलिंग प्रोजेक्ट पर काम करना था। पहली नज़र में ही वो किसी तूफ़ान की तरह आई। लम्बी, गहरी आँखें जो बात करते समय तुम्हें जकड़ लेती थीं। उसके काले, घने बाल कंधों पर लहराते रहते, और वो हमेशा कुछ ऐसे कपड़े पहनती जो उसके पतले, मगर आकर्षक फिगर को और भी निखार देते। एक दिन वो फिटेड जीन्स और एक साधारण सी वाइट टी-शर्ट में आई थी, मगर उस टी-शर्ट ने भी उसके स्तनों के कर्व्स को ऐसे दिखाया कि मेरी नज़रें उधर से हटती ही नहीं थीं। वो बातचीत में मस्त रहती, हल्की-फुल्की मज़ाक करती, और उसकी हंसी एकदम साफ और संगीतमय होती थी।
धीरे-धीरे, काम के सिलसिले में मिलने वाले कॉफी ब्रेक लम्बे होते चले गए। हम लोग बैठकर न सिर्फ प्रोजेक्ट की, बल्कि ज़िन्दगी की भी बातें करने लगे। पता चला वो भी अकेले रहती है, उसका अपना स्टूडियो है। एक दिन, जब हम दोनों साइट पर काम का जायज़ा ले रहे थे, तभी अचानक बारिश शुरू हो गई। हम दोनों एक छत के नीचे खड़े होकर बारिश देखने लगे। वहाँ उसकी बाँह मेरी बाँह से टच हो गई। उस स्पर्श से एक सिहरन मेरे शरीर में दौड़ गई। मैंने देखा, उसने भी नज़रें झुका लीं, मगर उसके होंठों पर एक हल्की सी मुस्कान थी। “तुम्हारी घड़ी काफी स्टाइलिश है,” उसने कहा, और उसकी उंगलियाँ हवा में मेरी कलाई की तरफ इशारा कर रही थीं। मैंने सिर्फ “शुक्रिया” कहा, मगर मेरा दिल धक-धक कर रहा था।
उस दिन के बाद, हमारे बीच एक तनाव, एक कशिश बनने लगी। मीटिंग के दौरान वो कभी अपने पैरों को क्रॉस करके बैठती, और उसकी स्कर्ट थोड़ी सी ऊपर खिसक जाती। मैं उस ओर देखने की कोशिश नहीं करता था, मगर नज़र अपने आप चली जाती। वो कभी कागज़ात लेते समय उसके हाथ मेरे हाथ को छू जाते, और वो एक पल के लिए लपेट भी लेती। फिर मासूमियत से “सॉरी” बोलकर हट जाती। उसकी आँखों में एक शैतानी सी चमक थी, जो मुझे पता था कि ये सब जानबूझकर हो रहा है।
फिर वो दिन आया जब प्रोजेक्ट ख़त्म हो गया। क्लाइंट खुश था, और हमने सेलिब्रेशन का प्लान बनाया। रिद्धी ने कहा कि उसकी एक दोस्त भी आएगी, जो फैशन डिज़ाइनर है। “तुम्हें माया से मिलवाती हूँ, बहुत कूल लड़की है,” उसने कहा। सेलिब्रेशन उसके अपार्टमेंट में था, जो सिटी सेंटर के पास एक मॉडर्न बिल्डिंग में था। उस रात, जब मैं दरवाज़े पर खड़ा था, तो मेरा दिल ज़ोर-ज़ोर से धड़क रहा था। सिर्फ प्रोजेक्ट के ख़त्म होने की खुशी नहीं थी, बल्कि ये अहसास भी था कि अब शायद रिद्धी से मिलने का कोई बहाना नहीं रहेगा।
दरवाज़ा खुला और रिद्धी नज़र आई। वो आज लाल रंग की सिल्क की साड़ी पहने हुई थी, जो उके हर कर्व को बखूबी दिखा रही थी। उसके मम्मे साड़ी के अंदर से उभर रहे थे, और उसकी कमर पर साड़ी का पल्लू लिपटा हुआ था। “अरे, आ जाओ मनीष,” उसने मुस्कुराते हुए कहा और मुझे अंदर आने का इशारा किया। लिविंग रूम में मोमबत्तियाँ जल रही थीं, और हल्का सा संगीत बज रहा था। वहाँ एक और लड़की खड़ी थी, माया। वो भी खूबसूरत थी, छोटे बाल, तेज़ नज़रें, और एक बोल्ड, काले रंग का गाउन पहने हुई। “हाय, मैं माया हूँ,” उसने हाथ बढ़ाते हुए कहा। उसके हाथ का स्पर्श भी उतना ही मुलायम था।
शुरुआत में तो बातें सामान्य सी चलीं। वाइन के गिलास भरे, मज़ाक-मज़ाक में बातें हुईं। माया बहुत ओपन और बोल्ड थी। वो रिद्धी को टीज़ करती, “अरे, तू तो इसकी तारीफ़ करते नहीं थकती थी, आज ख़ुद शर्मा क्यों रही है?” रिद्धी गालों पर हल्का सा रंग लिए मुस्कुरा दी। मैं ख़ुद को थोड़ा असहज महसूस कर रहा था, मगर एक अजीब सी उत्तेजना भी थी। रिद्धी की नज़रें अक्सर मुझसे मिल जातीं, और फिर वो धीरे से हट जातीं। कुछ देर बातचीत के बाद, माया ने अचानक कहा, “सुनो, एक गेम खेलते हैं।” उसने एक डेक कार्ड्स निकाली। गेम साधारण था, सच्चाई या चुनौती वाला। पहले कुछ राउंड तो हल्के-फुल्के सवाल रहे।
फिर रिद्धी का नंबर आया। माया ने उससे पूछा, “तू आज यहाँ इसकी वजह से सबसे सेक्सी साड़ी पहन के आई है न?” रिद्धी ने शरारत भरी नज़रों से मुझे देखा और बस इतना कहा, “हाँ।” उस एक शब्द ने पूरे कमरे का माहौल बदल दिया। हवा में एक गरमाहट सी घुल गई। अगले राउंड में मेरा नंबर आया। माया ने चुनौती दी। “तुम्हें यहाँ बीच में इस कुर्सी पर बैठना होगा, और हम तुम्हें बाँधेंगे।” मेरा गला सूख गया। मैंने रिद्धी की तरफ देखा। वो मेरी आँखों में देख रही थी, उसकी नज़रों में एक सवाल था, एक इजाज़त माँगने जैसा। मैंने धीरे से सिर हिला दिया। ये सब कुछ सपने जैसा लग रहा था।
मैं उस आरामदायक कुर्सी पर बैठ गया। रिद्धी और माया ने अपनी ही साड़ियों के पल्लू से बने रेशमी रिबन्स निकाले। उन्होंने मेरे हाथों को कुर्सी के पीछे बाँधना शुरू किया। ये बंधन कसा हुआ नहीं था, बल्कि ढीला-ढाला था, मगर उससे निकलना मुमकिन नहीं लग रहा था। उनके हाथों का स्पर्श, उनके शरीरों की गर्माहट, और उनके परफ्यूम की खुशबू ने मुझे चक्कर सा दे दिया। रिद्धी ने जब मेरी कलाई को बाँधा, तो उसने उसे हल्के से सहलाया। माया मेरे पीछे खड़ी थी, और उसने मेरे कान के पास अपना मुँह लाकर फुसफुसाया, “डरो मत, हम तुम्हें ज़्यादा तकलीफ नहीं देंगे… शायद।” उसकी सांसें मेरे गले पर पड़ रही थीं, और मेरे रोएँ खड़े हो गए।
फिर रिद्धी सामने आई। वो धीरे-धीरे मेरी गोद में बैठ गई, मेरी जांघों को अपने नीचे दबाते हुए। उसने अपने हाथ मेरे कंधों पर रखे और मेरी आँखों में देखने लगी। “तुम्हें पता है मनीष,” वो धीरे से बोली, “तुम जब साइट पर ड्रॉइंग समझाते थे, तो तुम्हारे हाथ देखकर मैं हमेशा सोचती थी कि ये हाथ सिर्फ ड्रॉइंग ही नहीं बनाते होंगे।” ये कहकर वो धीरे-धीरे अपने हिप्स को मेरी जांघों पर घुमाने लगी, मेरे पैंट के ऊपर से ही एक रगड़ पैदा करते हुए। मेरे अंदर एक आग सी लग गई थी। मेरी सांसें तेज़ हो गईं। इतने में माया मेरे दाएँ कान के पास आई। उसने मेरे कान के लौ को अपने दांतों से हल्का सा दबाया, एक लव बाइट की तरह। फिर फुसफुसाई, “अगर तुम हिले, तो हम तुम्हें छोड़ देंगे… लेकिन तुम हिलना नहीं चाहोगे, है न?” उसकी डर्टी टॉक और रिद्धी की गोद में हलचल ने मुझे पूरी तरह से अपने काबू में कर लिया था।
रिद्धी उठी और दोनों लड़कियों ने मुझे कपड़ों से मुक्त करना शुरू किया। ये एक धीमा, जानबूझकर लम्बा खींचा जाने वाला अनुष्ठान था। माया ने मेरी शर्ट के बटन खोले, हर बटन खोलने पर उसकी उंगलियाँ मेरे सीने को छूतीं। रिद्धी मेरे सामने घुटनों के बल बैठ गई और मेरे बेल्ट और पैंट का बटन खोला। जब मैं पूरी तरह नग्न था, तो रिद्धी ने अपनी उंगलियों के नाखूनों को मेरे सीने पर, पेट पर नीचे की ओर ट्रेस किया। हर लकीर के साथ मेरा शरीर एक सिहरन के साथ प्रतिक्रिया देता। माया ने मेरे बाएँ हाथ के बंधन को खोल दिया। “ये आज़ाद है,” उसने कहा, “लेकिन हम बताएंगे कि इससे क्या करना है।”
रिद्धी फिर से मेरी गोद में आ गई, इस बार उसने अपनी साड़ी का पल्लू हटा दिया था, और उसके नीचे एक छोटी सी सिल्क की पेटीकोट थी। माया ने मेरे आज़ाद हाथ को पकड़ा और उसे रिद्धी की ओर ले गई। फिर उसने मेरे हाथ को रिद्धी की पेटीकोट के अंदर डालवाया, रिद्धी की योनी तक। रिद्धी की आँखें बंद थीं, और उसके होंठों पर एक हल्की सी आह थी। माया ने मुझे चूमा, एक गहरा, तेज़ चुंबन जिसमें उसकी जीभ ने मेरे मुँह के अंदर अपनी जगह बना ली। और मेरी उंगलियाँ रिद्धी के अंदर थीं, उसकी गर्मी और नमी को महसूस कर रही थीं। रिद्धी ने धीरे से मेरी उंगलियों के ऊपर घूमना शुरू किया, उन्हें और अंदर धकेलते हुए। फिर अचानक वो उठी।
उसने अपनी पेटीकोट भी उतार दी और मेरे ऊपर सवार हो गई। वो मेरे लंड के ऊपर झुकी, उसे अपने हाथों से सीधा किया, और फिर धीरे-धीरे, एक इंच-एक इंच करके, उसे अपने अंदर उतारने लगी। एक गहरी सिसकी उसके होठों से निकली जब वो पूरी तरह से नीचे आ गई। वो मेरे ऊपर बैठी, उसकी आँखें मेरी आँखों में जकड़ी हुईं, और फिर उसने अपनी रिद शुरू की। ऊपर-नीचे, एक लयबद्ध तरीके से, उसके स्तन हवा में हिल रहे थे। माया नीचे आई और मेरी अंडकोष की थैली को अपनी जीभ से चाटने लगी। ये सनसनी असहनीय रूप से अच्छी थी। रिद्धी की सवारी तेज़ होने लगी। उसने अपने हाथों को अपने स्तनों पर रखा, और फिर हल्के से उन्हें दबाया, मरोड़ा। फिर उसने एक हल्का सा तमाचा अपने ही स्तन पर मारा, और एक जोरदार कराह निकाली। “हाँ… ऐसे ही…” वो फुसफुसाई।
फिर माया उठी। उसने रिद्धी से इशारा किया। रिद्धी मेरे ऊपर से उतरी, और माया मेरे सामने खड़ी हो गई। उसने अपने गाउन के पीछे का ज़िप खोला, और वो कपड़ा उसके शरीर से नीचे सरक गया। फिर वो मुँह के बल मेरे ऊपर लेट गई, उसकी गांड मेरे चेहरे के ठीक ऊपर। उसने अपने हाथों से अपने नितंबों को अलग किया, और मेरी ओर देखते हुए कहा, “अब तुम्हारी बारी है।” मैंने अपनी जीभ बढ़ाई और उसके गुप्त अंगों का अन्वेषण शुरू किया। उसकी तीखी, मसालेदार सी खुशबू मेरे नथुनों में भर गई। वो मेरे बालों में अपनी उंगलियाँ फंसाए हुए थी, और मेरे मुँह पर घूम रही थी। इतने में रिद्धी ने माया को पीछे से चूमना शुरू कर दिया, उसकी गर्दन और कंधों पर चुम्बन बरसाते हुए।
फिर वो पल आया जब उन्होंने पोज़ीशन बदली। माया मेरे ऊपर चढ़ गई, लेकिन इस बार रिवर्स काउगर्ल की पोज़ीशन में, ताकि उसकी पीठ मेरी तरफ रहे। रिद्धी मेरे पास आई, मेरे होंठों को चूमती हुई, और अपने हाथों से अपने क्लिटोरिस को सहलाने लगी। माया की सवारी तेज़ और अधिक आक्रामक हो गई। वो पीछे मुड़कर मुझे देख रही थी, उसकी आँखों में एक जंगलीपन था। मैं अपने आपको रोक नहीं पा रहा था। मेरे शरीर में एक ज्वाला सी धधक रही थी।
अचानक, रिद्धी ने मेरे दूसरे हाथ के बंधन को भी खोल दिया। मैं आज़ाद था। उन्होंने मुझे कुर्सी से उठाकर बिस्तर पर धकेल दिया। अब मैं पीठ के बल लेटा हुआ था। रिद्धी ने मेरे लंड को अपने मुँह में ले लिया, उसे चूसना शुरू किया। ये इतना गहरा और कुशल था कि मेरी आँखें झपकने लगीं। और माया मेरे चेहरे पर सवार हो गई, अपनी जांघों से मेरे सिर को घेरते हुए। मैं उसे फिर से चाटने लगा, इस बार और भी ज़्यादा भूख के साथ। रिद्धी का मुख मैथुन और माया के गुप्त अंगों का स्वाद – ये दोहरी सनसनी मुझे कगार पर ले जा रही थी। माया के शरीर में एक कंपन शुरू हुआ। वो चिल्लाई, एक लम्बी, दबी हुई चीख जो कमरे में गूंज गई। उसके ओर्गेज़्म ने मुझे भी ट्रिगर कर दिया। एक गहरी कर्राहट मेरे गले से निकली, और मैंने रिद्धी के मुँह में सबकुछ खाली कर दिया। मेरा शरीर एक लम्बे, लगातार झटके में काँप उठा, जैसे कोई बिजली मेरे अंदर से गुज़र गई हो।
फिर सन्नाटा। सिर्फ हमारी तेज़ सांसों की आवाज़ें थीं। माया मेरे पास गिर गई, उसका पसीने से तर बदन मेरे बदन से चिपक गया। रिद्धी मेरी दूसरी तरफ लेट गई, और उसने अपना सिर मेरे सीने पर रख लिया। कुछ देर तक कोई कुछ नहीं बोला। मैं सिर्फ उस पल को महसूस कर रहा था, उनके शरीरों की गर्मी, उनके दिलों की धड़कन जो धीरे-धीरे सामान्य हो रही थी। बाहर से ग्वालियर की रात की आवाज़ें आ रही थीं, दूर कहीं एक कुत्ता भौंक रहा था। माया ने हल्के से मेरे सीने पर अपनी उंगली से घेरे बनाने शुरू कर दिए। “तुम तो चुप हो गए,” वो फुसफुसाई।
“हम्म…” मैंने कहा, शब्द नहीं ढूंढ पा रहा था। रिद्धी ने अपना सिर उठाया और मुझे देखा। उसकी आँखों में वही शैतानी चमक थी, मगर उसके साथ एक कोमलता भी थी। “कैसा लगा?” उसने पूछा। मैंने केवल सिर हिलाया। जवाब देना मुमकिन नहीं था। माया हँसी, “लगता है हमने इसे स्पीचलेस कर दिया है।” वो उठी और बाथरूम की ओर चली गई। रिद्धी मेरे पास ही रुकी। उसने मेरे गाल पर एक नर्म पप्पी मारी। “तुम्हें पता है,” वो बोली, “तुम जब पहली बार मिले थे, तो तुम्हारी आँखों में एक उदासी थी। आज वो गायब है।” मैंने उसका हाथ पकड़ लिया। शब्द अब भी नहीं आ रहे थे, मगर मेरी आँखों ने शायद सब कुछ कह दिया।
माया लौटी, दो गिलास पानी लेकर। उसने एक मुझे दिया और एक रिद्धी को। “हाइड्रेशन ज़रूरी है,” उसने व्यावहारिक अंदाज़ में कहा। हम लोग बिस्तर पर पड़े रहे, आसमान की ओर देखते हुए। मेरे मन में कोई सवाल नहीं थे, कोई अफ़सोस नहीं था। सिर्फ एक गहरी शांति थी, और एक अजीब सी थकान भी। रिद्धी ने मेरा हाथ अपने हाथ में ले लिया, और उसकी उंगलियाँ मेरी उंगलियों के बीच फंस गईं। माया ने दूसरी तरफ मेरे पैर को अपने पैर से छुआ। ये सब इतना सहज लग रहा था, जैसे हम तीनों कब से एक साथ ऐसे ही रहते आ रहे हों।
आखिरकार मैंने आवाज़ दी। “मुझे लगता है…” मैंने शुरू किया, और फिर रुक गया। “क्या?” रिद्धी ने पूछा, उसकी आँखों में चिंता की एक झलक। “मुझे लगता है,” मैंने मुस्कुराते हुए कहा, “कि अगला प्रोजेक्ट हमें फिर से साथ करना चाहिए।” रिद्धी ने ज़ोर से हँसते हुए अपना सिर मेरे सीने पर रख दिया। माया भी हँस पड़ी। “देखो, बिज़नेसमैन तो बना ही रहता है,” उसने कहा। उस रात हम वैसे ही सो गए, तीनों एक दूसरे से उलझे हुए, बिना किसी और बातचीत के। सुबह जब मेरी आँख खुली, तो सूरज की किरणें खिड़की से आ रही थीं, और दो खूबसूरत शरीर मेरे आसपास सोए हुए थे। और मेरे दिल में एक अजीब सी शांति थी, जैसे कि कोई पुराना, अनजाना तनाव हमेशा के लिए दूर हो गया हो।
